डिजिटल इंडिया, पढ़ेगा इंडिया-बढ़ेगा इंडिया जैसे बड़े-बड़े नारों के बीच मध्यप्रदेश के सीहोर जिले से चौंकाने वाला मामला सामने आया। यह मामला सरकारी सिस्टम की जमीनी हकीकत को उजागर करता है। भैरुंदा तहसील में शिक्षा विभाग की लापरवाही ने 15 साल की आदिवासी छात्रा को कागजों में 126 साल की बुजुर्ग बना दिया। शासकीय स्कूल की एक गलती ने न केवल छात्रा की पहचान पर सवाल खड़े कर दिए, बल्कि उसके भविष्य को भी अधर में लटका दिया है।
भैरुंदा तहसील के ग्राम इटावा खुर्द निवासी तेर सिंह बरेला की पुत्री ममता बारेला शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल पिपलानी में कक्षा 9वीं की छात्रा है। सत्र 2024-25 की हालिया अंकसूची में उसकी जन्मतिथि अंकों में 00-01-1900 और शब्दों में 30 दिसंबर 1899 दर्ज कर दी गई। जबकि वास्तविकता यह है कि ममता का जन्म 3 जून 2009 को हुआ था। स्कूल रिकॉर्ड में उसे एक सदी से भी अधिक पुराना दिखा दिया गया, जिससे वह सरकारी दस्तावेजों में दादी की भी दादी बन गई।
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जन्म प्रमाण पत्र अटका, योजनाओं से वंचित हुई छात्रा
गलत जन्मतिथि का सीधा असर ममता के जीवन पर पड़ा है। जन्मतिथि की त्रुटि के कारण उसका डिजिटल बर्थ सर्टिफिकेट पोर्टल से बार-बार रिजेक्ट हो रहा है। जन्म प्रमाण पत्र के बिना न तो छात्रवृत्ति मिल पा रही है और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ। जिस उम्र में बच्चे पढ़ाई और सपनों में व्यस्त होते हैं, उस उम्र में ममता और उसका पिता अपनी पहचान साबित करने के लिए सिस्टम से लड़ रहे हैं। एक प्रशासनिक गलती ने छात्रा को सामाजिक और शैक्षणिक दोनों रूप से हाशिए पर धकेल दिया है।