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क्या इंसान अभी भी विकसित हो रहे हैं और क्या भविष्य में हमारे अलग-अलग रूप हो सकते हैं? क्या हम छोटे क़द के हो जाएंगे या और लंबे होंगे?
इंसान के शारीरिक गुण अलग हो सकते हैं या उन्हें पूरी तरह जेनेटिक रूप से किसी तय स्पेसिफ़िकेशन के मुताबिक़ डिजाइन किया जा सकता है. जैसे-जैसे सभ्यता का विकास हुआ है, हम बदलते गए.
पहले बीमारी, भुखमरी और मौसम की मुश्किल परिस्थितियां हमारे इवोल्यूशन यानी विकास को प्रभावित करती थीं. जैसे-जैसे सभ्यताएं विकसित होती गईं इन कारकों का प्रभाव हमारे इवोल्यूशन पर कम होता गया.
लेकिन यूके की एंग्लिया रस्किन यूनिवर्सिटी के मानवविज्ञानी और इवोल्यूशनरी जेनेटिकिस्ट डॉ जेसन हॉजसन कहते हैं कि विकास आज भी बिना किसी संदेह के जारी है. हम यह इसलिए जानते हैं क्योंकि कुछ जीन कुछ आबादियों में ज़्यादा सामान्य होते जा रहे हैं, लेकिन यह बदलाव बहुत सारी पीढ़ियों में होता है, इसलिए कोई भी व्यक्ति अपने जीवनकाल में यह विकासवादी बदलाव नहीं देख पाता.
मानव विविधता
यूएस के स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री की पेलियोएंथ्रोपोलॉजिस्ट ब्रियाना पोबिनर कहती हैं कि हमारे खान-पान ने हमारे हाल के विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.
वह कहती हैं कि आज दुनिया की लगभग एक तिहाई आबादी वयस्क होने पर भी दूध पचा सकती है, जबकि 5 से 10 हजार साल पहले लगभग कोई भी ऐसा नहीं कर पाता था. यह बहुत तेजी से हुआ विकासवादी बदलाव है.
यह तब शुरू हुआ जब मनुष्यों ने डेयरी जानवरों को पालना शुरू किया. अकाल के समय जो लोग दूध पचा सकते थे, जिसमें वसा और प्रोटीन होता है, उनके ज़िंदा रहने की संभावना ज़्यादा थी और वे अपने जीन आगे बढ़ा पाए. इस तरह ये जीन बहुत तेजी से फैल गए, ऐसा पोबिनर समझाती हैं.
अन्य पर्यावरणीय कारकों ने भी मानव विकास को और भी पहले से प्रभावित किया है.
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इमेज कैप्शन, शोध बताते हैं कि मनुष्यों ने अलग-अलग जलवायु (क्लाइमेट) में स्किन के अलग-अलग रंग विकसित किए ताकि शरीर में पर्याप्त विटामिन डी बन सके
जब हमारी प्रजाति हजारों साल पहले अफ़्रीका से दुनिया के अलग अलग हिस्सों में फैली, तो उसे अलग अलग तरह की जलवायु का सामना करना पड़ा और उसने नए शारीरिक अनुकूलन विकसित किए. उदाहरण के लिए, जहाँ यूवी प्रकाश कम था, वहाँ हल्की त्वचा विकसित हुई ताकि शरीर विटामिन डी बेहतर तरीके से बन सके.
हॉजसन के मुताबिक़ स्थानीय विविधता तब विकसित हुई जब लोग एक दूसरे से अलग होकर अलग क्षेत्रों में बस गए.
अब हम सभी अलग अलग तरीकों से फिर से एक साथ आ गए हैं, जैसे माइग्रेशन और ग्लोबलाइज़ेशन के माध्यम से.
यह ग्लोबलाइज़ेशन (वैश्वीकरण) इस संभावना की ओर इशारा करता है कि जैविक विविधता कम हो सकती है, लेकिन चीजें इतनी सरल नहीं हैं.
हॉजसन एक चीज पर शोध करते हैं जिसे असॉर्टेटिव मेटिंग कहा जाता है यानी जब जीव ऐसे साथी चुनते हैं जो उनसे मिलते-जुलते होते हैं.
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इमेज कैप्शन, हॉजसन का मानना है कि अगर असॉर्टेटिव मेटिंग बंद हो जाए, तो ग्लोबलाइज़ेशन मनुष्यों के बीच जैविक विविधता को कम कर सकता है
हॉजसन कहते हैं कि असॉर्टेटिव मेटिंग किसी भी प्राकृतिक चयन को और तेज़ कर सकता है जो पहले से हो रहा होता है, जिससे किसी आबादी में कुछ खास गुणों को बढ़ावा मिल सकता है.
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा है कि जितने लंबे आप होते हैं, आपके जीवनसाथी के भी लंबे होने की संभावना उतनी ही अधिक होती है.
वह कहते हैं कि ऊँचाई, वजन और चेहरे की संरचना जैसी कई चीजें कुछ समूहों में असॉर्टेटिव पाई गई हैं, लेकिन सभी में नहीं, और इसका अंततः असर जीन की आवृत्ति पर पड़ता है.
इसका कुछ हिस्सा सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से जुड़ा होता है, जैसे लोग अक्सर अपने ही जातीय समूह के भीतर विवाह करते हैं. और कुछ आबादियों में ये कारक बदल भी रहे हैं.
हॉजसन कहते हैं कि ऐसी बहुत सी चीजें लगातार मानव विकास को प्रभावित कर रही हैं.
‘सब इंसान के हाथों में है’
लेकिन कुछ ऐसे विकल्प भी होते हैं जो विकास को प्रभावित नहीं करते.
उदाहरण के लिए, पोबिनर कहती हैं कि अगर आप जिम जाते हैं और कसरत करके मसल्स बना लेते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपके बच्चों को भी अच्छी मसल्स के लिए जीन मिलेंगे.
ऑर्थोडॉन्टिक्स से लेकर कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं तक, कई शारीरिक गुण अब एक ही जीवनकाल में बदले जा सकते हैं, और ये बदलाव अक्सर प्राकृतिक चयन के बजाय सामाजिक पसंद से प्रभावित होते हैं.
अंतरराष्ट्रीय सोसाइटी ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी के अनुसार, 2024 में दुनिया भर में लगभग चार करोड़ मिलियन सर्जिकल और नॉन-सर्जिकल ब्यूटी प्रोसीजर की गईं. यह 2020 की तुलना में 40 प्रतिशत की वृद्धि है. यानी लोग पैदाइसी जैसे दिखते हैं उससे कुछ अलग दिखने की चाहत उनमें बढ़ रही है.
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इमेज कैप्शन, एक ग्लोबल सर्वे के अनुसार, 2024 में आईलिड सर्जरी बेहद पॉपुलर हुई
डेनमार्क की आरहस यूनिवर्सिटी के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर और बायोइन्फॉर्मेटिक्स विशेषज्ञ थॉमस मेलुंड कहते हैं कि मेडिकल साइंस के ज़रिए हमारी शक्ल-सूरत को बदलने की इस बढ़ती क्षमता का मतलब है कि अब हमेशा ऐसा नहीं होता कि आप वैसे दिखें जैसे आपके जीन तय करते हैं कि आपको दिखना चाहिए.
और भविष्य में शायद हम सिर्फ बाहरी रूप ही नहीं बदल पाएँगे. वैज्ञानिक क्रिस्पर नाम की एक तकनीक का उपयोग करके मानव जीन को एडिट कर रहे हैं.
इस तकनीक के ज़रिए एक हिस्सा लक्ष्य डीएनए को खोजता है और दूसरा उसे बदल देता है. यह तकनीक लगातार बेहतर हो रही है और कुछ सीमित आनुवंशिक बीमारियों (जेनेटिक बीमारियों), जैसे कुछ ख़ून की गड़बड़ी के इलाज में इसका इस्तेमाल शुरू भी हो चुका है.
अगर यह तकनीक बहुत आगे बढ़ जाए और व्यापक रूप से उपलब्ध हो जाए, तो सिद्धांत रूप में एक दिन यह संभव हो सकता है कि मानव के और भी गुणों को आनुवंशिक स्तर पर बदला जाए, वह भी कई पीढ़ियों में धीरे धीरे नहीं, बल्कि एक ही कदम में. यानी हम अपने बच्चों में मनचाहे गुण विकसित पैदा करने की क्षमता रख सकेंगे.
और अगर यह जर्मलाइन कोशिकाओं में किया जाए, यानी उन कोशिकाओं में जो शुक्राणु और अंडाणु बनती हैं, तो जीन में किए गए बदलाव अगली पीढ़ियों में भी विरासत में मिल सकते हैं.
लेकिन हम अभी इससे बहुत दूर हैं कि इसे सुरक्षित तरीके से और पूरी गारंटी के साथ किया जा सके.
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इमेज कैप्शन, क्रिस्पर तकनीक दुनिया के कुछ हिस्सों में सिकल सेल जैसी रक्त संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए मंजूर की गई है, लेकिन यह बहुत महंगी है
यह अब लगभग पूरी तरह से स्वीकार किया जाता है कि मनुष्यों में ऐसा करना उचित नहीं है, यह पूरी तरह अनैतिक होगा, ऐसा हॉजसन कहते हैं.
लेकिन उनका अनुमान है कि भविष्य में यह बदल सकता है.
वे कहते हैं कि 5,000 साल बाद शायद स्थिति उलटी हो जाए, यानी एक समय ऐसा आ सकता है जब जीनोम एडिटिंग करना अनैतिक न होकर, इसे न करना ही अनैतिक माना जाए, क्योंकि हम वंशानुगत बीमारियों को खत्म करने में सक्षम हो सकते हैं.
अगर यह तकनीक व्यापक रूप से उपलब्ध हो जाती है, तो यह माता-पिता को यह विकल्प भी दे सकती है कि वे अपने बच्चों की शक्ल-सूरत और अन्य गुण जीन एडिटिंग के जरिए चुन सकें.
हॉजसन कहते हैं कि व्यापक अर्थ में मानव विकास का भविष्य वास्तव में मनुष्यों के हाथों में चला जाएगा, लेकिन हम अभी उस स्थिति से बहुत दूर हैं. इस तकनीक के बारे में अभी भी बहुत कुछ समझना बाकी है, और वे कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि वे अपने जीवनकाल में इसका ऐसा रूप नहीं देखेंगे.
नई प्रजातियां
मेलुंड कहते हैं कि यह अनुमान लगाना असंभव है कि भविष्य में मनुष्य कैसे दिखेंगे, जब तक हमें यह न पता हो कि हमारा पर्यावरण कैसे बदलेगा.
अगर बहुत दूर के भविष्य की बात करें, तो संभव है कि हम एक नई प्रजाति बन चुके हों.
लगभग दस लाख साल पहले मानव प्रजातियाँ जैसे होमो इरेक्टस पृथ्वी पर मौजूद थीं. हमारी अपनी प्रजाति, होमो सेपियन्स, लगभग 3 लाख साल पहले अस्तित्व में आई.
मेलुंड कहते हैं कि अगर हम दस लाख साल और इंतज़ार करें, तो हमारे वंशज हमसे उतने ही अलग होंगे जितना होमो इरेक्टस हमसे अलग है.
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इमेज कैप्शन, होमो इरेक्टस हमारे पूर्वजों में पहली प्रजाति थी जिनके शरीर का अनुपात मनुष्यों जैसा था, और वे कम से कम 2,50,000 साल पहले तक मौजूद रहे
फिर भी वे चेतावनी देते हैं कि प्रजातियों के बीच अंतर शायद उतने स्पष्ट नहीं होंगे जितना हम सोचते हैं.
वे कहते हैं कि उन्हें यकीन नहीं है कि हम किसी होमो इरेक्टस को देखकर यह पहचान पाएँगे कि वह हमसे बहुत अलग है.
यह भी संभव है कि हमारी प्रजाति दो भागों में बँट जाए, उदाहरण के लिए अगर हम में से कुछ लोग अंतरिक्ष जैसे नए वातावरण में बस जाएँ.
मेलुंड कहते हैं कि अगर आप चंद्रमा पर रहते हैं तो वहाँ कम गुरुत्वाकर्षण होगा, और मंगल पर भी कम गुरुत्वाकर्षण है, इसलिए वहाँ के अनुसार अनुकूलन करना होगा.
वास्तव में एक नई प्रजाति के विकसित होने के लिए इन आबादियों को कई पीढ़ियों तक पृथ्वी के लोगों से पूरी तरह अलग रहना होगा.
लेकिन अगर हम विकास को पूरी तरह भाग्य पर न छोड़ें तो क्या होगा?
जीन तकनीक की मदद से अपने जीन बदलने की संभावना के साथ मेलुंड का मानना है कि असली सवाल यह नहीं है कि जीवविज्ञान हमारे साथ क्या करेगा, बल्कि यह है कि हम क्या चुनेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.