डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जैसे ही जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने सोमवार को अस्थिर क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा माहौल के बीच भारत का दौरा शुरू किया, प्रोजेक्ट-75I को लेकर चर्चाओं में नई तेजी आ गई है। क्योंकि भारतीय नौसेना में छह नेक्स्ट-जेनरेशन पारंपरिक पनडुब्बियों को शामिल करने की योजना है, जो एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन से लैस होंगी।
1971 की जंग के दौरान भारतीय नौसेना के हमलों से कराची पंगु हो गया था और उसके पांच दशक से ज्यादा समय बाद पानी के अंदर की ताकत एक बार फिर नई दिल्ली की रणनीतिक सोच के केंद्र में है। यह इतिहास से सबक और हाल के संकटों के बाद पाकिस्तान के सात नए सिरे से बढ़े तनाव के साथ-साथ हिंद महासागर में चीन की बढ़ती पानी के नीचे मौजूदगी को दिखाती है।
क्या है प्रोजेक्ट-75I और क्यों है महत्वपूर्ण?
प्रोजेक्ट-75I भारतीय नौसेना का प्रमुख कार्यक्रम है जिसके तहत फ्यूल-सेल-आधारित एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन, एडवांस्ड सेंसर, टॉरपीडो और मिसाइल सिस्टम से लैस छह आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां बनाई जाएंगी।
पीआईबी के एक बयान के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2021 में स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप मॉडल के तहत इस प्रोजेक्ट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया था और इसे सरकार के मेक इन इंडिया अभियान का एक मुख्य स्तंभ बताया था।
इस प्रोजेक्ट के तहत देश में ही कंस्ट्रक्शन, लॉन्ग-टर्म टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और घरेलू सबमरीन बनाने का इकोसिस्टम बनाने की कल्पना की गई है। RFP स्टेज पर अनुमानित लागत 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा थी, जबकि मौजूदा अनुमानों के अनुसार, कॉन्फिगरेशन और लाइफसाइकिल सपोर्ट के आधार पर फाइनल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू 8 बिलियन डॉलर यानी लगभग 72,000 करोड़ रुपये के करीब होगी।
ये प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना की एक बड़ी कमी को पूरी करता है। उसका पारंपरिक सबमरीन बेड़ा पुराना हो रहा है, जबकि हिंद महासागर और भारत के समुद्री रास्तों पर चीन और पाकिस्तान की पानी के अंदर की गतिविधियां बढ़ रही हैं।
जर्मन टाइप-214NG को क्यों चुना गया?
रक्षा सूत्रों की अगर मानें तो भारतीय नौसेना ने जर्मन टाइप-214 नेक्स्ट जेनरेशन पनडुब्बी को चुना है, जिससे स्पेन की नवान्टिया द्वारा पेश की गई S-80 प्लस पनडुब्बी पीछे रह गई है। यह फैसला मुख्य रूप से जर्मन फ्यूल-सेल-आधारित AIP सिस्टम की मैच्योरिटी, एकॉस्टिक स्टील्थ और कम लाइफसाइकिल जोखिम के कारण लिया गया।
AIP पनडुब्बियों को सतह पर आए बिना या स्नॉर्कलिंग किए बिना हफ्तों तक पानी के अंदर रहने की सुविधा देता है। इससे पकड़े जाने का खतरा कम हो जाता है। दुश्मन के इलाके में इस तरह खूबियां निर्णायक हो जाती हैं। टाइप-214 की AIP टेक्नोलॉजी को बड़े पैमाने पर ऑपरेशनली साबित माना जाता है, जबकि प्रतिस्पर्धी सिस्टम अभी भी वैलिडेशन से गुजर रहे हैं।
पानी के नीचे की लड़ाई में विश्वसनीयता और जीवित रहने की क्षमता अक्सर नई चीजों से ज्यादा मायने रखती है। शायद इसी सोच की वजह से नौसेना ने इसे चुना है।
मेक इन इंडिया सबसे अहम
प्रस्तावित फ्रेमवर्क के तहत सभी छह सबमरीन भारत में MDL में बनाई जाएंगी, जिसमें TKMS डिजाइन अथॉरिटी, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और टेक्निकल कंसल्टेंसी देगी। उम्मीद है कि स्वदेशी कंटेंट लगभग 45 प्रतिशत से शुरू होगा और आखिरी नाव तक बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत हो जाएगा, जो आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों के अनुरूप है।
TKMS और MDL ने पिछले साल जून में इस प्रोजेक्ट को मिलकर आगे बढ़ाने के लिए एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर साइन किए थे। पिछले प्रोजेक्ट-75 के तहत स्कॉर्पीन-क्लास सबमरीन बनाने का MDL का पिछला अनुभव भारतीय स्ट्रेटेजिक पार्टनर के तौर पर उसके दावे को मजबूत करता है।
पाकिस्तान को रोकने का लॉजिक
भारत का पानी के अंदर की क्षमता पर जोर देने का कारण इतिहास में छिपा है। 1971 की जंग के दौरान भारतीय नौसेना के कराची बंदरगाह पर हमलों ने पाकिस्तान की समुद्री लॉजिस्टिक्स और ईंधन सप्लाई को पंगु बना दिया। इस घटना ने दिखाया कि समुद्र पर कंट्रोल जमीन पर होने वाले नतीजों को कैसे बदल सकता है।
उस सबक की अहमियत मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फिर सामने आई, जब एक बड़े आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ गया। 8 मई से 11 मई के बीच भारत ने अपनी नौसेना को हाई अलर्ट पर रखा और कराची एक बार फिर पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरा।
कराची पाकिस्तान के ज्यादातर समुद्री व्यापार और एनर्जी इंपोर्ट को संभालता है। बिना गोली चलाए भी धमकी देने की भारत की क्षमता ने नौसैनिक और पानी के अंदर की ताकत की निवारक क्षमता को उजागर किया। ज्यादा देर तक पानी के अंदर रहने की क्षमता वाली नई सबमरीन पाकिस्तान को हिलने भी नहीं देंगी।
पानी के नीचे चीन का बढ़ता हुआ दबदबा
पाकिस्तान के अलावा समुद्र में भारत के लिए चीन एक बड़ी चुनौती है। पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी के पास एक तेजी से बढ़ता हुआ सबमरीन फ्लीट है, जिसमें न्यूक्लियर पावर वाले प्लेटफॉर्म भी शामिल हैं, जिन्हें भारतीय समुद्र में तैनात किया जा रहा है।
चीनी सबमरीन क्षेत्रीय बंदरगाहों पर डॉक की हैं और भारतीय समुद्री सीमा के करीब गश्त की है, जबकि पाकिस्तान भी चीनी मदद से अपनी सबमरीन क्षमता को अपग्रेड कर रहा है। भारतीय के लिए इस दोहरी चुनौती ने पारंपरिक सबमरीन ताकत को बहाल करना एक जरूरी प्राथमिकता बना दिया है।
प्रोजेक्ट-75I को इस कमी को पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया है, ताकि भारत को एक ऐसी टिकाऊ और लगातार काम करने वाली पानी के अंदर की क्षमता मिल सके, जो चोक पॉइंट्स की निगरानी करने, दुश्मन की सबमरीन को ट्रैक करने और समुद्र में दुश्मन को रोकने वाले ऑपरेशन करने के लिए उपयुक्त हो।