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कलाश्निकोव राइफ़ल एके-47 दुनिया के सबसे मशहूर हथियारों में से एक है. यह अपेक्षाकृत सस्ती है. इसका निर्माण और रखरखाव करना भी आसान है.
यही वजह है कि एशिया और अफ़्रीका में गुरिल्ला संगठनों के साथ-साथ कई देशों की सेनाओं में भी इसका व्यापक इस्तेमाल होता है.
माना जाता है कि दुनिया भर में 10 करोड़ से अधिक कलाश्निकोव राइफ़लें बेची जा चुकी हैं.
बिहार के सिवान में पुलिस के एक जवान की ओर से एके-47 राइफ़ल से हवाई फ़ायरिंग की घटना के बाद यह राइफ़ल इन दिनों चर्चा में है.
सिवान ज़िले में 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे स्टूडेंट्स की भीड़ की ओर बिहार पुलिस के एक जवान ने एके-47 राइफ़ल से फ़ायरिंग की, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया.
एके-47 से फ़ायरिंग के इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया कि बिहार पुलिस के एसआईटी के जवान अभिषेक पटेल को निलंबित कर दिया गया है.
दरअसल इस हथियार को बेहद ख़ास माना जाता है और इसका इस्तेमाल आम हथियारों की तरह नहीं किया जाता है. ऐसे में सिविल पुलिस की ओर से एके-47 से फ़ायरिंग कर देना बहुत बड़े विवाद का विषय बन गया है.
सिवान पुलिस की ओर से एके-47 से फ़ायरिंग के मुद्दे पर स्थानीय ज़िलाधिकारी (डीएम) विवेक रंजन मैत्रेय ने कहा, “उन्हें आदेश नहीं था, उन्हें हवाई फ़ायरिंग भी नहीं करनी चाहिए थी. उन्हें इस तरह का हथियार पब्लिक में लेकर नहीं जाना चाहिए था. वो फंस गए थे, वो कहीं और जा रहे थे और वहां फंस गए थे.”
हालांकि यह विवाद अब भी ख़त्म नहीं हुआ है. आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव के साथ ही उनकी पार्टी के अन्य नेता भी इस पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
आगे हम कुछ ऐसे अधिकारियों से बात करेंगे, जिनका अलग-अलग ऑपरेशन में एके-47 राइफ़ल से रिश्ता रहा है और जानने की कोशिश करेंगे कि यह बंदूक क्यों इतनी लोकप्रिय है और भारत में इसका इस्तेमाल कब से शुरू हुआ. सिविल पुलिस के लिए इस बंदूक के इस्तेमाल को लेकर क्या कोई गाइडलाइन्स हैं?
सुरक्षाबलों के लिए निर्देश

अरुण कुमार पूर्व आईपीएस अधिकारी रह चुके हैं. उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस में कई अहम पदों पर सेवाएं दी हैं. उन्होंने कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ल को पकड़ने के लिए बनाई गई एसटीएफ़ की टीम का भी नेतृत्व किया था.
अरुण कुमार कहते हैं, “पुलिस या सुरक्षाबलों को ट्रेनिंग दी जाती है कि भीड़ या प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए कम से कम ताक़त का इस्तेमाल करना है, उनके लिए चेतावनी देने का प्रावधान है. ऐसे मामलों में फ़ायर वेपन का इस्तेमाल सबसे अंतिम विकल्प होता है.”
वह बताते हैं, “सबसे पहले लोगों को चेतावनी दी जाती है कि वे चले जाएं. उसके बाद वाटर कैनन का इस्तेमाल किया जाता है. अगर इससे भीड़ काबू में न आए तो आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं. उसके बाद लाठी चार्ज किया जाता है.”
उनका कहना है कि अगर भीड़ हिंसक हो जाए या वो हमला करने के लिए आए और ऐसा लगे कि भीड़ जान ले सकती है तो उनकी जान बचाते हुए हवाई फ़ायरिंग की जा सकती है ताकि भीड़ तितर-बितर हो जाए. यह अंतिम विकल्प होता है.
वहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडे कहते हैं, “सिवान में जो हुआ वह ठीक नहीं था. ऐसा करना नैतिक तौर पर भी सही नहीं है. वह भीड़ हथियारबंद नहीं थी, ऐसे में फ़ायरिंग करना किसी भी पुलिस के लिए उचित नहीं है.”
एके 47 कितना ख़ास हथियार

अवतोमत क्लाश्निकोव राइफ़ल का आविष्कार रूस के मिखाइल कलाश्निकोव ने साल 1947 में किया था. यह राइफ़ल दुनियाभर में सुरक्षाबलों, हथियारबंद गुटों और कुख्यात आपराधिक गिरोहों के बीच भी काफ़ी लोकप्रिय है.
राजेश पांडे बताते हैं, “मैं साल 2008-09 में संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन में कोसोवो गया था. हम लोगों को कई आधुनिक हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी, लेकिन एके- 47 का कोई जवाब नहीं है. इसकी मार बहुत घातक होती है और इसे चलाना बहुत आसान है. इसका निशाना सटीक है.”
उनका कहना है, “200 या 300 मीटर की दूरी से भी सही जगह पर लग जाए तो यह इंसान की जान ले सकती है, जबकि पुराने छोटे हथियारों की रेंज 30-40 मीटर तक ही होती है.”
अरुण कुमार कहते हैं, “एके-47 को फ़ायर करने के लिए इसमें दो विकल्प होते हैं. अगर इसे एस (सिंगल) पर रखा जाए तो यह कंट्रोल्ड फ़ायर करता है, यानी इससे एक फायर में केवल एक गोली निकलती है.
वहीं इसे आर यानी रिपीट मोड पर चलाया जाए तो एक फ़ायर में ही इसकी पूरी मैगज़ीन खाली हो जाती है.
इसमें ऑटोमेटिक मोड में एक साथ 30 गोलियां फ़ायर की जा सकती हैं. हालाँकि अब कुछ मामलों में एक साथ दो मैगज़ीन का इस्तेमाल भी होता है यानी एक बार फ़ायर करने पर 60 गोलियां बाहर आ जाती हैं.
राजेश पांडे बताते हैं, “एके-47 की आवाज़ बहुत ही ख़ास होती है. जो इस राइफ़ल से परिचित है, वह आवाज़ सुनकर ही बता देगा कि फ़ायरिंग एके-47 से हुई है.”
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अरुण कुमार कहते हैं, “ऐसा स्पेशल ऑपरेशन के दौरान होता है कि आपको एक बार में ही ज़्यादा फ़ायर करना होता है. मसलन युद्ध, आतंकवादी हमला या किसी किडनैपिंग के केस में जब दुर्दांत अपराधियों के पास भी घातक हथियार हों.”
उनका कहना है, “लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के मामले में इसके आर मोड का इस्तेमाल कभी नहीं होता है. हमारी ट्रेनिंग होती है कि एक गोली एक दुश्मन. हमें गोली बर्बाद नहीं करनी होती है. सिविलियन दुश्मन नहीं होते हैं, इसलिए उन पर इसका इस्तेमाल नहीं होता है.”
भारत में कब पहुंची एके- 47
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राजेश पांडे बताते हैं भारत में एके-47 के लोकप्रिय होने का इतिहास सोवियत संघ के अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप के दौर से जुड़ा है. यह 1970 के दशक के अंतिम महीनों की बात है, जब सोवियत रूस की सेना एके 47 के साथ अफ़ग़ानिस्तान पहुंची थी.
भारत के पड़ोस में इस हथियार के पहुंचने के बाद लोगों ने इसका असर देखा और यह भारत में भी लोकप्रिय होने लगा.
भारत में सबसे पहले यह हथियार सेना, अर्धसैनिक बलों, सीमावर्ती राज्यों और उत्तर-पूर्व के उग्रवाद प्रभावित इलाकों में पुलिस को दिया गया. इसके साथ ही नक्सल प्रभावित इलाक़ों में भी हथियारबंद गुटों से मुक़ाबले के लिए पुलिस को एके-47 दी गई.
राजेश पांडे बताते हैं, “1980 के दशक के अंतिम वर्षों में पंजाब पुलिस और पूर्वोत्तर राज्यों की पुलिस को यह हथियार दिया गया. साथ ही नक्सल प्रभावित इलाक़ों में भी पुलिस को एके-47 दी गई, फिर जम्मू-कश्मीर पुलिस को भी यह हथियार मिला.”
पंजाब और जम्मू-कश्मीर के साथ ख़ास बात यह है कि दोनों ही राज्य अंतरराष्ट्रीय सीमा के साथ लगे हुए हैं. 1980 के दशक में पंजाब काफ़ी संवेदनशील स्थिति में था और बाद में कश्मीर में भी हथियारबंद अलगाववादी गुट सक्रिय थे.
राजेश पांडे का कहना है, “दक्षिण भारत में चंदन तस्कर वीरप्पन को पकड़ने के लिए एसटीएफ़ (स्पेशल टास्क फ़ोर्स) बनाई गई थी और उन्हें एके-47 दी गई थी. उत्तर प्रदेश में भी तराई के इलाक़ों में सिख चरमपंथ से निपटने के लिए राज्य पुलिस को एके-47 दी गई थी. उस समय प्रकाश सिंह हमारे पुलिस महानिदेशक थे.”
भारत में एके-47 से जुड़ी सबसे चर्चित घटना
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12 मार्च 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे, जिनमें कई लोगों की जान गई थी. इसकी जांच के दौरान पकड़े गए अभियुक्तों से पूछताछ के आधार पर 19 अप्रैल, 1993 मुंबई पुलिस ने संजय दत्त को गैरक़ानूनी ढंग से हथियार रखने के जुर्म में गिरफ़्तार किया.
पुलिस ने उनके घर पर तलाशी के दौरान एक एके-56 राइफ़ल ज़ब्त की थी. 28 नवंबर, 2006 को संजय दत्त ‘आर्म्स एक्ट’ के तहत दोषी पाए गए, लेकिन उन्हें ‘टाडा’ से जुड़े सभी मामलों से बरी कर दिया गया.
राजेश पांडे बताते हैं, “एके 56 भी एके-47 के समान ही है. यह भी क्लाश्निकोव गन है और थोड़ा एडवांस है. इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि आज भी जब आप अफ़ग़ानिस्तान या किसी अन्य देश में हथियारबंद गुटों की तस्वीरें या वीडियो देखेंगे तो उनमें लोगों के पास एके-47 नज़र आएगा.”
“यह हमले ही नहीं, ताक़त का प्रदर्शन और जश्न के तौर पर इस्तेमाल होता है. जब हम कोसोवो में थे तो उसी दौरान कोसोवो ने अपनी आज़ादी की घोषणा की थी और बड़ी संख्या में लोगों ने छतों पर चढ़कर क्लाश्निकोव से फ़ायर कर जश्न मनाया था.”
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भारत में एके-47 से जुड़ी एक चर्चित घटना 17 दिसंबर, 1995 की रात की है. एक रूसी एंटोनोव एएन 26 विमान ने कराची से ढाका के लिए टेकऑफ़ किया.
उस विमान में आठ यात्री सवार थे. विमान ने वाराणसी के बाबतपुर हवाई अड्डे पर ईंधन भरवाया.
बाद में जांच में पता चला था कि इन्हीं एके-47 में से कुछ बिहार और उत्तर प्रदेश से जुड़े अपराधियों तक भी पहुंच गईं.
इन्हीं में उत्तर प्रदेश में ख़ूँख़ार अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ल का नाम भी अहम है, जिसे पकड़ने के लिए साल 1998 में एसटीएफ़ का गठन किया गया था और इस एसटीएफ़ को भी एके-47 राइफ़ल दी गई थी.
अरुण कुमार कहते हैं, “पहले पुलिस के पास थ्री नॉट थ्री बंदूक हुआ करती थी. यह दूसरे विश्व युद्ध का हथियार था. उस वक़्त आम लोगों या सामान्य अपराधियों के पास फ़ायर आर्म्स आमतौर पर नहीं होते थे. उस समय ‘आतंकवाद’ कोई मुद्दा नहीं था.”
उन्होंने बताया कि समय बदला तो एसएलआर और अन्य आधुनिक तकनीक की बंदूकें सुरक्षाबलों को दी जाने लगीं.
एके-47 सबसे पहले स्पेशल ऑपरेशन करने वाले आर्म्ड फ़ोर्सेस और अर्धसैनिक बलों को मिला, उसके बाद सिविल पुलिस को भी ख़ास मक़सद के लिए ऐसे हथियार दिए जाने लगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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