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चार मई को आए चुनावी नतीजों ने इस बहस को फिर से छेड़ दिया है कि बीजेपी का विस्तार क्या क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के लिए ख़तरा है?
पश्चिम और मध्य भारत में झारखंड स्थित झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) को छोड़कर, बाकी सभी राज्यों में बीजेपी का दबदबा है. पूर्वोत्तर भारत में, मिजोरम को छोड़कर, बाक़ी सभी राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सत्ता है.
दक्षिण भारत में हालांकि यह दबदबा कायम नहीं है. वहाँ बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन की सरकार सिर्फ़ आंध्र प्रदेश में है.
उत्तर भारत में, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पंजाब ही विपक्ष के गढ़ बचे हैं जबकि बाकी सभी राज्यों में बीजेपी की सत्ता है.
ममता बनर्जी और एमके स्टालिन के अलावा, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल, के चंद्रशेखर राव (केसीआर), तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और मायावती जैसे कई पूर्व शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों के नेता सत्ता से बाहर हैं.
क्षेत्रीय दलों ने भारत की राष्ट्रीय राजनीति में विशेष रूप से 1989 में शुरू हुए गठबंधन के दौर के बाद अपनी जगह बनाई. 2014 से पहले तक दिल्ली में सत्ता की चाबी इन्हीं दलों के हाथों में रही है.
वाजपेयी के समय में बीजेपी ख़ुद भी मज़बूत क्षेत्रीय ताक़तों के साथ गठबंधन करके ही उभरी थी.
लेकिन उनकी बढ़ती कमज़ोरी से अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं. क्या क्षेत्रीय दल बीजेपी के ‘डबल इंजन वाली सरकार’ के नारे के सामने कमज़ोर पड़ रहे हैं? या यह बीजेपी के प्रभुत्व का चरम है, जिसका मतबल है कि क्षेत्रीय राजनीति फिर से मज़बूत होगी?
क्या क्षेत्रीय पहचान अब काफ़ी नहीं है?
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तीन दशकों से पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रहीं नीरजा चौधरी देश की चुनावी राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को रेखांकित करती हैं.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी को बताया, “इन चुनावों ने दिखाया है कि सामाजिक कल्याण और क्षेत्रीय पहचान जीत के लिए पर्याप्त नहीं हैं. मेरा मानना है कि युवा मतदाता, जो बहुत महत्वाकांक्षी हैं, राजनीतिक समीकरणों को पुराने मतदाताओं की तरह नहीं देखते.”
“वे सामाजिक उन्नति का रास्ता देखने पर प्रयोग करने के लिए ज़्यादा खुले हैं. यही कारण है कि तमिलनाडु में विजय और पश्चिम बंगाल में बीजेपी को चुना गया.”
लेकिन एक और अहम कारण भी है. रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने कहा, “वे किसी राजनीतिक दल से नहीं लड़ रहे हैं बल्कि एक ऐसी कॉर्पोरेट संस्था से लड़ रहे हैं, जिसके पास अत्याधुनिक तकनीकी संसाधन हैं जो किसी भी राजनीतिक दल की पहुंच से परे हैं.”
सरकार कहते हैं, “वे पैसे और नवीनतम एआई तकनीक के गठजोड़ से लड़ रहे हैं. क्षेत्रीय दलों को यह समझना होगा कि उनका दुश्मन एक ही है, यानी बीजेपी. लेकिन बीजेपी उन सभी से एक साथ नहीं लड़ेगी, बल्कि एक-एक करके उन्हें ख़त्म करेगी.”
हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी को ‘परिवारवाद’ वाली पार्टी नहीं बल्कि ‘ज़मीनी स्तर की’ पार्टी बताया है. पीएम मोदी का कहना है कि बीजेपी ने ‘विकास के प्रति नज़रिए और कोशिशों से’ लोकप्रियता हासिल की है.
लेखक और वरिष्ठ पत्रकार निलंजन मुखोपाध्याय के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मा और हिंदुत्व की अपील अब भी कायम है.
बीजेपी की रणनीति
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राजनीतिक विश्लेषक क्षेत्रीय स्तर पर बीजेपी की प्रगति के लिए उसकी गठबंधन रणनीति की ओर भी इशारा करते हैं.
बीजेपी आज सहयोगियों को किस नज़रिए से देखती है, इसके बारे में निलंजन मुखोपाध्याय एक उदाहरण देते हैं.
वह बताते हैं, “यह 2012 की बात है, जब मैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर जीवनी लिखने के लिए रिसर्च कर रहा था. मेरी उनसे मुलाक़ात हुई और मैंने उनसे पूछा कि बीजेपी अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए सहयोगी दलों को कैसे अपने खेमे में लाने की योजना बना रही है?”
“उन्होंने इसका जवाब एक शब्द में दिया- जीतने की क्षमता. असल में, उनका कहना था कि सहयोगी दल बीजेपी से तभी जुड़ेंगे, जब उन्हें लगेगा कि पार्टी चुनाव में जीतने के क़ाबिल है.”
“इससे व्यावसायिक दृष्टिकोण दिखता है. आज, उदाहरण के लिए जेडीयू को ही देख लीजिए, या हरियाणा में बीजेपी के मित्र बनाए गए छोटे दलों या शिवसेना को. बीजेपी ने उन्हें अपनी पहचान में ही शामिल कर लिया. जिससे इन दलों की नाममात्र की उपस्थिति के अलावा उनकी कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं बची है.”
वहीं सरकार ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा, “अगर हम तुलना करें कि बीजेपी ने सहयोगी दलों को कैसे गले लगाया और फिर उन्हें ख़त्म कर दिया.”
कांग्रेस फैक्टर
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2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 206 सीटों पर जीत दर्ज की. लेकिन उसके बाद हुए 2014, 2019 और 2024 के चुनाव में चुनाव पार्टी अपने दम पर 100 सीटें नहीं जीत पाई है.
सरकार ने कहा, “बीजेपी को पीछे धकेलने की ज़िम्मेदारी क्षेत्रीय पार्टियों पर इसलिए भी आ गई क्योंकि नेशनल दल, ख़ासकर कांग्रेस, अपने ख़राब स्ट्रक्चर के कारण बीजेपी का मुक़ाबला करने में असमर्थ रही.”
हालांकि इस गिरावट से सबसे ज़्यादा फ़ायदा कांग्रेस को ही हो सकता है.
नीरजा चौधरी कहती हैं, “पार्टी को इस मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहिए. ममता बनर्जी को हार के बाद अपने पहले बयान में ‘इंडिया ब्लॉक’ के लिए काम करने की बात करते देखकर मैं काफ़ी हैरान थी. मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जानती हैं कि उनके और उनकी पार्टी के लिए अब ज़्यादा कुछ बचा नहीं है. यह अस्तित्व का सवाल है.”
उन्होंने कहा, “कांग्रेस ने 2024 में अखिलेश यादव के साथ काम किया था. इसलिए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को उनका समर्थन न करने का कोई कारण नहीं है. इसी तरह, केरल जैसे राज्य में, भले ही कांग्रेस गठबंधन जीत गया हो, लेकिन उनके लिए यह सुनिश्चित करना समझदारी होगी कि वाम मोर्चा पूरी तरह से न टूट जाए. अन्यथा बीजेपी को फ़ायदा होगा.”
आगे का रास्ता
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हालांकि, एक्सपर्ट्स क्षेत्रीय दल के दोबारा उभरने की संभावना से इनकार नहीं करते हैं.
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 31.34 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करते हुए 282 सीटें जीतीं. 2019 में यह बढ़कर 37.7 प्रतिशत हो गया और उसे 303 सीटें मिलीं. लेकिन 2024 में सीटें घटकर 240 रह गईं और वोट शेयर 36.5 प्रतिशत रहा.
मुखोपाध्याय के मुताबिक, “दो महत्वपूर्ण बिंदु हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है. पहला- अगर आप बीजेपी के वोट शेयर को देखें, तो उसके प्रभुत्व के बावजूद, ऐसा नहीं है कि उसे 50 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर हासिल हुआ है.”
“इसका मतलब है कि ग़ैर-हिंदुत्व राजनीति के लिए बीजेपी का मुक़ाबला करने के लिए जगह बची है. सवाल यह है कि क्या क्षेत्रीय नेता, चाहे अखिलेश यादव हों, तेजस्वी यादव हों, उमर अब्दुल्लाह हों या अन्य, क्या वे ख़ुद को नए सिरे से स्थापित करके उस जगह को हासिल कर पाएंगे?”
सरकार के मुताबिक, उन्हें बीजेपी से भी सीखने की ज़रूरत है.
वह कहते हैं, “बीजेपी यूपीए को लगातार घेरने के लिए मुद्दे पैदा करने में इसलिए सफल रही क्योंकि उसके पास सही तरह के लोग थे जो नए सोशल मीडिया या मैसेजिंग के माध्यम से नैरेटिव बनाने या बिगाड़ने के लिए उसे सही तकनीकी इनपुट दे सकते थे.”
“विपक्ष को एकजुट होने, विशेषज्ञों के साथ बैठने और उपलब्ध तकनीकी विकल्पों का विश्लेषण करने की ज़रूरत है. विपक्षी दलों को बीजेपी के उन्हें ख़त्म करने के लिए उठाए जा रहे क़दमों का अध्ययन करने की ज़रूरत है.”
वहीं मुखोपाध्याय ने कहा, “इसके अलावा पारंपरिक तरीक़ा भी है. संबंधित राज्यों की ख़ास परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, उन्हें आंदोलनकारी राजनीति का रास्ता अपनाना होगा. जन आंदोलनों के जरिए उन मुद्दों को उठाना होगा जो जनता से जुड़े हों.”
“ऐसा ही आखिरी आंदोलन राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा थी और 2024 में कांग्रेस, बीजेपी को चुनौती देने में कामयाब रही. यह एक अलग बात है कि तब से मोदी ने फिर से अपनी पकड़ मज़बूत कर ली है. लेकिन यह दिखाता है कि इस मुश्किल दौर से निकलने का रास्ता है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित