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‘चांद पर पहुंच गए, लेकिन हाथ से मैला ढोना खत्म नहीं हुआ’; बॉम्बे हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

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Sep 5, 2026


डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने देश में व्यापत एक ऐसी कुप्रथा की तरफ ध्यान देने के लिए कहा है जो सालों से चल रही है। हाई कोर्ट ने कहा कि हम चांद पर पहुंचने का दावा तो करते हैं, लेकिन अब तक हाथ से मैला ढोने की प्रथा को खत्म नहीं कर पाए।

बॉम्बे HC ने कहा कि भारत चांद के अनछुए हिस्से तक पहुंचने का दावा तो करता है, लेकिन जाति व्यवस्था की आड़ में उसके कुछ नागरिक अब भी इंसानी गरिमा के खिलाफ काम करने को मजबूर हैं।

चांद पर पहुंचे, लेकिन हाथ से मैला ढोना खत्म नहीं

जस्टिस भारती डांगरे और मंजूषा देशपांडे ने कहा, ’21वीं सदी में हम चांद के दूसरी तरफ पहुंचने का दावा करते हैं। फिर भी, कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे देश में जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराई अब भी मौजूद है, जो हमारे कुछ नागरिकों को ऐसा काम करने के लिए मजबूर करती है जो इंसानी गरिमा के खिलाफ है।’

हाई कोर्ट ने आगे कहा, ‘हालांकि संविधान सभी नागरिकों को कानून के सामने समानता और कानून का समान संरक्षण देता है, लेकिन संविधान को अपनाए हुए 75 साल बीत जाने के बाद भी हमारा देश उस सामाजिक बुराई से मुक्त नहीं हो पाया है जिसने हमें सदियों से परेशान कर रखा है।’

हाई कोर्ट ने ये टिप्पणी हाल ही में ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स के तौर पर रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013’ को लागू करने में राज्य/स्थानीय अधिकारियों की विफलता के खिलाफ दायर याचिका पर की।

हाई कोर्ट ने 13 अगस्त को इस मामले में हुई सुनवाई के फैसले में ये बात कही, जिसे गुरुवार, 3 सितंबर को अपलोड किया गया।

सुप्रीम कोर्ट लगा चुका है रोक

हाई कोर्ट ने कहा, ‘हाथ से मैला ढोना एक ऐसी प्रथा है, जो समुदाय के एक खास वर्ग को पीढ़ियों से इस अमानवीय काम को करने के लिए मजबूर करती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और कानूनों में इस पर रोक लगाई गई है।’

HC ने दो GR (सरकारी आदेशों) में राज्य के फैसले को रद कर दिया और कहा कि प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर/सेक्टर द्वारा काम पर रखे गए जिन सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई, उनके परिवार राज्य सरकार से 30 लाख रुपये का मुआवजा पाने के हकदार होंगे (जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था), और राज्य यह रकम संबंधित नियोक्ताओं से वसूल सकता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट में यह याचिका एक मजदूर यूनियन ‘श्रमिक जनता संघ’ से जुड़े राजू माधवे और लेखक श्रेयस पांडे के साथ मिलकर दायर की थी। राजू माधवे, सूरज के पिता थे, जिनकी 2022 में मुंब्रा की एक हाउसिंग सोसाइटी में सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय मौत हो गई थी। 

सीनियर वकील गायत्री सिंह ने दलील दी कि GR में मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य/स्थानीय अधिकारियों के बजाय प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर/नियोक्ताओं पर डाली गई थी।

राज्य के वकील ने पहले कहा था कि 36 जिलों को हाथ से मैला उठाने की प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) से मुक्त घोषित कर दिया गया है और अगस्त 2023 में कलेक्टरों ने इसके सर्टिफिकेट जमा कर दिए थे, लेकिन अगस्त 2024 की सुनवाई में उन्होंने कहा कि यह स्थिति सर्टिफिकेट जारी होने की तारीख के हिसाब से थी।

हाथ से मैला उठाने की प्रथा के जारी रहने के उदाहरण देते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा कि रिकॉर्ड के उलट, राज्य ने 81 मामलों में 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया है।

जजों ने कहा, ‘इस तरह, यह नतीजा निकाला जा सकता है कि राज्य इस सामाजिक बुराई, यानी हाथ से मैला उठाने की प्रथा को पूरी तरह खत्म करने में सफल नहीं रहा है। हालांकि राज्य ने कुछ हद तक नियमों का पालन किया है, लेकिन यह देखकर दुख होता है कि राज्य की एजेंसियां आधे-अधूरे मन से कोशिशें कर रही हैं।’

जजों ने सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करने वाले उन पांच मृत लोगों के आश्रितों को भी 30 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है, जिनका मामला याचिकाकर्ताओं ने उठाया।

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