डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सरकार ने पासपोर्ट नियम, 1980 में संशोधन करके पासपोर्ट शुल्क के ढांचे में बदलाव किया है। इसके तहत 36 पृष्ठों वाले सामान्य नए पासपोर्ट के लिए आवेदन शुल्क 1500 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये कर दिया गया है। नए नियम एक जुलाई, 2026 से लागू होंगे।
विदेश मंत्रालय की ओर से गुरुवार को प्रकाशित 20 जून की अधिसूचना के अनुसार, 36 पृष्ठों वाले सामान्य नए पासपोर्ट या पासपोर्ट को दोबारा जारी करवाने के लिए तत्काल सेवा का शुल्क 5000 रुपये होगा।
शुल्क कितना बढ़ाया गया, यहां समझिए पूरा मामला
बता दें कि अभी इस श्रेणी में तत्काल सेवा के लिए शुल्क 3500 रुपये है। इसी तरह 60 पृष्ठों वाले सामान्य नए पासपोर्ट या पासपोर्ट को दोबारा जारी करवाने के लिए आवेदन शुल्क 2000 रुपये से बढ़ाकर 3500 रुपये कर दिया गया है और तत्काल सेवा के लिए नया शुल्क 6000 रुपये होगा, जबकि पहले इसी श्रेणी के लिए यह शुल्क 4000 रुपये था।
पासपोर्ट सेवाओं को सुगम बनाने के काम कर रही सरकार- विदेश मंत्रालय
14वां पासपोर्ट सेवा दिवस मनाए जाने के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने बुधवार को बताया कि सरकार पासपोर्ट सेवाओं को सुगम बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। पिछले एक दशक में पासपोर्ट नेटवर्क छह गुना बढ़ चुका है। देशभर में अब 500 से अधिक पासपोर्ट केंद्र कार्यरत हैं।
अकेले 2025 में 1.5 करोड़ पासपोर्ट तथा संबंधित सेवाएं प्रदान की गई हैं। इनमें से केवल पासपोर्टों की संख्या 1.39 करोड़ रही। उल्लेखनीय है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से यात्रा का दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाण।
देशभर में 545 पासपोर्ट केंद्र
अधिकारी ने बताया कि पुलिस सत्यापन को छोड़कर पासपोर्ट जारी करने में औसतन छह कार्य दिवस लगते हैं। पासपोर्ट सेवा केंद्रों और पोस्ट आफिस पासपोर्ट सेवा केंद्रों में आवेदकों द्वारा बिताया जाने वाला समय 45 मिनट से भी कम है। आज देशभर में 545 पासपोर्ट केंद्र मौजूद हैं, जबकि 10 वर्ष पहले इनकी संख्या केवल 77 थी।
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अधिकारी ने बताया कि इस प्रकार पासपोर्ट केंद्रों की संख्या में लगभग छह गुना वृद्धि दर्ज की गई है। हमने पिछले साल 10 पोस्ट आफिस पासपोर्ट सेवा केंद्र खोले थे और इस साल 10 और केंद्र खोले जाएंगे। अधिकारी ने बताया कि अब भारतीयों के लिए वीजा मुक्त प्रवेश वाले देशों की संख्या 27 हो गई है, जबकि 2019 में यह संख्या 16 थी। 47 देश भारतीयों को ‘वीजा आन अराइवल’ की सुविधा देते हैं और 66 देश भारतीयों को इलेक्ट्रानिक वीजा की सुविधा देते हैं। आवागमन समझौते ज्यादातर यूरोपीय देशों के साथ हैं।
विदेश मंत्री ने पासपोर्ट सेवाओं की तारीफ की
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कुशल, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित पासपोर्ट सेवाओं की तारीफ की और लोगों को सेवाएं देने के लिए विदेश मंत्रालय की प्रतिबद्धता पर जोर दिया। जयशंकर ने पासपोर्ट सेवा कार्यक्रम की सफलता के पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” के विजन को मुख्य वजह बताया।
पासपोर्ट और नागरिकता पर विवाद को समझिए
पासपोर्ट के नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं होने के सरकार के दावे से नया विवाद शुरू हो गया है। मीडिया ब्रीफिंग के दौरान एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने यह दावा किया था। विवाद बढ़ने पर सरकार ने पासपोर्ट एक्ट, 1967 और बांबे हाई कोर्ट के 2013 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पिछले 12 वर्षों में इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। वैसे नागरिकता के सटीक दस्तावेज पर छिड़ी बहस ने ढाई दशक पुराने नेशनल रजिस्टर आफ सिटिजंस (एनआरसी) की जरूरत एक बार जता दी है।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने बुधवार को कहा था कि पासपोर्ट, नागरिकता साबित करने का दस्तावेज नहीं है। इसके बाद सरकारी सूत्रों ने गुरुवार को साफ किया कि यह कल तय नहीं हुआ है कि पासपोर्ट नागरिकता का सुबूत नहीं है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों में ऐसा कोई फैसला नहीं किया है। पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का सुबूत नहीं रहा है।
निर्वासित तिब्बती भी ले सकते हैं भारतीय पासपोर्ट
पुलिस सत्यापन के बाद बनने वाले पासपोर्ट को अभी तक नागरिकता का सबसे सटीक दस्तावेज माना जाता था। लेकिन कानून में ऐसा नहीं लिखा है। 1967 के पासपोर्ट एक्ट की धारा-20 में कहा गया है कि जरूरत पड़ने पर पासपोर्ट विदेशी को भी जारी किया जा सकता है।
एक अधिकारी ने बताया कि सात दशकों से भारत में रह रहे निर्वासित तिब्बतियों के लिए भी भारतीय पासपोर्ट लेने का विकल्प खुला है। पूर्व विदेश सचिव निरूपमा राव का कहना है कि सामान्यत: विदेश में पासपोर्ट धारक को उस देश का नागरिक माना जाता है। लेकिन अगर कोई फ्राड होता है या फिर पैरेंटेज की बात आती है, तो नागरिकता कानून, 1955 आधार बनता है न कि पासपोर्ट।