प्रेम शंकर झा, एडीआरएम, मुरादाबाद। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ आंकड़े केवल रिकॉर्ड नहीं होते, बल्कि वे समय के साथ आए व्यापक परिवर्तनों पर विचार करने का अवसर भी प्रदान करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल का 4399वें दिन में प्रवेश ऐसा ही एक अवसर है।
इसके साथ ही वह स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के 4398 दिनों के निर्वाचित प्रधानमंत्री के कार्यकाल को पीछे छोड़ रहे हैं। यह केवल दो प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की तुलना का विषय नहीं है, बल्कि उन दो अलग-अलग युगों की शासन अवधारणाओं को समझने का अवसर भी है, जिन्होंने अपने-अपने समय में भारत के विकास की दिशा तय की।
पंडित नेहरू ने ऐसे भारत का नेतृत्व संभाला था, जो अभी-अभी स्वतंत्र हुआ था। देश के सामने संस्थागत ढांचा खड़ा करने, लोकतंत्र को स्थिर बनाने, औद्योगिक आधार विकसित करने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने जैसी ऐतिहासिक चुनौतियां थीं। उस समय शासन का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र निर्माण था।
इसलिए नेहरूवियन मॉडल में राज्य को विकास का प्रमुख माध्यम माना गया। बड़े सार्वजनिक उपक्रम, पंचवर्षीय योजनाएं, वैज्ञानिक संस्थान, बड़े बांध और आधारभूत उद्योग उसी सोच का हिस्सा थे। उस दौर में सरकार केवल नियामक नहीं, बल्कि विकास की मुख्य संचालक शक्ति थी।
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आज का भारत उस दौर के भारत से बिल्कुल अलग है। हमारे पास मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं, विकसित निजी क्षेत्र है, वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहरा जुड़ाव है और तकनीकी क्रांति ने शासन की प्रकृति को भी बदल दिया है। इसलिए वर्तमान समय की चुनौतियां भी अलग हैं। अब प्रश्न संस्थाएं खड़ी करने का नहीं, बल्कि उन्हें अधिक प्रभावी, उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाने का है।
यहीं पर मोदी सरकार के दौरान उभरने वाला मोदीफाइड गवर्नेंस मॉडल दिखाई देता है। यदि नेहरू युग का केंद्र संस्थागत निर्माण था, तो वर्तमान दौर का केंद्र सेवा वितरण की दक्षता है। यदि पहले प्राथमिकता संरचना खड़ी करने की थी, तो आज प्राथमिकता उस संरचना के माध्यम से अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने की है।
इस परिवर्तन का सबसे स्पष्ट उदाहरण तकनीक आधारित शासन में दिखाई देता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, आधार आधारित पहचान प्रणाली, ऑनलाइन सेवाएं और डिजिटल भुगतान तंत्र ने प्रशासनिक प्रक्रियाओं को नई दिशा दी है। पहले जहां योजनाओं और लाभों के बीच कई स्तर मौजूद होते थे, वहीं आज तकनीक ने सरकार और नागरिक के बीच की दूरी को काफी हद तक कम कर दिया है।
आर्थिक दृष्टि से भी दोनों मॉडलों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। नेहरूवियन मॉडल में सार्वजनिक क्षेत्र विकास का प्रमुख इंजन था। उस समय यह आवश्यकता भी थी, क्योंकि निजी निवेश और औद्योगिक क्षमता सीमित थी।
वर्तमान दौर में सरकार की भूमिका प्रत्यक्ष उत्पादक की तुलना में सक्षम वातावरण तैयार करने वाली संस्था के रूप में अधिक दिखाई देती है। स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण प्रोत्साहन और नवाचार आधारित विकास इसी सोच को प्रतिबिंबित करते हैं।
शासन की कार्य संस्कृति में भी उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। पहले योजनाओं के निर्माण पर अधिक बल था, जबकि आज परिणाम आधारित मूल्यांकन पर जोर दिखाई देता है। किसी योजना की सफलता केवल उसकी घोषणा या बजट से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक प्रभाव से आंकी जा रही है। यही कारण है कि प्रशासनिक व्यवस्था में निगरानी, डैशबोर्ड आधारित समीक्षा और डेटा आधारित निर्णय प्रक्रिया का महत्व बढ़ा है।
हालांकि, यह तुलना किसी एक मॉडल को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास नहीं है। दोनों मॉडल अपने-अपने समय की आवश्यकताओं और चुनौतियों की उपज थे। स्वतंत्रता के बाद यदि नेहरू ने आधुनिक भारत की संस्थागत नींव नहीं रखी होती, तो आज की डिजिटल और तकनीक-संचालित शासन व्यवस्था भी संभव नहीं होती। उसी प्रकार, यदि बदलते समय के अनुरूप प्रशासनिक प्रणालियों में सुधार नहीं किए जाते, तो संस्थागत ढांचा अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर पाता।
इसलिए 4398 दिन और 4399 दिन की यह तुलना वास्तव में भारत की विकास यात्रा की तुलना है। एक ओर वह दौर था जब राष्ट्र निर्माण सर्वोच्च प्राथमिकता था, दूसरी ओर यह दौर है जब विकसित भारत के लक्ष्य के साथ दक्ष, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित शासन पर बल दिया जा रहा है।
मेरा मानना है कि पिछले 4398 दिनों में भारत की शासन व्यवस्था ने केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं देखा है, बल्कि विकास की सोच में भी एक व्यापक परिवर्तन का अनुभव किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गवर्नेंस का केंद्र योजनाओं की घोषणा से आगे बढ़कर उनके प्रभावी क्रियान्वयन, पारदर्शिता, जवाबदेही और अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने पर केंद्रित हुआ है।
डिजिटल गवर्नेंस, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, वित्तीय समावेशन, बुनियादी ढांचे के विस्तार और जनभागीदारी पर आधारित यह मॉडल शासन को अधिक परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में आगे बढ़ा है। यही कारण है कि आज भारत केवल विकास की चर्चा नहीं करता, बल्कि उसे धरातल पर उतारने की क्षमता भी प्रदर्शित कर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 4399वें दिन में प्रवेश केवल एक राजनीतिक या सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की विकास यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव का प्रतीक है। वर्ष 2014 में भारत विश्व की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था, जबकि आज वह चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।
यह परिवर्तन केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन की उस नई कार्यसंस्कृति को भी प्रतिबिंबित करता है, जिसमें तकनीक, पारदर्शिता, दक्षता और नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई है। विकसित भारत-2047 का जो राष्ट्रीय संकल्प आज देश के सामने है, उसकी आधारशिला पिछले एक दशक में रखी गई है।
आने वाले वर्षों में भारत की प्रगति का मूल्यांकन केवल उसकी आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि इस बात से भी होगा कि वह अपने नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता, अवसरों की उपलब्धता और सुशासन के मानकों को किस स्तर तक ले जा पाता है। 4399 दिनों की यह यात्रा उसी विकसित, आत्मविश्वासी और वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा रखने वाले भारत की कहानी है।