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ममता बनर्जी को नहीं मिले ‘कृष्ण’, कौन तोड़ रहा TMC की रीढ़? पार्टी में बगावत का पूरा सच

Byadmin

Jun 11, 2026


डिजिटल डेस्क, कोलकाता। बंगाल की राजनीति का पारा इस वक्त सातवें आसमान पर पहुंच चुका है और सत्ता के गलियारों में एक भयावह सन्नाटे के बाद अब बगावत का तूफान उठ खड़ा हुआ है। कारण बिल्कुल साफ है, जिस रफ्तार और आक्रामक अंदाज से पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अभेद्य किले यानी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर अंदरूनी कलह और भयंकर अंतर्द्वंद्व की चिंगारी फैली है, उसने दीदी के राजनीतिक साम्राज्य की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है।

आज राजनीतिक पंडितों और विरोधियों की जुबान पर केवल एक ही सबसे आक्रामक और सुलगता हुआ सवाल तैर रहा है कि आखिर वो कौन सी दीमक है जो ममता बनर्जी के इस अजेय किले को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है? आखिर क्यों दीदी का ये मजबूत किला ताश के पत्तों की तरह दरक रहा है? इस सियासी उठापटक के बीच सबसे बड़ा और तीखा हमला ममता बनर्जी के उन तथाकथित खास रणनीतिकारों और सलाहकारों पर हो रहा है, जो पर्दे के पीछे बैठकर सत्ता की बिसात बिछाते हैं।

‘दीदी’ से कहां हो गई चूक?

राजनीतिक गलियारों में यह गूंज तेज हो चुकी है कि क्या पार्टी में मची इस ऐतिहासिक टूट और नेताओं के बागी तेवरों के पीछे ‘अपरिपक्व, कॉरपोरेट और बेहद खराब सलाह’ का हाथ है? क्या नए सलाहकारों की टोली ने जमीनी वफादारों की बलि चढ़ाकर दीदी को आत्मघाती रास्ते पर धकेल दिया है? आइए, बंगाल की राजनीति के मुखौटे को उतारकर, इस पूरी उठापटक के पीछे छिपे उस कड़वे और सनसनीखेज सच को परत-दर-परत समझते हैं, जिसने टीएमसी को विनाश की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।

पुरानी बनाम नई पीढ़ी, स्थान किसका, जिम्मेदार कौन?

टीएमसी में बगावत का सबसे बड़ा कारण ‘पुरानी बनाम नई पीढ़ी’ के बीच जारी मतभेद को माना जा सकता है। इस बात को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि पार्टी के बीच ये जंग एक अघोषित जंग है। राजनीतिक पंडितों की माने तो इसका कारण पार्टी में अभिषेक बनर्जी का पार्टी में बढ़ता कद भी है, जिससे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में असंतोष भी देखा जा रहा है या था भी। 

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हालांकि इस अघोषित जंग शुरुआत आज से नहीं कई महीने पहले हो चुकी थी। हल्का-फुल्का नजारा तो पश्चिम बंगाल में बीते विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला। 

पार्टी में दीदी के बाद अभिषेक की भूमिका 

इस बात को ऐसे समझिए कि ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में नंबर दो और भविष्य का नेता माना जाता है। उनके कड़े और नए फैसलों से पार्टी के कई पुराने, वरिष्ठ और कद्दावर नेता खुद को किनारे महसूस कर रहे हैं। 

इसका सीधा उदाहरण कल्याण बनर्जी का वो दो टूक अंदाज है, जिसमें उन्होंने दीदी को खुद उनमें और अभिषेक बनर्जी के बीच चुनने तक के लिए कह दिया। इस बात की शुरुआत तब हुई जब, जाली हस्ताक्षर मामले में फंसे अभिषेक बनर्जी का केस लड़ने से कल्याण बनर्जी ने इनकार कर दिया। 

कल्याण बनर्जी के अल्टीमेटम के क्या मायने?

राजनीतिक गलियारों में इस बात की खूब चर्चा हो रही है कि तृणमूल कांग्रेस के चार बार के लोकसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का केस लड़ने से साफ मना कर दिया है। कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में यहां तक कहा कि अभिषेक बनर्जी का प्रतिनिधित्व न करने का उनका फैसला न सिर्फ इस मामले में बल्कि किसी भी अन्य मामले में अभिषेक के उनके प्रति अहंकारी व्यवहार के कारण लिया गया है।

बात नहीं तक नहीं थमी टीएमसी के लिए जारी इस संघर्षकारी समय में भी कल्याण बनर्जी ने ममता बनर्जी को अल्टीमेट देते हुए कहा कि वह अभिषेक बनर्जी और उन लोगों के बीच किसी एक को चुनें जो अभी भी उनके प्रति वफादार हैं। उन्होंने कहा कि मैं पिछले 45 वर्षों से कानूनी पेशे में हूं। मैं अभिषेक बनर्जी का अहंकार बर्दाश्त नहीं करूंगा।

केंद्रीय एजेंसियों से भी डरे हैं टीएमसी नेता?

इसके अलावा इस कारण से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि हाल के वर्षों में केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और पार्टी के कई बड़े नेताओं के जेल जाने से भी आंतरिक असंतोष बढ़ा है। ऐसे में कुछ नेता अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए भी पाला बदलने की ताक में हैं।

अब बात सलाहकारों की, कौन है और क्या करते है?

राजनीतिक पंडितों के अनुसार, ममता बनर्जी के फैसलों के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े चेहरे और सलाहकार समूह काम करते हैं।अभिषेक बनर्जी (भतीजे और राष्ट्रीय महासचिव) जो कि, आज की तारीख में पार्टी की पूरी कमान और रणनीतिक फैसले व्यावहारिक रूप से संभाल रहे हैं। युवाओं को आगे बढ़ाना और पुराने चेहरों को पीछे करना उनकी रणनीति का हिस्सा है।

दूसरी ओर प्रशांत किशोर द्वारा बनाई गई आई-पैक नाम की प्रोफेशनल चुनावी मैनेजमेंट एजेंसी। यह एजेंसी आज भी टीएमसी के टिकट बंटवारे, आंतरिक सर्वे और सांगठनिक बदलावों में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है।

क्या ‘खराब सलाह’ की वजह से हो रही है बगावत?

पार्टी के भीतर असंतोष का सबसे बड़ा कारण सलाहकारों की यही ‘नई कार्यशैली’ है, जिसे पुराने नेता ‘खराब और तानाशाही सलाह’ मान रहे हैं। पुराने और जमीनी स्तरों के नेताओं का मानना है कि पार्टी की नई नीतियों के आधार पर जमीनी स्तर के नेताओं की पार्टी में अनदेखी हो रही है।

अब इसकी वजह समझिए

राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो प्रशांत किशोर की एजेंसी और अभिषेक बनर्जी की टीम कॉरपोरेट और डेटा के आधार पर फैसले लेती है। इससे दशकों से जमीन पर खून-पसीना बहाने वाले पुराने नेताओं को लगता है कि उन्हें वो सम्मान नहीं मिल रहा है जिसके वे हकदार हैं।

टिकट कटना और प्रशासनिक दबाव के भी अलग मायने

इन सभी चिजों के इतर हालिया चुनावों में कई पुराने दिग्गजों के टिकट काटकर नए चेहरों को दिए गए। सलाहकारों की इस नीति ने पुराने नेताओं को बगावत के रास्ते पर धकेल दिया है। ऐसे में पुराने नेताओं का आरोप है कि अब दीदी सीधे उनसे संवाद नहीं करतीं, बल्कि सलाहकारों की एक मजबूत ‘दीवार’ के जरिए ही फैसले उन तक पहुंचते हैं।

कैसे संतुलन बनाएंगी ‘दीदी’?

साफ है कि ममता बनर्जी की पार्टी में यह बगावत किसी बाहरी हमले से नहीं, बल्कि अंदरूनी सत्ता के ट्रांसफर की वजह से हो रही है। जहां एक तरफ कॉर्पोरेट स्टाइल की नई सलाह पार्टी को आधुनिक बनाने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ यही ‘अपरिपक्व सलाह’ पार्टी के पुराने वफादारों को बागी बना रही है। ऐसे में अगर ममता बनर्जी ने समय रहते अपने सलाहकारों और पुराने नेताओं के बीच संतुलन नहीं बनाया, तो यह असंतोष टीएमसी के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

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