डिजिटल डेस्क, तिरुवंतपुरम। केरलम के पूर्व राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर ने अपना पद अपने उत्तराधिकारी को सौंपने से कुछ दिन पहले राष्ट्रपति से केरलम लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एम.आर. बैजू और उसके सदस्यों को हटाने की मांग की।
सूत्रों के मुताबिक केरलम के इतिहास में यह पहला मामला है जब किसी राज्यपाल ने सीधे राष्ट्रपति को पत्र लिखकर भर्ती आयोग के शीर्ष नेतृत्व को बर्खास्त करने और आयोग के काम काज की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
क्यों की गई सिफारिश?
यह कदम राज्य योजना बोर्ड और आयोग द्वारा आयोजित अन्य भर्ती परीक्षाओं में सामने आई कथित अनियमितताओं के बाद उठाया गया है।
इन अनियमितताओं की जांच क्राइम ब्रांच कर रही है, लेकिन आयोग के अध्यक्ष, सदस्य और आला अधिकारियों के जांच टीम के सामने पेश न होने के कारण जांच रुकी पड़ी थी।
केरलम के उच्च न्यायालय ने शनिवार को मामले की धीमी जांच पर नाराजगी जताते हुए सरकार और विपक्ष के बीच आपसी मिलीभगत को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे।
आर्लेकर के कार्यकाल के दौरान युवा मोर्चा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने भर्तियों में धांधली को लेकर शिकायतें दर्ज कराई थीं। राज्यपाल ने आंतरिक सतर्कता विंग व पुलिस जांच रिपोर्ट की समीक्षा के बाद यह सख्त कदम उठाया।
पद छोड़ने से ठीक पहले की मांग
राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर के पास केरलम के साथ तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार भी था। हाल ही में उन्हें पूर्णकालिक रूप से तमिलनाडु भेजा गया और 23 अक्टूबर को केरलम के दायित्व से मुक्त किया गया, जिसके बाद ओम प्रकाश माथुर ने केरलम के नए राज्यपाल के रूप में कार्यभार संभाला। आर्लेकर ने अपने उत्तराधिकारी को पद सौंपने से ठीक पहले यह पत्र राष्ट्रपति को भेजा।
क्या है संवैधानिक प्रक्रिया?
राज्यपाल की इस सिफारिश से आयोग के अध्यक्ष या सदस्य तुरंत पद से नहीं हटते हैं। संविधान के तहत राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों को हटाने की एक बेहद सुरक्षित और सख्त प्रक्रिया है।
राज्य सरकार या राज्यपाल के पास पीएससी अध्यक्ष या सदस्यों को सीधे पद से हटाने का कोई अधिकार नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 317 के तहत ‘कदाचार’ के आरोपों पर राष्ट्रपति यह मामला जांच के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट को भेजते हैं।
यदि शीर्ष अदालत जांच में आरोपों को सही पाती है और हटाने की सिफारिश करती है, तभी राष्ट्रपति औपचारिक बर्खास्तगी का आदेश जारी करते हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट को भेजे जाने के बाद राज्यपाल के पास संबंधित व्यक्तियों को जांच पूरी होने तक निलंबित करने का अधिकार होता है।