इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार दशक पहले रंजिश में तलवार से सिर कलम करने के आरोपी को मिली उम्रकैद बरकरार रखी है। कोर्ट ने कहा कि बदला लेने की भावना से की गई ऐसी नृशंस हत्या के लिए कानून में कोई रियायत नहीं है। ऐसे आरोपी रहम के हकदार नहीं है।
यह फैसला न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय, न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने किशनपाल, वीरपाल और अन्य की ओर से दाखिल अपील पर दिया है। यह खूनी संघर्ष 23 अक्तूबर 1987 की सुबह पीलीभीत के बीसलपुर में हुआ था। इंदल प्रसाद भाई राम दयाल संग साइकिल से गांव लौट रहे थे।
नहर के पास गन्ने के खेत में घात लगाकर बैठे किशन लाल, भोला नाथ और वीरपाल हथियारों के साथ बाहर निकले। रंजिश का बदला लेने के लिए सभी ने इंदल पर तलवार और कांता (बांके) से ताबड़तोड़ 13 वार किए। हमला इतना भीषण था कि इंदल का सिर धड़ से अलग होकर दूर जा गिरा।
सत्र अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ इन्होंने अपील दाखिल की थी। कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। कहा कि हमलावरों का गन्ने के खेत में छिपकर शिकार का इंतजार करना साबित करता है कि यह कोई अचानक हुआ झगड़ा नहीं, बल्कि एक ठंडे दिमाग से रची गई पूर्व नियोजित साजिश थी। जब कई लोग समान इरादे से हमला करते हैं तो हर एक व्यक्ति उस अपराध के लिए समान रूप से जिम्मेदार होता है।
अकेले गवाह की गवाही पर लगी मुहर
मामले में रोचक मोड़ तब आया जब मुख्य गवाहों के मुकर जाने के बावजूद अदालत ने मृतक के भाई (राम दयाल) की गवाही को अटूट माना। कोर्ट ने कहा कि यदि चश्मदीद का बयान प्राकृतिक है। पोस्टमार्टम से उसकी पुष्टि होती है तो दोषियों को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि अन्य गवाह डर या दबाव में मुकर गए हैं।
एक महीने में आत्मसमर्पण का अल्टीमेटम
अपील के दौरान मुख्य आरोपी किशन लाल और भोला नाथ की मौत हो चुकी है, जिसके बाद वीरपाल ही एकमात्र जीवित अपीलकर्ता बचा था। कोर्ट ने वीरपाल की जमानत तत्काल रद्द कर उसे एक महीने के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट पीलीभीत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। चेतावनी दी है कि वह सरेंडर नहीं करता तो पुलिस उसे गिरफ्तार कर जेल भेजे।