नरेंद्र शर्मा, जयपुर। राजस्थान के साढ़े चार लाख सरकारी कर्मचारियों और करीब आठ लाख पेंशनधारियों को निश्शुल्क उपचार और दवा सहित स्वास्थ्य की विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए चलाई जा रही राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजना (आरजीएचएस) में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है।
योजना के क्रियान्वयन का जिम्मा संभाल रहे अधिकारियों, सरकारी चिकित्सकों, निजी अस्पतालों, दवा विक्रेताओं और लाभान्वितों ने मिलकर 900 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला किया है।
चार साल में हुआ यह घोटाला सामने आने के बाद सरकार ने योजना के क्रियान्वयन का जिम्मा संभाल रही अधिकारी शिप्रा विक्रम को पद से हटाने के साथ ही 200 से अधिक चिकित्सकों, दवा विक्रताओं और लाभान्वितों के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवाया है।
करीब छह दर्जन सरकारी चिकित्सकों एवं कर्मचारियों को निलंबित किया है। अब इन्हें सरकारी सेवा से बर्खास्त करने की कार्रवाई होगी।
राजस्थान सरकार के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने बताया कि लंबे समय से योजना में अनियमितताओं की शिकायतें मिल रही थी। जांच में तथ्य सामने आने के बाद सरकार ने कार्रवाई शुरू की है।
राजस्थान राज्य स्वास्थ्य बीमा इंश्योरेंस एजेंसी ने फर्जीवाड़े में शामिल 473 कर्मचारियों के खिलाफ उनसे संबंधित विभागों को पत्र लिखकर कार्रवाई करने के लिए कहा है। 100 दवा विक्रेताओं के लाइसेंस निलंबित किए गए हैं।
साथ ही योजना के क्रियान्वयन का जिम्मा वित्त विभाग से छीनकर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग को सौंपा गया है। दो दर्जन निजी अस्पतालों को योजना से बाहर कर दिया गया। अब इन अस्पतालों में आरजीएचएस का लाभ नहीं मिल सकेगा।
अकेले अलवर जिले में ही दवा विक्रेताओं से मिलीभगत करके 11 चिकित्सकों ने बिना बीमारी के करीब 100 करोड़ की दवाएं पर्ची पर लिख दी। ऐसे हुआ घोटाला स्वास्थ्य योजना के तहत सरकारी कर्मचारी, पेंशनधारी और उनके आश्रित अधिकृत दवा विक्रेताओं से सरकारी अस्पताल के चिकित्सक की पर्ची पर लिखी गई दवा ले सकते हैं।
दवा विक्रेता बिल पेश कर सरकार से भुगतान लेता है। जांच में सामने आया कि कई दवा विक्रेताओं से मिलीभगत करके लाभान्वितों ने दवा के स्थान पर घरेलू सामान खरीद लिया।
कुछ मामलों में दवा विक्रेताओं ने सरकारी चिकित्सकों से मिलीभगत करके फर्जी पर्चियां बनवाकर दवा लिखवा ली, जिसके बदले चिकित्सक को कमीशन और उपभोक्ता को घर का सामान दे दिया।
कई मामलों में दवा विक्रेताओं ने सरकारी कर्मचारियों से मिलीभगत करके एक ही बिल को कई बार पेश कर वित्त विभाग से भुगतान उठाया।
प्रदेश के सबसे बड़े सवाई मानसिंह अस्पताल के चिकित्सक डॉ. मनोज जैन ने 500 से ज्यादा ओपीडी पर्चियां (सरकारी अस्पताल में मरीजों को दिखाने की पर्ची) बनवाई। मरीजों के नाम भी फर्जी लिखे गए।
फिर जयपुर के दो दवा विक्रेताओं ने करोड़ों रुपये के बिल बनाकर वित्त विभाग से भुगतान ले लिया। उल्लेखनीय है कि ओपीडी पर्ची पर 50 हजार और गंभीर बीमारी के इलाज पर अधिकतम पांच लाख रुपये सरकार वहन खर्च कर सकती है।