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झारखंड के बोकारो स्थित पिंड्राजोरा थाने में तैनात सभी 28 पुलिसकर्मियों को ज़िला पुलिस अधीक्षक ने निलंबित कर दिया है.
इन पुलिसकर्मियों में 10 सब-इंस्पेक्टर, 5 असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर, 2 हवलदार और 11 सिपाही शामिल हैं. निलंबित पुलिसकर्मियों पर आरोप है कि इन्होंने आठ महीने पहले हुए पुष्पा महतो के अपहरण और हत्या के अभियुक्त के साथ सांठगांठ कर केस की जांच को कमज़ोर किया.
पुष्पा महतो के पिता अनंत सिंह की आंखों में आंसू हैं. उनके चेहरे पर बेटी से अब कभी न मिल पाने का ग़म और बेटी के लिए इंसाफ़ की लंबी लड़ाई लड़ने की चिंता साफ़ नज़र आती है.
लेकिन हालिया कार्रवाई से उन्हें थोड़ी तसल्ली मिली है. वो कहते हैं, “पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ ये कार्रवाई घटना के लगभग आठ महीने बाद झारखंड हाईकोर्ट के दख़ल से संभव हुई है.”
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दरअसल हाईकोर्ट के दख़ल के बाद झारखंड पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्रा के आदेश पर ज़िला पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह ने एक एसआईटी का गठन किया था. इस कार्रवाई से ठीक पहले इस एसआईटी ने मुख्य अभियुक्त दिनेश महतो को 11 अप्रैल की सुबह गिरफ्तार किया.
मुख्य अभियुक्त से हुई पूछताछ के बाद 11 अप्रैल की शाम एसआईटी ने पुष्पा महतो के कथित कंकाल के अवशेष उसके कॉलेज से एक किलोमीटर दूर जंगल से बरामद किए.
‘पुलिस सक्रिय होती तो बेटी ज़िंदा होती’
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ज़िला पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह ने बताया कि कंकाल के डीएनए टेस्ट की प्रक्रिया चल रही है. बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से उन्होंने कहा, “अभियुक्त दिनेश महतो के ख़िलाफ़ इसी केस में हत्या की धारा लगाई गई है.”
बेटी का कथित कंकाल मिलने के बाद अत्यंत असहज अनंत महतो कहते हैं, “21 जुलाई की शाम जब मेरी पत्नी थाने गई तभी पुलिस सक्रिय होती, तो शायद मेरी बेटी आज ज़िंदा होती.”
40 वर्षीय अनंत सिंह से सहमत उनकी पत्नी रेखा देवी शिकायत करते हुए कहती हैं, “मैंने दर्जनों बार थाना प्रभारी से लेकर पुलिस अधीक्षक तक हर किसी से फ़रियाद लगाई, किसी ने भी समय पर मेरी लापता बेटी की सुध ही नहीं ली.”
परिजन के आरोपों को ख़ारिज करते हुए पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह बीबीसी से कहते हैं, “परिजन मेरे पास आते थे, मैं मिलता था, सुनता था और उनको यही बताता था कि मामले को मॉनिटर कर रहा हूं, और मैं कर भी रहा था.”
कॉलेज के लिए निकली और कभी लौटी नहीं पुष्पा
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बोकारो के खुंटाडीह गांव की रहने वाली 18 वर्षीय पुष्पा महतो 21 जुलाई 2025 को दस किलोमीटर दूर चास स्थित अपने कॉलेज के लिए साइकिल से निकली थीं.
उनकी मां रेखा देवी स्थानीय खेतों में मज़दूरी करने चली गईं. शाम को घर लौटने पर पता चला कि पुष्पा वापस नहीं आई थी. उसके बाद वह बेटी की तलाश में कई घंटे गांव के गली-मोहल्ले में भटकती रहीं.
कुछ पता न चलने पर रेखा देवी पिंड्राजोरा थाना पहुंचीं. आरोप है कि पुलिस ने आश्वासन देकर उन्हें वापस भेज दिया. वह रोज़ थाने जातीं और बेटी की तलाश के लिए फ़रियाद करतीं. 24 जुलाई को थाना प्रभारी अभिषेक रंजन ने सनहा (जनरल डायरी एंट्री) दर्ज किया.
रेखा देवी कहती हैं कि “डायरी एंट्री हुई लेकिन प्राथमिकी (एफ़आईआर) दर्ज करने से वह कतराते रहे. बहुत मिन्नतों के बाद एफ़आईआर दर्ज हुई लेकिन अज्ञात के ख़िलाफ़.”
रेखा देवी के मुताबिक़, उन्होंने थाना प्रभारी के सामने पड़ोसी युवक दिनेश कुमार महतो पर शक ज़ाहिर किया था. “लेकिन पुलिस पहले दिन से ही दिनेश कुमार महतो को बचाने में लगी थी. यहां थानेदार से ज़िला पुलिस अधीक्षक तक मेरी सुनने वाला कोई नहीं था.”
इस आरोप पर पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह कहते हैं, “मैंने पहले ही थाना स्तर की एक एसआईटी गठित की थी, जिसका काम संतोषजनक न होने पर उनको निलंबित किया गया था. उसके बाद नई एसआईटी गठित की गई, जिसकी जांच में अभियुक्त पकड़ा गया.”
दिनेश कुमार पर शक का कारण पूछे जाने पर रेखा देवी कहती हैं कि “मेरी बेटी का रिश्ता तय हो गया था, जिसे सुनकर दिनेश कई बार मेरी बेटी को परेशान कर चुका था. ऐसे में उस पर शक होना स्वाभाविक है.”
वह कहती हैं, “21 जुलाई को बेटी के न मिलने पर अंत में मैं दिनेश के घर गई. वहां दिनेश के मौजूद न होने की जानकारी मिली. तब मैं डर गई कि दिनेश की वजह से मेरी बेटी के साथ कोई अनहोनी न हो जाए. इसके बाद पति के कहने पर मैं सीधे थाने पहुंची.”
13 दिनों बाद हुआ अपहरण का एफ़आईआर
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लापता होने के 13वें दिन चार अगस्त को पिंड्राजोड़ा थाना के द्वारा एफ़आईआर दर्ज की गई. अज्ञात के ख़िलाफ़ मानव तस्करी से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धारा 140(3) लगाई गई थी.
लेकिन एफ़आईआर दर्ज होने में 13 दिन क्यों लग गए? इस सवाल पर निलंबित थाना प्रभारी अभिषेक रंजन तर्क देते हुए कहते हैं कि परिजन सिर्फ़ चाहते थे कि उनकी बेटी मिल जाए.
वह कहते हैं, “बेटी का रिश्ता हो जाने के कारण परिजन शुरू में नहीं चाहते थे कि प्राथमिकी दर्ज हो.”
बेटी का रिश्ता होने को स्वीकार करते हुए पुष्पा महतो के पिता अनंत महतो थाना प्रभारी के दावे को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, “थाना प्रभारी ख़ुद ही प्राथमिकी दर्ज नहीं करना चाहते थे.”
वह आगे कहते हैं, “एफ़आईआर तो दर्ज हुई लेकिन पुलिस कार्रवाई करने से कोसों दूर रही.”
इस आरोप पर अभिषेक रंजन ने कहा, “परिजनों के शक के आधार पर हमने अभियुक्त दिनेश महतो से कई बार पूछताछ की. उसकी सीडीआर रिपोर्ट निकाली लेकिन अभियुक्त और मृतक पुष्पा के बीच बातचीत का रिकॉर्ड नहीं मिला, ऐसे में उसे छोड़ना पड़ा.”
उस दौरान अनंत महतो ने मुखिया से लेकर विधायक तक बोकारो ज़िले के हर जन प्रतिनिधि से बेटी की सकुशल वापसी की फ़रियाद की लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी.
हाईकोर्ट की फटकार के बाद दो दिन में हो गई कार्रवाई
इस सब में छह महीने गुज़रने के बाद बोकारो ज़िला परिषद उपाध्यक्ष बबीता देवी से उनकी मुलाक़ात हुई.
बबीता देवी कहती हैं, “पहले मैं पुष्पा के परिजनों के साथ पुलिस अधीक्षक से मिली. लेकिन इस केस को लेकर उनका रवैया संतोषजनक नहीं था.”
“ऐसे में हमारी अंतिम आस हाईकोर्ट थी.”
27 फ़रवरी, नौ मार्च और 23 मार्च को हाईकोर्ट ने पुष्पा के मामले में पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह पर सख़्ती दिखाई.
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पीड़ित पक्ष के वकील विंसेंट मार्की का आरोप है कि हाईकोर्ट के इस सख़्त रवैये के बाद परिवार को डराने की मंशा से तीन अप्रैल को पुलिस ने अनंत माहतो के बुज़ुर्ग चाचा सम्पद महतो को थाने ले जाकर उनके साथ मारपीट की.
विंसेंट मार्की कहते हैं कि “सम्पद महतो के साथ थाने में हुई इस मारपीट की जानकारी सात अप्रैल को हमने हाईकोर्ट के समक्ष लिखित तौर पर रखी. इस पर हाईकोर्ट ने बोकारो पुलिस अधीक्षक के साथ डीजीपी झारखंड को तलब किया.”
हाईकोर्ट ने सात मार्च को दिए अपने लिखित आदेश में पुलिस अधीक्षक को चेतावनी दी. हाईकोर्ट ने कहा, “यह स्पष्ट किया जाता है कि याचिकाकर्ता या उसके परिवार के सदस्यों के साथ कोई भी अप्रिय घटना घटित होने पर, बोकारो के पुलिस अधीक्षक व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे.”
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद डीजीपी तदाशा मिश्रा ने सीआईडी डीआईजी संध्या रानी मेहता को जांच सौंपी.
दूसरी तरफ पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह ने डीएसपी आलोक रंजन के नेतृत्व में एक नई एसआईटी टीम का गठन किया.
नौ अप्रैल को गठित एसआईटी ने 10 अप्रैल को जांच शुरू की. 11 अप्रैल की सुबह दिनेश महतो की गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के आधार पर पुष्पा के कथित कंकाल के अवशेष बरामद कर लिए.
इसके अलावा हत्या में इस्तेमाल हुआ चाकू, घटना के समय पहने गए कपड़े, 23 मोबाइल सिम, चार मोबाइल फ़ोन और अन्य साक्ष्य भी एसआईटी ने बरामद किए.
‘अभियुक्त से पैसे लिए, उसके साथ पार्टी की’
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एसआईटी प्रमुख उपाधीक्षक आलोक रंजन ने बताया कि इससे पहले की जांच के दौरान अभियोजन पक्ष को कमज़ोर करते हुए अभियुक्त को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से काम किया जा रहा था.
एसआईटी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह ने पिण्ड्राजोरा थाना के 28 पुलिसकर्मियों को 11 अप्रैल की शाम निलंबित कर दिया.
पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह कहते हैं, “पिण्ड्राजोरा थाना में पुलिस पदाधिकारी और कर्मचारियों ने अपराध का पता लगाने में अपेक्षित मदद नहीं की. साथ ही अन्य स्रोत से पता चला है कि अभियुक्त को बचाने के लिए काम किया गया, उससे पैसे लिए गए और साथ में पार्टी की गई. इस कारण पिण्ड्राजोरा थाने के आरक्षी से लेकर थाना प्रभारी तक को तत्काल प्रभाव से सामान्य जीवनयापन भत्ते पर निलंबित किया गया है.”
लेकिन निलंबित थाना प्रभारी अभिषेक रंजन ख़ुद को बेकसूर बताते हैं.
वह कहते हैं, “हमने जांच से मामले के जिन बिंदुओं को ढूंढा, उन्हीं को नई एसआईटी टीम ने जोड़कर अभियुक्त को गिरफ़्तार किया.”
जब सवाल पूछा गया कि आपने इन बिंदुओं को तलाशने में आठ महीने लगा दिए फिर भी न अभियुक्त का पता चला और न ही पुष्पा की जानकारी आप हासिल कर सके, ऐसा क्यों?
इस सवाल पर अभिषेक रंजन कहते हैं, “अभियुक्त बहुत शातिर था, उसने पुलिस को बहुत गुमराह किया. इस वजह से समय लगा.”
अभियुक्त से सांठगांठ के सवाल पर अभिषेक रंजन कहते हैं, “एक अपराधी ने कह दिया और आपने मान लिया. इसकी जांच होगी तो मैं निर्दोष पाया जाऊंगा.”
एक अन्य निलंबित सिपाही धनंजय सिंह अपने निलंबन पर सवाल पूछते हैं, “आप ही बताइए एक सिपाही का जांच में क्या रोल है, फिर भी मुझे निलंबित किया गया. मैं 16 साल से कार्यरत हूं, कई ज़िले में नियुक्त रहा और बेदाग रहा.”
पढ़ाई छूटी, मज़दूरी करने लगा पुष्पा का भाई
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निलंबित पुलिसकर्मियों पर क्या निलंबन के अलावा भी कोई कार्रवाई होगी?
इस सवाल पर डीएसपी आलोक रंजन कहते हैं कि “तत्काल निलंबित करने के बाद अब जांच की जा रही है. जांच की रिपोर्ट आने के बाद ही बताया जा सकता है कि इनके ख़िलाफ़ आगे क्या होगा.”
इस कार्रवाई पर पुष्पा महतो के पिता कहते हैं, “मामले की जांच सीबीआई से करवाई जाए ताकि अभियुक्त के अलावा निलंबित पुलिसकर्मियों के कारनामों की निष्पक्ष जांच हो. वरना कुछ दिनों के बाद सभी का निलंबन ख़त्म हो जाएगा. वे दोबारा किसी पीड़ित को मिलने वाले न्याय के रास्ते में रोड़ा बनेंगे.”
वह आगे कहते हैं, “हमारी बेटी तो वापस आ नहीं सकती लेकिन अभियुक्त को फांसी की सज़ा मिलनी चाहिए.”
अनंत महतो के परिवार में उनकी पत्नी और एक 16 साल का बेटा है, जिसकी पढ़ाई इस केस की वजह से छूट गई है.
अनंत महतो कहते हैं, “मैं राजस्थान की जिस कंपनी में मज़दूरी करता था, वहीं बेटे को भेज दिया है, जो मेरी जगह काम कर रहा है. वैसे भी उसको इन हालात में यहां रखने का रिस्क हम नहीं ले सकते.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.