डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सोमवार की सुबह वैश्विक तेल बाजार के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रही। भारत से हजारों किलोमीटर दूर सऊदी अरब का एक अहम रिफाइनरी केंद्र अचानक ठप हो गया और दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल जलडमरूमध्य हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही लगभग रुक गई।
नतीजा यह हुआ कि कच्चे तेल की कीमतों में एक ही दिन में जोरदार उछाल आ गया, जिसकी गूंज सीधे भारत के शेयर बाज़ार और मौद्रिक नीति तक पहुंची। ड्रोन और मिसाइल मलबे के खतरे के चलते सऊदी अरामको को रास तनुरा में स्थित 5.5 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली रिफाइनरी और निर्यात केंद्र में परिचालन रोकना पड़ा।
साथ ही, ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद बढ़े तनाव के कारण जहाज मालिकों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने से परहेज करना शुरू कर दिया। यह रास्ता दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति के लिए जीवनरेखा माना जाता है।
क्रूड ऑयल के किमत में भारी उछाल
इन घटनाओं के बाद ब्रेंट क्रूड एक दिन में 9–13% उछलकर 70 डॉलर के ऊपरी और 80 डॉलर के निचले स्तर तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड 9% से अधिक चढ़कर 70 डॉलर के आसपास आ गया।
टोरंटो स्थित वित्त विशेषज्ञ शाह फैसल शाह ने इसे वैश्विक महंगाई का न्यूक्लियर बम बताया और चेतावनी दी कि तेल में 10% की छलांग एक महीने में उपभोक्ता महंगाई को 0.5% तक बढ़ा सकती है।
भारत के लिए यह समय बेहद नाज़ुक है। हाल के महीनों में महंगाई तेजी से घटी थी। अक्टूबर 2025 में यह ऐतिहासिक रूप से 0.25% तक आ गई और जनवरी में 2.75% रही।
क्या पड़ेगा असर?
तेज आर्थिक वृद्धि के साथ कम महंगाई का यह संतुलन अब महंगे तेल से बिगड़ सकता है। ऊंची ऊर्जा लागत परिवहन, खाद्य और विनिर्माण कीमतों को ऊपर धकेल सकती है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती मुश्किल हो जाएगी।
रुपया भी दबाव में आ सकता है। फरवरी में यह डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर 90.97 पर बंद हुआ था, लेकिन बैंकों का मानना है कि कच्चा तेल महंगा होने पर यह 91–93 के दायरे में जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का चालू खाता घाटा 40–50 आधार अंक बढ़ सकता है।
भारत के पास कितना स्टॉक
हालांकि भारत के पास लगभग 74 दिनों की खपत के बराबर रणनीतिक तेल भंडार है और वह रूस या अमेरिका से आपूर्ति बढ़ा सकता है, लेकिन लंबे समय तक हॉर्मुज़ में बाधा या व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति में तेल 90–100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकता है। तब इसका असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गैस, सोना, हीरे और समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।