भारत की जीडीपी ग्रोथ पर बहस, आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब है? द लेंस
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सरकार ने बीते दिनों बताया कि इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत की जीडीपी की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही.
ये पिछले साल की पहली तिमाही में दर्ज 6.9 प्रतिशत से ज़्यादा है.
सरकार का कहना है कि ये भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूत रफ़्तार को दिखाती है.
दूसरी तरफ़ इन आंकड़ों पर कुछ आलोचकों का कहना है कि तस्वीर जितनी सुहानी दिख रही है उतनी है नहीं.
इस मामले में जब बात शुरू होती है तो स्वाभाविक है कि आप-हम अपनी जेब टटोलते हैं और सोचते हैं कि अगर सबकुछ इतना अच्छा है तो क्या हमारी जेब पर भी उसका असर पड़ रहा है? यही चर्चा इस हफ़्ते होती रही.
इससे जुड़े कई सवाल भी हैं. जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की ग्रोथ का असल मतलब क्या है?
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार भारत की इस ग्रोथ को किस तरह देख रहे हैं? इस पूरी बहस का मतलब हमारे और आपके लिए क्या है?
इस ग्रोथ का असर हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कब और कैसे दिखाई देगा? क्या जीडीपी के साथ नौकरियां और घरेलू आय भी बढ़ रही है?
द लेंस के आज के एपिसोड में ऐसे ही सवालों पर चर्चा की गई.
इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए बिज़नेस मामलों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार आलोक जोशी, बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के भारत के चेयरमैन जन्मेजय सिन्हा और यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर जयती घोष.
प्रोड्यूसरः शिल्पा ठाकुर, सईदुज़्जमान
गेस्ट कोऑर्डिनेटरः संगीता यादव
वीडियो एडिटिंगः आशीष जैन
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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