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- सुप्रीम कोर्ट ने सात और आठ नवंबर को दिल्ली-एनसीआर में सुबह 6 से सात बजे तक और रात आठ से दस बजे तक ग्रीन पटाखे जलाने की इजाज़त दे दी है.
- कोर्ट ने साफ किया कि पटाखों पर पहले जैसा पूरा बैन नौ नवंबर से फिर से लागू होगा.
- पढ़िए ग्रीन पटाखों पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी का नवंबर 2023 में छपा ये लेख
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‘ग्रीन पटाखे’ राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं जो पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं पर इनके जलने से कम प्रदूषण होता है.
नीरी एक सरकारी संस्थान है, जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के अंदर आता है.
ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं, लेकिन इनसे प्रदूषण कम होता है.
सामान्य पटाखों की तुलना में इन्हें जलाने पर 40 से 50 फ़ीसदी तक कम हानिकारक गैस पैदा होती हैं.
नीरी के चीफ़ साइंटिस्ट डॉक्टर साधना रायलू का कहना है कि इनसे हानिकारक गैसें हम निकलती हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इनसे प्रदूषण बिल्कुल नहीं होगा.
डॉक्टर साधना बताती हैं कि सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फ़र गैस निकलती है, लेकिन उनके शोध का लक्ष्य इनकी मात्रा को कम करना था.
ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं. नीरी ने कुछ ऐसे फ़ॉर्मूले बनाए हैं जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे.
कैसे-कैसे ग्रीन पटाखे
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डॉक्टर साधना बताती हैं कि उनके संस्थान ने ऐसे फॉर्मूले तैयार किए हैं जिसके जलने के बाद पानी बनेगा और हानिकारक गैसों में घुल जाएगा.
इन ग्रीन पटाखों की बेहद ख़ास बात है जो सामान्य पटाखों से उन्हें अलग करती है. नीरी ने चार तरह के ग्रीन पटाखे बनाए हैं.
पानी पैदा करने वाले पटाखेः ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फ़र और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे. नीरी ने इन्हें सेफ़ वाटर रिलीज़र का नाम दिया है. पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है.
सल्फ़र और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखेः नीरी ने इन पटाखों को स्टार क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ़ थर्माइट क्रैकर. इनमें ऑक्सिडाइजिंग एजेंट का उपयोग होता है जिससे जलने के बाद सल्फ़र और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होती है. इसके लिए ख़ास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है.
कम एल्यूमीनियम का इस्तेमालः इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फ़ीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है. इसे संस्थान ने सेफ़ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी SAFAL का नाम दिया है.
अरोमा क्रैकर्सः इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ़ हानिकारण गैस कम पैदा होगी बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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