एसआईआर अगर ज़रूरी है तो फिर इसका इतना विरोध क्यों हो रहा?- द लेंस
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चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव की उम्र 92 साल है. वो देश के जाने-माने वैज्ञानिक हैं. उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है.
मगर इस हफ़्ते की शुरुआत में उन्हें कर्नाटक में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न यानी एसआईआर के तहत “सेल्फ-नेम मिसमैच” को लेकर नोटिस दिया गया.
इसके चलते एक बार फिर देश में जारी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हुए.
देशभर में क़रीब 13 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से बाहर किए गए हैं.
चुनाव आयोग का कहना है कि इस एक्सरसाइज़ का मक़सद मतदाता सूचियों को सटीक और अपडेटेड करना है.
कुछ हफ़्ते पहले तीन देशों में भारत के राजदूत रह चुके नवदीप सूरी ने भी पंजाब में चल रही एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे.
ये मामला उनकी डीटेल्स और 2003 की वोटर लिस्ट के बीच सामने आई कुछ विसंगतियों के बाद उठा. ऐसे में सवाल कई हैं.
मतदाता सूची में हर साल रिविज़न होता है, तो एसआईआर की ज़रूरत क्यों पड़ी? अगर किसी नागरिक का नाम ग़लती से अंतिम वोटर लिस्ट से बाहर रह जाता है, तो उसके पास क्या क़ानूनी और प्रशासनिक रास्ते होंगे?
क्या इस पूरी प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता और जवाबदेही है? द लेंस के आज के एपिसोड में ऐसे ही सवालों पर चर्चा की गई.
इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए पीपल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन के राष्ट्रीय अभियान की सह-संयोजक अंजलि भारद्वाज और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा.
प्रोड्यूसरः शिल्पा ठाकुर, सईदुज़्जमान
गेस्ट कोऑर्डिनेटरः संगीता यादव
वीडियो एडिटिंगः परवेज़ अहमद
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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