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जाने-माने फोटोग्राफ़र रघु राय नहीं रहे. शनिवार को 83 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.
फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया में रघु राय ने अपना काम इस खूबी से किया है कि वे इस दुनिया के कल्ट फ़िगर माने जाते हैं.
फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया में उनका जलवा ऐसा रहा कि बढ़ती उम्र के बावजूद भी वे किसी युवा पेशेवर से ज़्यादा व्यस्त रहे.
दुनिया भर की समाचार-पत्रिकाओं से फ़ोटो खींचे जाने के अनुरोध के बीच अपने आख़िरी दिनों में भी वे फ़ोटोग्राफ़ी के इतिहास को संजोने में जुटे थे.
कुछ साल पहले एक बातचीत में रघु राय ने अपनी ज़िंदगी की तस्वीर खोल कर दिखाई थी.
बातचीत के दौरान वो मानों अपनी जिंदगी के कैमरे की रील को पीछे ले गए.
बोले, ”हमारे समय में लोग बचपन में कहां कुछ तय कर पाते थे. घर का माहौल कुछ ऐसा था कि पढ़ता था और आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेल धूप लेता था. शाम के बाद घर से बाहर रहने की इजाज़त नहीं होती.”
पिता को याद करते हुए एक क्षण के लिए वो ठिठके और फिर बोले, ”पिताजी का अनुशासन ऐसा था कि वे जो चाहते, वही मैं करता. तब ऐसा ही चलन था. वे चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं, तो मैं 22 साल की उम्र में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका था. इसके बाद फिरोजपुर के जाट रेजिमेंट में ड्राइंग इंस्ट्रक्टर के तौर पर एक साल तक काम भी किया लेकिन काम में मन नहीं रम रहा था. लेकिन किसी दूसरे काम में भी दिलचस्पी नहीं पैदा हो रही थी.”
पहली ही तस्वीर ‘लंदन टाइम्स’ में आधे पन्ने में छपी
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हालांकि तब तक रघु राय के बड़े भाई एस पॉल फोटोग्राफ़ी की दुनिया में स्थापित हो चुके थे. संयोग से 1966 में रघु उनके पास दिल्ली आए.
वे तब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में चीफ़ फोटोग्राफ़र हुआ करते थे. कुछ ऐसा संयोग हुआ कि उनके एक साथी अपने गांव जा रहे थे. रघु राय ने भाई से जिद ठान ली कि उन्हें उनके साथ जाने दिया जाए. रघु राय ने भाई की इजाजत तो ली है, उनका कैमरा भी ले लिया. सोचा गांव में कुछ तस्वीरें खींच लेंगें.
रघु राय उन दिनों को याद करते हुए बताया था, ” बात ये हुई कि रास्ते में एक गदहा दिखा, मैंने उसकी तस्वीर लेनी चाहिए. पर वह भागने लगा. मैं उसके पीछे भागने लगा. यह खेल तब तक चला जब तक गदहा थक कर रुक नहीं गया. तब जाकर मैंने उसकी तस्वीर खींच ली. बाद में बड़े भाई साहब ने उसे देखा, और उसका प्रिंट तैयार करके उसे विदेश के कुछ अखबारों के लिए भेज दिया.”
इस तस्वीर ने उनकी ज़िंदगी में चमत्कार किया. पहली ही तस्वीर ‘लंदन टाइम्स’ में आधे पन्ने पर छप गई.
तब उन्हें इसके इतने पैसे मिले कि महीने भर का वेतन बराबर हो गया. रघु को लगा कि वो भी ये कर सकते हैं. बस इसी भरोसे ने उन्हें कैमरे के पीछे ला खड़ा किया.”
उस दौर को याद करते हुए उन्होंने बीबीसी से कहा था, ”आप इसे संयोग, किस्मत या फिर जो चाहें कह लें, भाई साहब फ़ोटोग़्राफर नहीं होते, मेरी पहली तस्वीर ‘लंदन टाइम्स’ में नहीं छपती, तो शायद मैं कभी फ़ोटोग्राफ़र नहीं बनता.
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‘द स्टेट्समैन’ का ज़िंदगी पर असर
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रघु राय ने माना था कि उन्हें नौकरी मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी. भाई साहब थे ही, फिर पहली तस्वीर लंदन टाइम्स में छपने के बाद से ही उनमें भी फ़ोटोग्राफी के प्रति पैशन आ गया.
वो उनकी स्कूटर लेकर दिल्ली की सडक़ों पर निकल पड़ते. घंटों इधर-उधर के चक्कर काटते, फ़ोटो के मौके तलाशते.
रघु राय को 1966 में ही ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में नौकरी मिल गई. लेकिन ज़्यादा दिन तक वो ज़्यादा दिन तक नहीं टिके. क्योंकि तब ‘द स्टेट्समैन’ की काफ़ी प्रतिष्ठा हुआ करती थी, 1967 में वहां पहुंच गए.
रघु राय अपनी जिंदगी में स्टेट्समैन की भूमिका को अहमियत देते हैं.
उनके मुताबिक़, ”सच पूछिए तो इसी अख़बार ने मुझे नामचीन फ़ोटोग्राफ़र बनाया. वहां एक समाचार संपादक थे-आर.एन. शर्मा. परंपरागत पत्रकार थे, लेकिन आदमी बहुत भले थे. वे मेरी तस्वीरों को ध्यान से पढ़ते थे. तस्वीरों को देख तो सब लेते हैं लेकिन उसे पढ़ना सबके बस की बात नहीं होती.”
” संयोग ऐसा था कि वे मेरी तस्वीरों को पढ़कर उम्मीद से ज़्यादा जगह देने लगे थे. इससे मेरा भरोसा पक्का होता गया. मेहनत भी बढ़ गई. लेकिन मैं तस्वीरों को ज़्यादा से ज़्यादा से बेहतर बनाने की कोशिश जरूर करता. वे कहते दो कॉलम की फ़ोटो बनाना, लेकिन मैं फ़ोटो बनाता चार कॉलम की. तस्वीर को देखने के बाद वे उसकी जगह निकाल ही लेते. तो मेरे बनने में उनका बड़ा योगदान रहा.”
‘द स्टेट्समैन’ में काम करने के समय की उनकी कई यादें हैं.
इन यादों का साझा करते हुए वो भावुक हो गए. कहा, ” एक घटना की याद अब भी है. बात जेपी आंदोलन के समय की है. बिहार में आंदोलन चरम पर था. मैं जेपी के साथ बिहार घूम रहा था. आंदोलन के दौरान उनपर लाठी चार्ज हुआ था लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री ने इसका खंडन कर दिया. अगले ही दिन ‘स्टे्टसमैन’ के पहले पन्ने पर लाठीचार्ज की तस्वीर देखकर गृहमंत्री को संसद में माफी मांगनी पड़ी. इससे जेपी बेहद प्रभावित हुए और इसके बाद बड़े प्यार से मिलते थे.”
मदर टेरेसा और इंदिरा गांधी से नज़दीकी
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रघु राय की तस्वीरों के विषय हमेशा आम आदमी और उसके हाव भाव और शहरों की रौनक और गलियों की हलचल आदि रहे जबकि फोटोग्राफ़र नदी, तालाब, पर्वत जैसी चीजों को कैमरे में कैद करना पसंद करते हैं, इस पसंद की कोई वजह?
इस सवाल को सुनते ही उनकी आंखों में एक चमक आई. तुरंत बोले, ” देखिए मेरी परवरिश उस समाज में हुई जहां, आम इंसानों की कद्र करना सिखाया गया. आम इंसानों के भावों से हमारा रोज का वास्ता पड़ता है. आप यकीन करें या न करें, ये आम लोग ही हैं जिनके हालात आजादी के इतने सालों के बाद भी जस के तस है, ऐसे लोग मुझे आकर्षित करते रहे हैं.”
बोले, ”भारत के आम लोग, उनके रहन सहन और जीवनशैली की दुनिया भर में चर्चा होती है, मैं भी उन्हें सम्मान से देखता हूं. कई बार कोशिश करता हूं कि मेरे चित्रों से सत्ता में बैठे लोगों का ध्यान आम लोगों की समस्याओं पर जाए. वैसे सच यही है कि मैं आम लोगों की तस्वीरें उतारकर कहीं ज़्यादा सुकून पाता हूं.”
इंदिरा गांधी और मदर टेरेसा से अपनी नज़दीकियों के बारे में बात करते हुए उन्होंंने बताया था, ” देखिए मैं आपको बता दूं कि इन हस्तियों से नजदीकियां काम के सिलसिले में बनीं. जब मैं स्टेट्समैन में काम कर रहा था तब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री हुआ करती थीं. सच पूछिए तो मैंने उन जैसी राजनीतिक हस्ती दूसरी नहीं देखी. उनके आलोचक चाहे जो कहें लेकिन वो एक कमिटेड नेता थीं.”
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रघु राय के मुताबिक़ इंदिरा गांधी के साथ ख़ास बात यह भी थी कि वे कला और संस्कृति को बहुत ज़्यादा महत्व देती थीं. उन्हें यह पता होता था कि फ़ोटोग्राफ़र किस कोण से उनकी तस्वीर खींच रहा है. एक प्रधानमंत्री के तौर पर भी देश को उनके जैसा दूसरा प्रशासनिक नेता नहीं मिल सका.
रघु राय के मुताबिक़ उन्होंने इंदिरा गांधी पर तीन किताबें भी तैयार कीं.
उन्होंने इस बारे में बात करते हुए कहा था, ”आपातकाल की जब उन्होंने घोषणा की, तो हमलोगों ने उनका विरोध किया था. वे चुनाव हार गईं, जेल गईं लेकिन उनकी हिम्मत देखिए कैसे उन्होंने अपनी शानदार वापसी की. जब उनकी हत्या की गई, तो मुझे कई दिनों तक यकीन ही नहीं हुआ कि उनकी हत्या की जा सकती है, लेकिन यह हक़ीक़त थी. तब हमने उनपर इंडिया टुडे का संग्रहणीय अंक निकाला था.”
रघु राय मदर टेरेसा में एक मां को देखते थे.
बोले, ”जहां तक मदर टेरेसा की बात है, वो एकदम मां जैसी थीं. वे अपने प्यार से किसी का भी दिल जीत सकती थीं, अपने देश से दूर आकर उन्होंने यहां के गरीब बेसहारा लोगों के लिए उन्होंने जितना कुछ किया उसका दूसरा उदाहरण फिर कभी नहीं मिलेगा. वे सबसे बड़े प्यार से मिलती थीं और उनसे मिलकर हर कोई नई ऊर्जा से भर जाता था.”
फ़िल्मों और क्रिकेट से दूरी
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रघु राय से भारतीय मीडिया में छाए रहने वाले दो विषय क्रिकेट और फिल्मों पर भी बात हुई.
वो बोले, ” देखिए ऐसा नहीं है कि मुझे फ़िल्में पसंद नहीं आतीं लेकिन अपनी तबियत उस माध्यम में काम करने की कभी नहीं हुई. दरअसल मायानगरी का तामझाम, चमक-दमक मुझे प्रभावित नहीं कर पाया या कहें मैं उस चमक-दमक से दूर ही रहना चाहता था.”
”जहां तक क्रिकेट की बात है तो मैं आपको बता दूं कि बतौर खेल यह भी मुझे पसंद है और मंसूर अली खां पटौदी और कपिल देव बतौर क्रिकेटर मुझे काफी पसंद रहे. लेकिन असली मुश्किल यह है कि यह महज खेल भर नहीं रह गया. इसमें इतना पैसा आ गया है कि खेल का रोमांच कहीं पीछे छूट गया है.”
क्रिकेट के कॉरपोरेटीकरण पर उन्हें दुख था. बोले,” यह अब कारपोरेट कारोबार में तब्दील हो चुका है. अपने खिलाड़ियों का भी ध्यान खेल से ज़्यादा पैसे बनाने पर होता गया. इस एक खेल के फेर में दूसरे खेलों की क्या गत हो गई यह किसी से छुपी नहीं है. कई बार तो लगता है कि क्रिकेट खेल कम राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार ज़्यादा होता जा रहा है.”
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रघु राय की ख्याति पूरी दुनिया में फैली थी. उनसे जब ये पूछा कि वो जिस ऊंचाई पर हैंवहां दुनिया भर से काम करने के ऑफ़र आए होंगे. फिर भी अपना ठिकाना भारत ही क्यों बनाए रखा?
रघु राय के जवाब में एक संतोष और अनुभव दिख रहा था. बोले, ” देखिए भारत से बेहतर कोई मुल्क नहीं है, न ही हो सकता है. देश की मिट्टी की सुगंध में काम करने का मजा दुनिया में कहीं नहीं मिल सकता ”
”भारत में इतनी विविधताएं हैं कि कई जिंदगी यहां काम करते हुए बिताई जा सकती हैं. पूरा भारत तो रहने दीजिए, अकेले दिल्ली में इतना काम बाकी है करने को कि मुझे कई जन्म लेने पड़ जाएंगे. हाल ही में दिल्ली पर अपनी एक किताब पूरी कर रहा था तब यह भरोसा और ज़्यादा मजबूत होता गया.”
रघु राय फोटोग्राफ़र नहीं होते तो क्या होते?
इस सवाल का जवाब मानों उनके पास तैयार था, ” इसके लिए मुझे इतनी ज़्यादा सोच विचार नहीं करनी होती. देखिए मुझे फ़ोटोग्राफ़ी से जितनी मोहब्बत है, उतना ही लगाव मुझे बागवानी से है. अगर मैं फ़ोटोग्राफ़र नहीं होता तो पक्का माली होता.”
वो बोले, ”मैं फोटोग्राफ़र होने के बाद भी शनिवार-रविवार को कोई काम नहीं करता हूं . अपने फार्म हाउस पर दिन बिताता हूं. मैंने अपने फार्म हाउस पर हर तरह के फूल पौधे लगा रखे हैं. दुनिया भर से उसे इकट्ठा करता रहा हूं. उसमें भी काफी मजा आता है और लगता है कि प्रकृति की छांव में हूं.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित