
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस के साथ एक समझौते में हमास ने “पूरी तरह हथियार छोड़ने” पर सहमति जताई है.
समझौते को “ऐतिहासिक” बताते हुए बोर्ड ने कहा कि एक चरणबद्ध योजना के तहत ग़ज़ा से इसराइली सेना की पूरी तरह वापसी होगी.
ग़ज़ा के लगभग दो-तिहाई हिस्से पर नियंत्रण रखने वाले इसराइल ने अभी तक इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ क्या है?
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इस पहल का प्रस्ताव सबसे पहले सितंबर 2025 के आखिर में रखा गया था, जो इसराइल और हमास के बीच दो साल से चल रहे युद्ध को समाप्त करने और ग़ज़ा के पुनर्निर्माण की देखरेख करने के लिए ट्रंप की 20 सूत्रीय शांति योजना का हिस्सा था.
बाद में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव ने इसका स्वागत और समर्थन किया.
हालांकि, इसके चार्टर में ग़ज़ा या फ़लस्तीनी क्षेत्रों का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है, जिससे यह आशंका पैदा हो रही है कि इसका दायरा व्यापक हो सकता है और यह उन कार्यों को अपने हाथ में ले सकता है, जिसे संयुक्त राष्ट्र करता आया है.
इसे औपचारिक रूप से चार महीने बाद, 22 जनवरी को दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान लॉन्च किया गया था.
राष्ट्रपति ट्रंप ने दावोस में कहा था, “एक बार यह बोर्ड पूरी तरह से गठित हो जाए, तो हम लगभग वह सब कुछ कर सकते हैं जो हम चाहते हैं. और हम इसे संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से करेंगे.”
हालांकि आलोचकों का कहना है कि ऐसा लगता है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के कुछ कार्यों को बदलने के लिए बनाया गया है.
मौजूदा स्ट्रक्चर के मुताबिक़, ट्रंप आजीवन बोर्ड के अध्यक्ष बने रहेंगे, जिससे उन्हें व्यापक निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त होगा.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने लगातार इस बोर्ड को संघर्ष समाधान पर केंद्रित एक नए अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में प्रस्तुत किया है.
इसकी स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर का शुल्क लगता है.
कौन-कौन शामिल होने के लिए सहमत हुआ है?
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व्हाइट हाउस ने 60 देशों को आमंत्रित किया था. इनमें से 20 से अधिक देश इसमें शामिल होने के लिए सहमत हो गए हैं, जिनमें इसराइल, क़तर, सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र शामिल हैं.
ब्रिटेन और फ्रांस समेत अमेरिका के किसी भी प्रमुख यूरोपीय सहयोगी ने इसमें हिस्सा नहीं लिया है, और कई देशों ने चिंता जताई है कि यह पहल संयुक्त राष्ट्र को हाशिए पर धकेल सकती है. अन्य देशों ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
इस साल की शुरुआत में, अमेरिकी राष्ट्रपति ने बिना कोई स्पष्टीकरण दिए कनाडा को दिया गया निमंत्रण वापस ले लिया. कनाडा ने सदस्यता लेने में रुचि दिखाई थी, लेकिन उसने 1 अरब डॉलर की सदस्यता फ़ीस का भुगतान करने से मना किया था.
ट्रंप ने पुतिन को भी निमंत्रण दिया था, लेकिन इसके बावजूद चीन और रूस दोनों ही इस संस्था में शामिल नहीं हुए.
ट्रंप ने कहा है कि स्थायी सदस्यता शुल्क ग़ज़ा के पुनर्निर्माण के लिए निर्धारित किया जाएगा.
फरवरी में बोर्ड की उद्घाटन बैठक में, ट्रंप ने कहा कि सदस्य देशों ने हमास के हथियार छोड़ने के बाद ग़ज़ा के पुनर्निर्माण के लिए 7 अरब डॉलर का योगदान दिया था.
अप्रैल में, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि वह ग़ज़ा पर बोर्ड के साथ सहयोग कर रहे हैं.
इस महीने की शुरुआत में, बोर्ड के एक अधिकारी ने कहा था कि ग़ज़ा में फ़लस्तीनियों के लिए एक पायलट ह्यूमेनिटेरियन ज़ोन बनाया जाएगा.
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यह बोर्ड कैसे काम करेगा?
मुख्य बोर्ड ऑफ पीस के अलावा दो और निकाय बनाए गए हैं.
इस पूरी व्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा एग्जीक्यूटिव बोर्ड है, जिसके पास कूटनीति और निवेश से जुड़े फैसलों की मुख्य ज़िम्मेदारी होगी.
वहीं, ग़ज़ा एग्जीक्यूटिव बोर्ड, नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ ग़ज़ा पर निगरानी रखेगी. यह फ़लस्तीनी विशेषज्ञों (टेक्नोक्रेट्स) का एक निकाय है, जो ग़ज़ा में अस्थायी प्रशासन संभालेगा और पुनर्निर्माण के काम का समन्वय करेगा.
अमेरिका का कहना है कि इन निकायों के सदस्य ग़ज़ा में प्रभावी प्रशासन सुनिश्चित करने और लोगों तक बेहतर सेवाएं पहुंचाने के लिए काम करेंगे, ताकि वहां शांति, स्थिरता और खुशहाली लाई जा सके.
नौ सदस्यीय एग्जीक्यूटिव बोर्ड की अध्यक्षता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे. इसके सदस्यों में ये लोग शामिल हैं:
- अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो
- मध्य पूर्व के लिए अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़
- ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर
- ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री सर टोनी ब्लेयर
टोनी ब्लेयर को इस बोर्ड में शामिल किए जाने पर आलोचना भी हो रही है. इसकी वजह 2003 के इराक युद्ध में उनकी भूमिका है.
उस समय दावा किया गया था कि इराक के पास बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार हैं, लेकिन बाद में यह दावा ग़लत साबित हुआ.
अमेरिका के मुताबिक़, बोर्ड के हर सदस्य को ग़ज़ा में स्थिरता लाने से जुड़े एक अहम क्षेत्र की ज़िम्मेदारी सौंपी जाएगी.
हालांकि, इन दोनों निकायों में किसी भी फ़लस्तीनी प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया है. दोनों बोर्डों में किसी भी फ़लस्तीनी का नाम नहीं है.
क्या इससे ग़ज़ा की समस्या हल हो सकती है?
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संयुक्त राष्ट्र (यूएन), यूरोपीय संघ (ईयू) और विश्व बैंक की ओर से पिछले साल जारी नुक़सान और ज़रूरतों के आकलन के मुताबिक, ग़ज़ा के पुनर्निर्माण में कई साल लग सकते हैं और इस पर 70 अरब डॉलर से भी ज़्यादा खर्च आने का अनुमान है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि ग़ज़ा की करीब 80 फ़ीसदी इमारतें या तो पूरी तरह तबाह हो चुकी हैं या क्षतिग्रस्त हैं. इससे करीब 6.1 करोड़ टन मलबा जमा हो गया है. विस्थापित परिवार अब भी सर्द मौसम, सीमित आश्रय और भोजन की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं.
अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ युद्धविराम अक्तूबर में लागू हुआ था. इसका मक़सद इसराइल और हमास के बीच दो साल से ज़्यादा समय से जारी लड़ाई को रोकना था.
हालांकि, बड़े पैमाने पर लड़ाई थम गई है, लेकिन ग़ज़ा के हमास-नियंत्रित स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, युद्धविराम लागू होने के बाद भी इसराइली हमलों में कम से कम 1,168 फ़लस्तीनियों की मौत हुई है.
संयुक्त राष्ट्र इन आंकड़ों को भरोसे लायक मानता है.
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स्विट्ज़रलैंड के दावोस में आयोजित समारोह में, रियल एस्टेट डेवलपर और राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर ने ग़ज़ा के लिए एक “मास्टर प्लान” की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें गगनचुंबी इमारतें, नए शहर और एक तटीय पर्यटन क्षेत्र शामिल थे.
उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य में दो से तीन साल लग सकते हैं और इसके लिए कम से कम 25 अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी, जिसमें मानवीय सहायता को तत्काल प्राथमिकता दी जाएगी.
बोर्ड ऑफ पीस विवादों में क्यों घिरा है?
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इस पहल की अब तक काफी आलोचना हुई है. सवाल इसकी वैधता से लेकर इसमें प्रतिनिधित्व की कमी तक को लेकर उठाए जा रहे हैं.
हालांकि ट्रंप ने इस बोर्ड को भविष्य में संघर्षों के समाधान के लिए एक अहम मंच बताया है, लेकिन अमेरिका के कई सहयोगी देशों का कहना है कि यह संयुक्त राष्ट्र और उसकी 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद की भूमिका को कमज़ोर कर सकता है.
यही परिषद दुनिया में शांति बनाए रखने और प्रतिबंधों से जुड़े फैसले लेने की ज़िम्मेदारी निभाती है.
ट्रंप प्रशासन पहले ही संयुक्त राष्ट्र को दी जाने वाली अमेरिकी फंडिंग में कटौती कर चुका है. इसी साल ट्रंप ने एक मेमो पर हस्ताक्षर कर अमेरिका को संयुक्त राष्ट्र की 31 संस्थाओं से अलग करने का फैसला किया था. उनका कहना था कि ये संस्थाएं “अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के ख़िलाफ़ काम कर रही थीं.”
यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काया कालास ने बोर्ड ऑफ़ पीस को ट्रंप का निजी मंच बताया. उनका कहना है कि यह बोर्ड न तो फ़लस्तीनियों के प्रति जवाबदेह है और न ही संयुक्त राष्ट्र के प्रति.
फ़रवरी में म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ग़ज़ा के लिए एक अस्थायी बोर्ड ऑफ़ पीस बनाने के प्रस्ताव का स्वागत करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था. उस प्रस्ताव में फ़लस्तीनी प्रतिनिधित्व और ग़ज़ा का स्पष्ट उल्लेख शामिल था.
लेकिन उन्होंने कहा कि बोर्ड के चार्टर (संविधान) में इन दोनों बातों को शामिल नहीं किया गया.
उन्होंने कहा, “सुरक्षा परिषद का एक प्रस्ताव ज़रूर है, लेकिन बोर्ड ऑफ़ पीस उसकी भावना के अनुरूप नहीं है.”
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इन बोर्डों की कार्यकारी समितियों (एग्जीक्यूटिव बोर्ड) में किसी भी फ़लस्तीनी प्रतिनिधि को जगह न दिए जाने को लेकर भी विवाद हो रहा है.
फ़लस्तीनी नेता मुस्तफ़ा बरग़ूती ने हाल ही में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से बातचीत में कहा, “यह एक अमेरिकी बोर्ड जैसा लगता है, जिसमें कुछ अंतरराष्ट्रीय सदस्य ज़रूर हैं.”
उन्होंने कहा कि फ़लस्तीनियों को इससे कहीं ज़्यादा व्यापक प्रतिनिधित्व की उम्मीद थी.
बरग़ूती ने यह भी कहा कि मिस्र शांति वार्ता के दौरान मंज़ूर किए गए फ़लस्तीनी प्रशासनिक समूह की भूमिका अब भी स्पष्ट नहीं है, जो चिंता की बात है.
वहीं, ग़ज़ा एग्जीक्यूटिव बोर्ड में इसराइल के दो सदस्य शामिल हैं. इनमें साइप्रस में रहने वाले रियल एस्टेट कारोबारी याकिर गाबाय और अमेरिका में जन्मे वेंचर कैपिटल निवेशक माइकल आइज़ेनबर्ग शामिल हैं.
इसके अलावा क़तर और तुर्की के वरिष्ठ नेताओं को बोर्ड में शामिल किए जाने पर भी इसराइल के कुछ नेताओं ने आपत्ति जताई है. ये दोनों देश ग़ज़ा में इसराइल की सैन्य कार्रवाई की आलोचना करते रहे हैं.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने जनवरी में कहा था कि इन बोर्डों का गठन “इसराइल से किसी तरह का समन्वय किए बिना किया गया है और यह उसकी नीति के ख़िलाफ़ है.”
विपक्ष के नेता याइर लापिड ने इसे “इसराइल की कूटनीतिक विफलता” बताया.
वहीं, दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ग़ज़ा को किसी “प्रशासनिक समिति” की नहीं, बल्कि “हमास के आतंकवादियों से मुक्त किए जाने” की ज़रूरत है.
इस रिपोर्ट में पॉला अदामो इदोएटा, सैने पेक और एंड्रयू वेब (बीबीसी वर्ल्ड सर्विस) का भी योगदान है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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