इमेज स्रोत, ANI
संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र के दूसरे दिन लोकसभा में बोलते हुए केरल से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने महिला आरक्षण को परिसीमन से बांध देने की आशंका ज़ाहिर की.
थरूर ने डीलिमिटेशन कराए जाने से संघीय ढांचे के प्रभावित होने की बात कही.
इससे पहले डीएमके सांसद कनिमोई ने भी संघीय ढांचे पर ख़तरे को लेकर आशंका जताई.
हालांकि गुरुवार को बहस के पहले दिन प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों की आशंका पर कहा था, “पहले जो परिसीमन हुआ है और जो अनुपात पहले से चला आ रहा है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा. उसी के अनुसार परिसीमन होगा. अगर गारंटी चाहिए, तो मैं गारंटी भी देता हूँ.”
लोकसभा में जारी बहस में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि सरकार नोटबंदी की तरह ही डीलिमिटेशन में जल्दबाज़ी कर रही है.
महिला आरक्षण को लेकर कहा कि दशकों तक इस पर बात होती रही लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी, “आज यह स्थिति पैदा हो गई है कि सभी पार्टियां इस पर एकमत है. रस्मआदयगी का युग समाप्त हो गया है और समान साझेदारी का समय आ गया है.”
लेकिन उन्होंने महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना को जटिलता बढ़ाने वाला बताया और इसे इतिहास के सबसे विवादित प्रक्रियाओं में से एक बताया.
दक्षिणी राज्यों के महत्वहीन होने की जताई आशंका
इमेज स्रोत, AFP via Getty Images
थरूर ने कहा, “प्रधानमंत्री कहते हैं कि सरकार ने नारी शक्ति को इंसाफ़ का तोहफ़ा दिया है. लेकिन इसे कांटेदार तार में लपेट दिया है और महिला आरक्षण को संसद के विस्तार के साथ 2021 की जनगणना के आंकड़ों और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ दिया गया है.”
“हम एक नैतिक ज़रूरत को जनसंख्या आधारित जटिल प्रक्रिया में क्यों उलझा रहे हैं? महिला आरक्षण लागू होने के लिए तैयार है… इसे परिसीमन से जोड़ना, भारतीय महिलाओं की आकांक्षाओं को हमारे देश के सबसे विवादित और जटिल प्रशासनिक अभ्यासों में से एक के साथ बंधक बनाने जैसा है.”
उन्होंने परिसीमन से संघीय ढांचे के प्रभावित होने की आशंका जताई.
उन्होंने कहा, “दरअसल भारतीय महिलाओं की आकांक्षाओं को हमारे इतिहास की सबसे विवादित राजनीतिक प्रक्रियाओं में से एक के साथ बंधक बनाना है. भविष्य में होने वाले परिसीमन में वे राज्य, जो जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में विफल रहे हैं, उन्हें अधिक राजनीतिक महत्व मिलेगा. हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम यही संदेश देना चाहते हैं कि बेहतर शासन का परिणाम राजनीतिक महत्वहीनता हो?”
“आपने परिसीमन का प्रस्ताव इतनी जल्दबाज़ी में रखा है, जैसी जल्दबाज़ी आपने नोटबंदी के समय दिखाई थी. दुर्भाग्य से, हम सभी जानते हैं कि उससे देश को कितना नुक़सान हुआ. परिसीमन, राजनीतिक नोटबंदी साबित होगा. इसे मत कीजिए…”
उन्होंने इस पर गंभीर चर्चा की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा, “देश में तीन बड़ी दिक़क़तें हैं, पहली, छोटे राज्यों और बड़े राज्यों के बीच संतुलन, राज्यों की जनसांख्यिकी में संतुलन, यानी जो राज्य आबादी नियंत्रित करने में नाकाम रहे उन्हें अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा. तीसरा, जो राज्य राष्ट्रीय आमदनी में अधिक योगदान देते हैं, उन्हें उन राज्यों से अनुपात में कम पैसा मिलता है जो कम योगदान देते हैं. इसमें संतुलन होना चाहिए.”
डीलिमिटेशन उन राज्यों को हाशिए पर डाल देंगे जो देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं.
थरूर ने एक और चिंता ज़ाहिर की कि लोकसभा का आकार बढ़ने से राज्य सभा के साथ उसका संतुलन बिगड़ जाएगा और संयुक्त बैठक में उनकी अहमियत क्या होगी. उन्होंने कहा कि अगर राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व है तो आप समझ सकते हैं कि राज्यों की क्या हालत होगी.
विशेष सत्र पर उठाए सवाल
इमेज स्रोत, ANI
इससे पहले शुक्रवार को डीएमके सांसद कनिमोई करुणानिधि ने डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल की टाइमिंग और महिला आरक्षण को इससे जोड़ने पर सवाल उठाया.
साथ ही उन्होंने महिला आरक्षण मुद्दे पर बहस के बीच गुरुवार रात में इस बारे में अधिसूचना जारी करने पर भी सवाल खड़ा किया.
उन्होंने कहा, “जब महिला आरक्षण मुद्दे पर संसद में बहस हो रही है तो कल रात में इसे अधिसूचित करने का क्या मतलब है?”
कनिमोई ने इसे ‘ट्रैप’ कहा जबकि दक्षिण राज्यों के अन्य विपक्षी सांसदों ने प्रतिनिधित्व घटने की आशंका ज़ाहिर की है.
डीएमके नेता कनिमोई ने संसद के विशेष सत्र बुलाए जाने की टाइमिंग पर सवाल खड़ा करते हुए कहा, “पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के बीच यह विशेष सत्र बुलाया गया है. राजनीति में टाइमिंग का बहुत महत्व है. और इस बिल का मक़सद बहुत साफ़ है. पूरे विपक्ष ने मांग रखी थी कि इस बिल को चुनाव के बाद रखा जाए, लेकिन आपने नज़रअंदाज़ किया. और आपने कल कहा कि महिला आरक्षण बिल को लागू करना बहुत ज़रूरी है. आपने दो हफ़्ते का भी सब्र नहीं दिखाया.”
कनिमोई ने कहा कि ‘चुनावों में खलल डालने के लिए इस विशेष सत्र में तीन बिल लाए गए.’
उन्होंने कहा, “बीजेपी की सरकार 2014 में आई थी तब तमाम विपक्षी पार्टियों ने महिला आरक्षण बिल लाने के लिए लिखा था. तब इसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया.”
संविधान संशोधन को लेकर जताई आशंका
इमेज स्रोत, Sansad TV
उन्होंने महिला आरक्षण को डीलिमिटेशन बिल के साथ लाने को एक ‘ट्रैप’ करार दिया.
उन्होंने कहा, “बीजेपी अपने चुनावी लाभ के लिए भारत की महिलाओं को एक ह्यूमन शील्ड (मानव ढाल) की तरह इस्तेमाल कर रही है.”
कनिमोई ने कहा, “महिलाओं को आज आरक्षण चाहिए, संसद की मौजूदा 543 सीटों में.”
उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री को संबोधित करते हुए पूछा, “अनुच्छेद 343 ए में मौजूद डीलिमिटेशन की पूर्व शर्त को आप क्यों नहीं हटाते?”
उन्होंने संसद की सीटें बढ़ाने पर भी आशंका ज़ाहिर की.
उन्होंने कहा, “संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए. इस समय लोकसभा में 543 सांसद हैं, जिसका दो तिहाई बहुमत होता है 362. अगर सीटों को अधिकतम 850 तक बढ़ा दिया जाए और जैसा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा है कि सभी राज्यों में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ जाएंगी, इसका मतलब है कि कुल सीटें 816 हो जाएंगी.”
“यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, इन राज्यों की सीटें 400 से 420 सीटें हो जाएंगी. 816 सीटों का दो तिहाई 544 सीटें होती हैं. हिमाचल और गुजरात में उनकी सरकारें हैं तो संविधान संशोधन के लिए दक्षिण भारत से एक वोट की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी.”
उन्होंने ये सवाल किया कि डीलिमिटेशन बिल में कहा गया है कि जनगणना के ताज़ा आंकड़ों के आधार पर ये होगा, जबकि गृहमंत्री ने कहा है कि सभी राज्यों की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ेंगी.
उन्होंने डीलिमिटेशन बिल को संघीय ढांचे के लिए ‘नुकसानदेह’ बताया और कहा, “इस बिल को राज्यों की विधानसभाओं में क्यों नहीं पहले रखा गया. क्या आपने इससे पहले सलाह मशविरा किया, क्या मुख्यमंत्रियों से बातचीत की?”
गुरुवार को बहस में विपक्ष का तंज़, पीएम मोदी की ‘गारंटी’
इमेज स्रोत, ANI
इससे पहले गुरुवार को शुरू हुए संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र में मोदी सरकार ने डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल पेश कर दिया.
इस बिल में 2023 में पारित महिला आरक्षण क़ानून को परिसीमन से जोड़कर अमल में लाने का प्रस्ताव है.
इसके साथ ही संसद और संसद के बाहर पक्ष-विपक्ष में बयानबाज़ी शुरू हो गई है.
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इसे ‘अगले चुनाव के लिए बीजेपी की रणनीति’ कहा. वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ‘डीलिमिटेशन की डीमोनेटाइज़ेशन’ से तुलना की.
दक्षिण भारत में डीलिमिटेशन का विरोध हो रहा है.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनकी पार्टी डीएमके ने काले झंडे दिखाकर डीलिमिटेशन बिल का विरोध किया.
दूसरी ओर के चंद्रशेखर राव की पार्टी भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) ने भी केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का एलान कर दिया है.
विपक्षी पार्टियों का कहना है कि सरकार की मंशा महिला आरक्षण लागू करने की है ही नहीं.
विपक्ष के मुताबिक़ वो महिला आरक्षण का तो ज़रूर समर्थन करेंगे, लेकिन सरकार डीलिमिटेशन को इससे जोड़कर मामले को उलझा रही है.
गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि लोकसभा में सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है.
साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का भी प्रस्ताव है.
हालाँकि महिला आरक्षण का ये प्रस्ताव 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन क़ानून पर आधारित है,
इस क़ानून में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके लागू होने को भविष्य में होने वाली जनगणना और डीलिमिटेशन (परिसीमन प्रक्रिया) से जोड़ा गया था.
सरकार की क्या है दलील
इमेज स्रोत, ANI
लोकसभा में चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “मैं ज़िम्मेदारी से कहना चाहता हूँ कि निर्णय प्रक्रिया किसी के साथ भेदभाव नहीं करेगी. किसी के साथ अन्याय नहीं होगा.”
“पहले जो परिसीमन हुआ है और जो अनुपात पहले से चला आ रहा है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा. उसी के अनुसार परिसीमन होगा.”
उन्होंने कहा, “अगर गारंटी चाहिए, तो मैं गारंटी भी देता हूँ.”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण बिल के पक्ष में बोलते हुए कहा, “जो इस बिल का विरोध करेंगे, उन्हें लंबे समय तक इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.”
उन्होंने कहा, “अब देश की बहनों पर भरोसा करें, 33 फ़ीसदी महिलाओं को यहाँ आने दें और उन्हें निर्णय करने दें.”
उन्होंने कहा कि देश की 50 फ़ीसदी आबादी को नीति-निर्माण में शामिल होना चाहिए.
पीएम मोदी ने कहा, “मुझे सबको साथ लेकर चलना है और मुझे संविधान ने यही सिखाया है.”
प्रधानमंत्री ने कहा, “हम भ्रम में न रहें कि हम कुछ नारी शक्ति को दे रहे हैं, ये उनका हक़ है. हमने इसे कई दशकों से रोका हुआ है, आज उसका प्रायश्चित कर उस पाप से मुक्ति पाने का अवसर है.”
इससे पहले केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में डीलिमिटेशन बिल पर बहस के दौरान कहा कि इस प्रक्रिया के बाद हर राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ जाएगी.
उन्होंने कहा, “272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.”
जेडीयू सांसद राजीव रंजन सिंह ने कहा, “नारी शक्ति वंदन विधेयक सबकी सहमति से पास हुआ था और प्रधानमंत्री चाहते हैं कि 2029 के चुनाव में उसे लागू किया जाए. यह महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में बहुत बड़ा क़दम है. ये मील का पत्थर साबित होगा. देश की 50 फ़ीसदी आबादी महिलाओं की है और अगर प्रधानमंत्री उनको न्याय देने का प्रयास कर रहे हैं, तो उसका विरोध नहीं होना चाहिए, समर्थन करना चाहिए.”
गृह मंत्री अमित शाह पर प्रियंका गांधी का तंज़

विपक्ष ने महिला आरक्षण का समर्थन किया लेकिन उसे डीलिमिटेशन से जोड़ने का विरोध किया.
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने इस बिल पर चर्चा के दौरान कहा, “जब 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने यह अधिनियम सबकी सहमति से पारित किया था, तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी विचारधारा के अनुकूल इसका पूरा समर्थन किया था. आज भी इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महिला आरक्षण के पक्ष में डटकर खड़ी है और खड़ी रहेगी.”
उन्होंने आगे कहा, “ऊपर ऊपर से इसमें (बिल में) कोई आपत्तिजनक बात नहीं लगती. मगर इसे गहराई से समझा जाए तो इसका असली मक़सद उभरता है, वह राजनीति की बू, जिसका ज़िक्र प्रधानमंत्री महोदय ने किया, वह राजनीति की बू इसमें पूरी तरह से घुली हुई है.”
“दरअसल इसी सरकार ने महिला आरक्षण का जो विधेयक सर्वसम्मति से 2023 में पारित कराया था उसमें दो चीज़ें थीं, जो इस विधेयक में नहीं हैं. उसमें लिखा था कि इसे लागू करने से पहले नई जनगणना और परिसीमन कराया जाएगा. अब अचानक क्या हो गया? मन बदल गया? वही सरकार पुराने आँकड़ों के आधार पर क्यों आगे बढ़ना चाह रही है? और इतनी जल्दबाज़ी क्यों?”
शॉर्ट वीडियो देखिए

प्रियंका गांधी ने परिसीमन बिल को लेकर बीजेपी पर तंज़ किया.
उन्होंने कहा, “कुछ प्रदेशों की ताक़त कम करके लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाकर अगले चुनाव के लिए अपनी पार्टी की मज़बूती का ढाँचा बनाया जा रहा है. गृह मंत्री जी हँस रहे हैं. पूरी योजना बना रखी है. चाणक्य आज ज़िंदा होते, तो आपकी राजनीतिक कुटिलता पर वो भी चौंक जाते.”
डीमोनेटाइज़ेशन की तरह ही डीलिमिटेशन करना चाहते हैं- शशि थरूर

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा, “महिला आरक्षण में कोई दिक़्क़त नहीं है, तुरंत कर दें लेकिन इसमें डीलिमिटेशन शामिल क्यों कर रहे हो? यही हमारा सबसे बड़ा प्रश्न है. डीलिमिटेशन को लेकर बहुत सारे मुद्दे हैं, बहुत सारे प्रश्न हैं, इस पर लंबी चर्चा की ज़रूरत है. यह चर्चा कराने को सरकार तैयार नहीं है, वह दो-तीन दिन में इसे ख़त्म करना चाहती है, यह नहीं हो पाएगा.”
“अगर सरकार सिर्फ़ महिला आरक्षण लागू करवाना चाहती है तो 2023 में कर लेती, तब क्यों नहीं किया? अब भी करवाना चाहती है तो तुरंत करवाए, हम वोट देने को तैयार हैं. आप डीलिमिटेशन वैसे ही करना चाहते हैं जैसे डीमोनेटाइज़ेशन किया था- बिना सोचे-समझे. इसका आधार क्या है यह भी साफ़ नहीं है, सिर्फ़ आबादी के आधार पर नहीं हो सकता.”
समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने भी यही बात कही.
उन्होंने कहा, “सारी पार्टियाँ एकमत हैं महिला आरक्षण को लेकर. लेकिन बार-बार इस विधेयक का स्वरूप क्यों बदला जा रहा है? अगर भारतीय जनता पार्टी चाहती है, तो जो 543 सीटें हैं उन पर 2029 के लिए आरक्षण कर दीजिए, समाजवादी पार्टी तैयार है समर्थन करने के लिए.”
लेकिन ताज़ा जनगणना के बिना डीलिमिटेशन कराने पर उन्होंने सवाल खड़ा किया.
उन्होंने कहा, “2023 में जिस स्वरूप में नारी शक्ति वंदन विधेयक पास हुआ था, हम सब तैयार हैं उसके लिए. 2011 की जनगणना लेकर आप कैसे डीलिमिटेशन कर सकते हैं? इससे पता चलता है कि यह विधेयक दोहरे चरित्र वाला है. कोई विश्वास नहीं करेगा भारतीय जनता पार्टी पर.”
दक्षिण के राज्यों का विरोध
इमेज स्रोत, ANI
दक्षिण भारत के राज्यों में इस विधेयक को लेकर गहरी आशंकाएँ हैं.
विपक्षी दलों का आरोप है कि इससे उत्तर भारत के राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ेगी, जहाँ बीजेपी तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा ताक़तवर है और इससे उसके लिए केंद्र में सरकार बनाना आसान हो जाएगा.
डीलिमिटेशन का सबसे मुखर विरोध करने वालों में डीएमके शामिल है.
डीएमके का आरोप है कि इससे दक्षिण भारतीय राज्यों की केंद्र की राजनीति में ताक़त कम होगी.
केंद्र सरकार के इस फ़ैसले का विरोध करने के लिए उन्होंने अपने समर्थकों के साथ काले कपड़े भी पहन रखे थे.
इस दौरान उन्होंने डीलिमिटेशन विधेयक की कॉपी जलाकर अपना विरोध जताया.

डीएमके को एक और दक्षिण भारतीय पार्टी बीआरएस (भारत राष्ट्र समिति) का साथ मिला है.
बीआरएस नेता रावुला श्रीधर रेड्डी का कहना है, “बीआरएस ने हमेशा महिला आरक्षण का समर्थन किया है लेकिन केंद्र सरकार महिला आरक्षण की प्रक्रिया को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ने की कोशिश कर रही है, जो ग़लत है.”
“हमारे नेता, केटी रामा राव, लगातार परिसीमन प्रक्रिया में दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों की रक्षा करने की बात कह रहे हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्री बार-बार दावा कर रहे हैं कि देश भर में संसद और राज्यों के विधायी निकायों दोनों में सीटों में 50% की वृद्धि होगी, जबकि प्रस्तावित विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. यह एक साज़िश जैसी दिखती है. इससे केंद्र की सत्यनिष्ठा और पूरी प्रक्रिया के उद्देश्य पर संदेह पैदा हो रहा है.”
उन्होंने डीलिमिटेशन प्रक्रिया पर बुलडोज़र चलाने का आरोप लगाते हुए कहा, “यह ठीक है कि यह बहुत समय से लंबित है लेकिन बिना पर्याप्त चर्चा के, बिना राष्ट्रीय आम राय बनाए एनडीए सरकार पूरी प्रक्रिया पर बुलडोज़र चलाना चाहती है.”
उन्होंने कहा, “अगर यह प्रक्रिया दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों को किसी प्रकार का नुक़सान पहुँचाती है तो बीआरएस पार्टी उन पार्टियों से हाथ मिलाएगी, जो इस मुद्दे का विरोध कर रहे हैं और केंद्र सरकार से संघर्ष करेगी ताकि दक्षिण भारतीय राज्यों को उचित न्याय मिल सके.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.