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डाक टिकटों और पोस्ट कार्ड्स ने कैसे भारत के लोगों की गिनती करने में मदद की थी

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Jun 1, 2026


भारत की 2001 की जनगणना को चिह्नित करने के लिए जारी किए गए इस स्मारक टिकट में चार लोगों का परिवार दिखाया गया था, जिसके नीचे नारा लिखा था - 'जन-केंद्रित'. इसके पहले दिन के कवर ने भारत की विविधता को एक रंगीन भीड़ के दृश्य से मनाया, जबकि उसके डाक-छाप में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को हाथों में हाथ डाले अर्धवृत्त में खड़े दिखाया गया - यह राष्ट्र का प्रतीकात्मक चित्र था, जो खुद को गिन रहा था.

इमेज स्रोत, Vikas Kumar

इमेज कैप्शन, भारत की 2001 की जनगणना को चिह्नित करने के लिए जारी किए गए इस स्मारक टिकट में चार लोगों का परिवार दिखाया गया था, जिसके नीचे नारा लिखा था – ‘जन-केंद्रित’. इसके पहले दिन के कवर में भारत की विविधता को एक भीड़ के रंगीन दृश्य से दिखाया गया, जबकि उसके पोस्ट-मार्क में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को हाथों में हाथ डाले अर्धवृत्त में खड़े दिखाया गया – यह राष्ट्र का प्रतीकात्मक चित्र था, जो खुद को गिन रहा था

स्मार्टफोन और सरकारी ऐप्स आने से बहुत पहले, भारत ने लोगों को दुनिया की सबसे बड़ी सांख्यिकीय कवायदों में से एक- जनगणना- में शामिल करने के लिए अपने विशाल डाक नेटवर्क का इस्तेमाल किया था.

अब जबकि भारत अपनी 16वीं जनगणना की तैयारी कर रहा है, जो आज़ादी के बाद आठवीं होगी, एक नई प्रदर्शनी उस भूली-बिसरी कहानी को फिर से सामने ला रही है.

इसमें टिकटों, डाक-छापों (पोस्ट मार्क्स) और चिट्ठियों के ज़रिए दिखाया गया है कि कैसे नागरिकों को राष्ट्रीय जनगणना में भाग लेने के लिए प्रेरित किया गया था.

इस प्रदर्शनी को बेंगलुरु की अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विकास कुमार ने तैयार किया है. प्रदर्शनी बताती है कि आज़ादी के बाद के दशकों में भारत की डाक व्यवस्था कैसे अप्रत्याशित रूप से राष्ट्र-निर्माण का माध्यम बन गई.

सबसे बड़ी चिंता थी भरोसे की

जनवरी 1951 में नंदीकोटकुर से भेजा गया  एक लिफ़ाफ़ा कुछ दिन बाद मद्रास (अब चेन्नई) पहुँचा. इसमें स्वतंत्रता के बाद भारत की पहली जनगणना को बढ़ावा देने वाले शुरुआती द्विभाषी डाक-छापों में से एक था. काले रंग का यह चित्रात्मक टिकट- जिसमें तीन लोगों का परिवार दिखाया गया था और हिंदी और अंग्रेज़ी में 'भारत की जनगणना, फरवरी 1951' लिखा था. यह उस दौर का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला जनगणना डाक-छाप बन गया.

इमेज स्रोत, Vikas Kumar

इमेज कैप्शन, जनवरी 1951 में नंदीकोटकुर से भेजा गया एक लिफ़ाफ़ा कुछ दिन बाद मद्रास (अब चेन्नई) पहुँचा. यह स्वतंत्रता के बाद भारत की पहली जनगणना को बढ़ावा देने वाले शुरुआती द्विभाषी डाक-छापों में से एक था. काले रंग का यह चित्रात्मक टिकट- जिसमें तीन लोगों का परिवार दिखाया गया था और हिंदी और अंग्रेज़ी में ‘भारत की जनगणना, फरवरी 1951’ लिखा था. यह उस दौर का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला जनगणना डाक-छाप बन गया.

आजाद भारत को तुरंत भरोसेमंद जनसांख्यिकीय आँकड़ों की ज़रूरत थी, ताकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित चुनाव कराए जा सकें और बेहतर अर्थव्यवस्था के लिए योजनाएं बनाई जा सकें.

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