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ईरान, अमेरिका और इसराइल के बीच 40 दिन तक चली जंग के बाद एक चौंकाने वाला निष्कर्ष सामने आया है. ईरान की सबसे असरदार ताक़त, परमाणु क्षमता में नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज़ स्ट्रेट को बाधित करने में हो सकती है.
शुरुआत से ही इस युद्ध को ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश के रूप में देखा गया और इसके लिए अहम ठिकानों और नेताओं को निशाना बनाकर भारी बमबारी की गई.
ईरान ने जवाब में अमेरिका के खाड़ी सहयोगियों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए, लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ा, उसने अपना ध्यान उस संकरे समुद्री रास्ते पर केंद्रित कर दिया जो फ़ारस की खाड़ी को वैश्विक बाज़ारों से जोड़ता है.
इस कदम ने अमेरिका और उसके उन सहयोगियों पर तुरंत भारी दबाव डाल दिया, जो होर्मुज़ स्ट्रेट से तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति पर निर्भर हैं.
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के अधिकारियों ने माना है कि इस अहम मार्ग पर नियंत्रण स्थापित करना, पारंपरिक सैन्य कार्रवाई से ज़्यादा रणनीतिक फ़ायदा दे सकता है.
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को ख़तरे में डालकर ईरान ने वॉशिंगटन को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर किया.
आख़िरकार युद्धविराम वार्ता की शर्त के रूप में इस जलमार्ग को फिर से खोलना और उसकी सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई.
हालांकि ईरान पहले भी, हमले की स्थिति में होर्मुज़ स्ट्रेट बंद करने की धमकी देता रहा है, लेकिन इससे पहले इसे पूरी तरह कभी बंद नहीं किया गया था.
यहां तक कि 1980-1988 के ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान, जब तेल टैंकरों पर हमले हुए, तब भी इसे बंद नहीं किया गया.
अब कुछ ईरानी कमांडर और अधिकारी होर्मुज़ स्ट्रेट पर देश के नियंत्रण के भविष्य पर चर्चा कर रहे हैं. ईरान की संसद, ख़ासकर उसकी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने वहां से गुजरने वाले जहाज़ों पर शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी तैयार किया है.
एक सांसद ने सुझाव दिया है कि ईरान होर्मुज़ स्ट्रेस से गुजरने वाले हर तीन बैरल तेल पर एक डॉलर वसूल सकता है.
जीत की तस्वीर
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युद्धविराम के बाद ईरानी सरकारी मीडिया ने जीत की छवि पेश की है. कुवैत में ईरान के दूतावास ने पूर्व सर्वोच्च नेता का एक वीडियो साझा किया है, जिसका शीर्षक था “जब अल्लाह की मदद और जीत आती है.”
यह ईरान के भीतर प्रचारित उस संदेश को दिखाता है कि देश ने बाहरी दबाव का सफलतापूर्वक मुक़ाबला किया है.
आईआरजीसी से जुड़ी फार्स न्यूज़ एजेंसी ने जानकारी दी, “ईरान की युद्धविराम योजना में प्रतिबंध हटाना, युद्ध का मुआवज़ा और अमेरिकी सैनिकों की वापसी शामिल है.”
ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी यही रुख़ दोहराया. ईरान के उपराष्ट्रपति के बयान में युद्धविराम को “ख़ामेनेई सिद्धांत” की जीत बताया गया, जिसमें अली ख़ामेनेई का ज़िक्र है, जो जंग के शुरुआती दिनों में मारे गए थे.
दूसरी तरफ़, आईआरजीसी के पूर्व प्रमुख और ईरान के नए नेता के सलाहकार मोहसिन रज़ाई ने चेतावनी दी कि ईरानी सेना पूरी तरह चौकन्ना है और उसकी “उंगलियां ट्रिगर पर” हैं.
हालांकि जीत के दावों के पीछे हक़ीक़त कहीं ज़्यादा नाज़ुक है.
ईरान की सेना को भारी नुक़सान हुआ है और उसकी अर्थव्यवस्था, जो पहले से ही अमेरिका के नेतृत्व वाले प्रतिबंधों के दबाव में थी, अब और ख़राब हो गई है.
संघर्ष के दौरान कम से कम 13 लोगों को फांसी दी गई, जिनमें से कई पर जासूसी के आरोप थे और कुछ को जनवरी में हुए देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिया गया था.
ये कदम इस बात का संकेत देते हैं कि सत्ता तंत्र के भीतर घरेलू असहमति को लेकर गहरी चिंता है, और हालात पर नियंत्रण फिर से स्थापित करने की कोशिश की जा रही है.
होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खोलना कितना मुश्किल

होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलना शांति वार्ता से पहले अमेरिका की एक प्रमुख मांग थी, लेकिन ऐसा लगता है कि इसे हासिल करना आसान नहीं रहा.
बुधवार को ईरान ने चेतावनी दी कि रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की मंज़ूरी के बिना गुजरने वाले जहाज़ों को “निशाना बनाकर नष्ट कर दिया जाएगा.”
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने बाद में कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप को इन “अस्वीकार्य” रिपोर्टों की जानकारी दी गई है, लेकिन उन्होंने कहा कि यह निजी तौर पर कही जा रही बातों से अलग है.
ईरान के उप विदेश मंत्री सईद ख़ातिबज़ादेह ने गुरुवार को बीबीसी से कहा कि ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट से सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करेगा. उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ जंग शुरू होने से पहले तक यह “हज़ारों सालों से खुला” था.
हालांकि उन्होंने कहा कि इसे फिर से खोलना तभी संभव होगा “जब अमेरिका वास्तव में इस आक्रामकता से पीछे हटे”, जो संभवतः लेबनान पर इसराइल के हमलों की ओर इशारा है.
ख़ातिबज़ादेह ने कहा कि ईरान “अंतरराष्ट्रीय मानकों और अंतरराष्ट्रीय क़ानून” का पालन करेगा, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यह होर्मुज़ अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नहीं है और सुरक्षित आवाजाही “ईरान और ओमान की सद्भावना” पर निर्भर करती है.
स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ अंतरराष्ट्रीय समुद्री क़ानून और संयुक्त राष्ट्र समुद्री क़ानून संधि (यूएनसीएलओएस) के तहत संचालित होता है, जिसका मक़सद नागरिक समुद्री यातायात की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है.
ख़तरनाक मिसाल
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तो आगे ईरान क्या कर सकता है? दरअसल, ईरानी संसद के सामने रखा गया होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण का प्रस्ताव नौ बिंदुओं में है.
इसमें एक अहम प्रावधान यह है कि “दुश्मन देशों के जहाज़ों को गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी.”
इसके अलावा, ईरान जहाज़ों को मार्ग मुहैया कराने की सेवा दे सकता है, जिसके लिए कंपनियों को ईरानी मुद्रा में भुगतान करना होगा और ईरान में बैंक खाता रखना होगा. जहाज़ों को अपने माल की जानकारी भी देनी होगी.
यह एक जटिल प्रस्ताव है और अभी इस पर मतदान नहीं हुआ है.
अगर ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाज़ों पर शुल्क लगाता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या अमेरिका और उसके पश्चिमी और क्षेत्रीय सहयोगी इसे स्वीकार करेंगे.
हालिया प्रतिक्रियाएं कड़े विरोध की ओर इशारा करती हैं, क्योंकि समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता अमेरिका और उसके साझेदारों के लिए एक मूल सिद्धांत है और किसी भी शुल्क प्रणाली को ख़तरनाक मिसाल के रूप में देखा जाएगा.
अगर ईरान इसमें सफल होता है, तो यह एक अहम रणनीतिक और प्रतीकात्मक जीत होगी, जो यह दिखाएगी कि दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक पर वह नियंत्रण रख सकता है.
हालांकि जोखिम यह है कि ऐसा कदम उलटा भी पड़ सकता है और अमेरिका के सहयोगियों, नेटो सदस्यों और क्षेत्रीय ताक़तों को ईरान के ख़िलाफ़ एकजुट कर सकता है, जिससे तालमेल के साथ कूटनीतिक, आर्थिक या यहां तक कि सैन्य प्रतिक्रिया भी हो सकती है.
इस रिपोर्ट में सारा बेल ने भी सहयोग किया
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित