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‘चीन से सामान्य संबंधों के लिए एलएसी पर शांति जरूरी’, जयशंकर बोले- स्थिति काफी हद तक सामान्य

Byadmin

Oct 15, 2026


पीटीआई, नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत और चीन के संबंध सामान्य करने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता जरूरी है। सीमा पर किसी भी तरह की गड़बड़ी व अशांति के नकारात्मक परिणाम होंगे।

जयशंकर ने दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों के विस्तार को भी सीमा पर शांति और स्थिरता से जोड़ा।

मंगलवार शाम ब्लूमबर्ग न्यू इकोनमी फोरम में जयशंकर ने कहा कि 2024 से एलएसी की स्थिति काफी हद तक सामान्य हुई है और दोनों देशों के संबंध भी सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं।

पूर्वी लद्दाख में साढ़े चार साल से अधिक समय तक चले सैन्य गतिरोध से प्रभावित हुए संबंधों को सुधारने के लिए दोनों पक्षों ने पिछले कुछ महीनों में विश्वास बहाली के कई कदम उठाए हैं। आमना-सामना 2024 के आखिर में समाप्त हुआ था।

यह पूछे जाने पर कि सीमा के मुद्दे पर प्रारंभिक सहमति होने पर क्या भारत चीनी निवेश बढ़ाने देगा, जयशंकर ने कहा कि विभिन्न संभावनाओं पर विचार हो रहा है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि कारोबार के लिए सीमा विवाद का समाधान अनिवार्य नहीं, लेकिन शांति और स्थिरता बनाए रखना जरूरी है। सीमा पर प्रारंभिक सहमति को कारोबार नीति या बाजार तक पहुंच से जुड़े फैसलों से अलग रखा जाएगा।

जयशंकर ने चीन के साथ आर्थिक मुद्दों पर चिंता जताते हुए कहा कि व्यापार संतुलन पूरी तरह चीन के पक्ष में झुका है। कई क्षेत्रों में भारत को चीन के बाजार तक पहुंच नहीं मिली, जबकि भारत ने चीन को समान अवसर दिए हैं।

जयशंकर ने 2020 में गलवन घाटी में हुई झड़पों का भी जिक्र किया और बताया कि उनसे दोनों देशों के संबंधों पर कितना गंभीर असर पड़ा। उन्होंने कहा-“1975 से 2020 तक पूरे 45 साल उस सीमा पर कोई रक्तपात नहीं हुआ। वहां आखिरी बार 1975 में लोगों की जान गई थी। इस दौरान भारत-चीन संबंधों में प्रगति हुई।”

उन्होंने कहा-“फिर 2020 में जब कोविड लाकडाउन चल रहा था, सीमा पर कई घटनाएं हुईं और अंत में ऐसी झड़प हुई जिसमें दोनों पक्षों के कई सैनिक मारे गए।” उनके अनुसार, सीमा पर शांति भंग होने का असर संबंधों पर पड़ा और इसके परिणाम कई वर्षों तक दिखे, जब तक स्थिरता बहाल नहीं हुई।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि भारत और अमेरिका प्रस्तावित ट्रेड डील पर मतभेद दूर करने के लिए बातचीत जारी रखे हुए हैं और बातचीत अब लैंडिंग प्वाइंट तक पहुंचने के करीब है। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी के मुख्य आधार वैसे ही बने हुए हैं।

उधर, एएनआइ के अनुसार, जयशंकर ने कहा कि भारत ‘मिडल पावर’ नहीं, पावर इन द मिडल है। उन्होंने कहा कि भारत को ‘मिडल पावर’ कहा जाना पसंद नहीं है क्योंकि देश की आबादी, अर्थव्यवस्था का आकार और विकास की क्षमता को देखते हुए यह शब्द उसकी स्थिति को सीमित करता है।

ग्लोबल पावर स्ट्रक्चर के बीच स्थित देशों को अपने हितों का आकलन खुद करना होगा, स्वतंत्र नीतियां बनानी होंगी और एक-दूसरे के साथ व्यवस्थाएं कायम करनी होंगी। उन्होंने कहा कि एक तरह से हम मिडिल पावर की बजाय बीच में मौजूद शक्तियां हैं।

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