जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। भारतीय राजनीतिक इतिहास में कई हाई-प्रोफाइल उपचुनावों के नतीजे चौंकाने वाले रहे हैं, जिनमें बड़े नेताओं, वर्तमान मुख्यमंत्रियों या सत्ताधारी पार्टियों को अपने मजबूत गढ़ों में हार का सामना करना पड़ा है।
1971 में गोरखपुर जिले की मनिराम सीट पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह उपचुनाव हार गए। चूंकि पद संभालने के समय वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे, इसलिए इस हार के कारण उन्हें तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसे किसी उपचुनाव में भारतीय राजनीति का पहला बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जाता है।
सबसे मशहूर पराजय के बारे में भी जानिए
सबसे मशहूर चुनावी पराजय में इंदिरा गांधी (रायबरेली, 1977) और डॉ. बीआर आंबेडकर (बांबे सिटी नार्थ, 1951-52) का जिक्र अक्सर किया जाता है। हालांकि, ये हार आम चुनावों के दौरान हुई थीं, न कि उपचुनावों में।
2023 के उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार रवींद्र धांगेकर ने पुणे जिले की कस्बा पेठ विधानसभा सीट जीतकर भाजपा को एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका दिया था। भाजपा ने इससे पहले 28 वर्षों तक इस सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा था।
गोरखपुर लोकसभा सीट भी बना था चर्चा का विषय
उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर लोकसभा सीट से त्यागपत्र दे दिया था। इस सीट पर लगातार पांच बार से योगी आदित्यनाथ चुनाव जीतते रहे थे। लेकिन, 2018 में हुए उपचुनाव में भाजपा को सपा-बसपा गठबंधन से हार का सामना करना पड़ा था।
शिबू सोरेन की हार भी बना था चर्चा का विषय
भारतीय राजनीतिक इतिहास में 2009 में शिबू सोरेन की हार किसी मौजूदा मुख्यमंत्री के उपचुनाव हारने के सबसे चर्चित मामलों में से एक है। झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री को तमार विधानसभा सीट पर नौ हजार से अधिक वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
27 अगस्त, 2008 को मुख्यमंत्री बनने के बाद पद पर बने रहने के लिए सोरेन को छह महीने के भीतर विधानसभा पहुंचना जरूरी था। इस अप्रत्याशित हार के कारण उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा, जिसके बाद झारखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।