पीटीआई, नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआइआर) संबंधी उसका आदेश विधायी प्रकृति का है, इसमें मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए गए हैं और आवश्यक दस्तावेजों का उल्लेख किया गया है।
ये दलीलें चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष कई याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई के दौरान दीं। इनमें बिहार सहित कई राज्यों में एसआइआर को चुनौती दी गई थी।
द्विवेदी ने कहा, ”हमारा एसआइआर आदेश विधायी प्रकृति का है। इसमें निर्धारित सिद्धांतों और दस्तावेजों का एक संपूर्ण सेट दिया गया है। यह एक सामान्य आदेश है जो असम मामले को छोड़कर पूरे देश पर लागू होता है।”
गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स’ द्वारा दायर की गई प्रमुख याचिका सहित इन याचिकाओं में चुनाव आयोग की शक्तियों के दायरे, चुनावी उद्देश्यों के लिए नागरिकता के निर्धारण और मतदान के मौलिक अधिकार से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।
द्विवेदी ने मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन को नियंत्रित करने और चुनावों के संचालन को विनियमित करने वाली कानूनी योजनाओं का उल्लेख किया। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मतदाता पंजीकरण विशिष्ट वैधानिक शर्तों के अधीन है।
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 से 326, 1950 के अधिनियम की धारा 19 के साथ पढ़े जाने पर, चुनाव आयोग पर यह संवैधानिक दायित्व डालते हैं कि केवल नागरिकों को ही मतदाता के रूप में पंजीकृत किया जाए।
उन्होंने कहा, ”’संविधान निर्माताओं का यही उद्देश्य था।”’ उन्होंने स्पष्ट किया कि एसआइआर प्रक्रिया इस धारणा पर आधारित नहीं है कि प्रत्येक मतदाता को दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।