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कोलकाता की 11 सीटों पर TMC की हैट्रिक को चुनौती, भवानीपुर से जोड़ासांको तक सियासी घमासान

Byadmin

Apr 26, 2026


राजीव कुमार झा, कोलकाता। बंगाल चुनाव में राजधानी कोलकाता की 11 विधानसभा सीटें राज्य की सियासत का केंद्र मानी जाती हैं। ये सीटें सिर्फ संख्या के लिहाज से नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश और शहरी मूड तय करने के कारण बेहद अहम हैं। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कोलकाता की सभी 11 विधानसभा सीटों पर तृणमूल कांग्रेस शानदार जीत दर्ज करती आ रही है।

इस बार भाजपा ने इसमें सेंध लगाने व कमल खिलाने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है। इन सीटों पर उच्च व मध्यम वर्ग से लेकर झुग्गी बस्तियों के निवासी, अल्पसंख्यक समुदाय और कामकाजी वर्ग का मिश्रण चुनावी परिणामों को जटिल बनाता है। चुनाव आयोग ने प्रशासनिक रूप से इन 11 सीटें को दो जिलों- उत्तर कोलकाता व दक्षिण कोलकाता में बांट रखा है।

इसमें भवानीपुर खुद मुख्यमंत्री व तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी का गृह व परंपरागत विधानसभा क्षेत्र है, जो इस क्षेत्र को राजनीतिक रूप से और भी हाई-प्रोफाइल बनाती है। राज्य की सबसे हाई प्रोफाइल भवानीपुर सीट पर इस बार बेहद दिलचस्प मुकाबला है, जहां ममता के विरुद्ध भाजपा की तरफ से उनके पूर्व सहयोगी व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं। इस सीट पर पूरे देश की नजर है।

2019 के बाद भाजपा ने बढ़ाई है पैठ

भाजपा ने 2019 लोकसभा चुनाव के बाद से शहरी क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ाई है, जिसका असर इन सीटों पर भी दिख रहा है। 2021 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में कोलकाता की कई सीटों पर भाजपा के वोट प्रतिशत में काफी वृद्धि देखी र्गई।ये हैं प्रमुख मुद्देकोलकाता की इन 11 सीटों पर सबसे बड़ा मुद्दा है- पुरानी शहरी बुनियादी संरचना।

कई इलाकों में अब भी 100 साल से ज्यादा पुरानी जल निकासी प्रणाली काम कर रही है, जिससे हर वर्षा में जलजमाव आम समस्या बन जाती है। इसके अलावा घनी व बढ़ती आबादी, सड़कों का पुराना ढांचा, ट्रैफिक जाम, पार्किंग की समस्या और प्रदूषण भी लोगों की चिंता का विषय है। रोजगार और छोटे व्यापारियों की स्थिति भी बड़ा मुद्दा है। युवा वर्ग निजी क्षेत्र में अवसरों की कमी को लेकर नाराज दिखता है।

राजनीतिक समीकरण

तृणमूल का सबसे बड़ा भरोसा महिला वोट बैंक और अल्पसंख्यक समर्थन पर है। लक्ष्मी भंडार और अन्य सामाजिक योजनाओं का असर दिखता है। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी भाजपा बदहाल शहरी व्यवस्था, बढ़ते घुसपैठ व परिवर्तन जैसे मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है। वाममोर्चा और कांग्रेस भी पारंपरिक वोट बैंक को फिर से जोड़ने की कोशिश में है। हालांकि, संगठनात्मक मजबूती के मामले में वे तृणमूल और भाजपा से काफी पीछे दिखते हैं।

सीट-दर-सीट दिलचस्प मुकाबला

कोलकाता की 11 सीटों में सामाजिक विविधता साफ दिखती है। इसमें कोलकाता पोर्ट, चौरंगी, एंटाली व श्यामपुकुर में अल्पसंख्यक वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भवानीपुर व बालीगंज में उच्च मध्यम वर्ग, गुजराती-मारवाड़ी व हिंदी भाषी, रासबिहारी व बेलेघाटा में शिक्षित वर्ग, जोड़ासांको में व्यापारी, मारवाड़ी व हिंदी भाषी, काशीपुर में श्रमिक और मानिकतल्ला में मिश्रित मध्यम वर्ग निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

कई सीटों पर हिंदी भाषियों का है प्रभाव

कई सीटों पर ¨हदी भाषी मतदाताओं का भी खासा प्रभाव है। जिसमें जोड़ासांको, श्यामपुकुर, काशीपुर-बेलगछिया व चौरंगी में इनका प्रभाव सबसे ज्यादा निर्णायक माना जाता है। खासकर पुराने व्यापारिक क्षेत्र में अच्छी-खासी मौजूदगी हैं। भवानीपुर, बालीगंज, रासबिहारी, बेलेघाटा व मानिकतल्ला में भी हिंदी भाषी कुछ पाकेटों में मौजूद हैं।

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