ओमप्रकाश तिवारी, नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में कुछ राजनेताओं द्वारा दिए गए रिजीम चेंज के बयानों पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग सोच रहे हैं कि ‘रिजीम चेंज’ से परिस्थिति बदलेगी, तो न ऐसा पहले कभी हुआ है, न अब होगा।
मोहन भागवत आज नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परंपरागत विजयदशमी समारोह को संबोधित कर रहे थे। यह समारोह संघ के शताब्दी वर्ष का समापन समारोह भी था, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त भी उपस्थित थे।
मोहन भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, बंग्लादेश और नेपाल में घटी हाल की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पश्चिम से एक आंधी चली है, जो हर प्रकार की व्यवस्था, हर प्रकार की भद्रता, हर प्रकार के मूल्यों, हर प्रकार के सांस्कृतिक और मानवीय संस्कारों से विरोध रखती है। उसको नष्ट-भ्रष्ट, उद्ध्वस्त करना चाहती है। यह सब किया कराया उधर का है।
वह कहते हैं कि ‘रिजीम चेंज’ करने से परिस्थिति बदलेगी। लेकिन ऐसा न पहले कभी हुआ है, न आज होगा। उन्होंने कहा समाज की परिस्थिति समाज के प्रयासों से ही बदलती है, और संघ ऐसे ही प्रयासों में लगा हुआ है।
मोहन भागवत ने कहा कि अपने स्वार्थ का पोषण करनेवाले लोग ऐसी कार्रवाइयां सारी दुनिया में चलाते हैं। भारत में भी ऐसे प्रयास चल रहे हैं। लेकिन पिछले दशकों में जिस प्रकार की दृढ़नीति से भारत चला है, यहां के पक्के नेतृत्व ने जिस प्रकार की दृढ़ता से इसको चलाया है, उसके कारण देश की नई पीढ़ी में देश के लिए कुछ करने का देशाभिमान जगा है।
देश में इन दिनों कुछ वर्गों द्वारा लगातार चलाए जा रहे आंदोलनों की ओर इशारा करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि देश बड़ा है, तो समस्याएं भी होंगी ही। समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन भी होंगे। लेकिन आंदोलन समाधान के लिए होने चाहिए।
आंदोलन किसी प्रकार की अनबन, द्वेष या विभाजन पैदा करने के लिए नहीं होने चाहिए। यदि आंदोलन के पीछे अपनेपन की प्रेरणा है, तो सब ठीक होता है। लेकिन आंदोलन किसी दूसरे उद्देश्य से चले तो वह राजनीति का साधन बन जाता है। उन्होंने कहा कि आज कुछ लोग मतभेद को मनभेद में बदलने में लगे हैं।
संघ प्रमुख ने अमरीका जैसे बड़े देशों द्वारा भारत के साथ किए जा रहे व्यवहार की ओर भी बिना किसी देश का नाम लिए इशारा किया। उन्होंने कहा कि विश्व की परिस्थिति विचित्र है। विश्व में ऐसी कई शक्तियां हैं, जिन्हें भारत चाहिए भी, लेकिन भारत बड़ा होते नहीं दिखना चाहिए। वे भारत को दबाना चाहती हैं। क्योंकि भारत के बड़ा होने से उनके बड़प्पन को धक्का लग सकता है। इसलिए वे भी अपना खेल करती रहती हैं।
मोहन भागवत ने युवाओं (जेन-जी) और अभिभावकों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि ज्ञान और तकनीक केवल साधन हैं, उनका विवेकपूर्ण उपयोग ही सबसे महत्वपूर्ण है। नैतिक अनुशासन के बिना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग महाविनाश का कारण बन सकता है। इसके साथ ही उन्होंने नई पीढ़ी को विकृतियों से बचाने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर उचित अनुशासन और कानूनी नियंत्रण को समय की मांग बताया।
सरसंघचालक ने युवाओं में बढ़ती नशीली दवाओं की लत को एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या करार दिया। उन्होंने कहा कि इसके पूर्ण समाधान के लिए शासन, प्रशासन और समाज (विशेषकर अभिभावकों) को समय रहते एकजुट होकर नई पीढ़ी में सही विवेक जगाना होगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि एक संगठित, बलशाली और जिम्मेदार हिंदू समाज की बात करना किसी भी अन्य पंथ या देश की भावात्मक एकता के विरोध में नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता की गारंटी है। इसके अलावा, उन्होंने आह्वान किया कि ‘वंदे मातरम्’ हमारा राष्ट्रगीत है और इसे स्वाभिमान के साथ संपूर्ण गाने में किसी भी प्रकार का संकोच या विरोध नहीं होना चाहिए।
संघ नहीं होता, तो हिंदू संस्कार और हिंदू जीवन पद्धति विलुप्त हो गए होते
दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं होता, तो हिंदू संस्कार और हिंदू जीवन पद्धति शायद कब के विलुप्त हो गए होते। वह मंगलवार को नागपुर में संघ के शताब्दी वर्ष समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना हिंदू समाज को एकजुट और सामर्थ्यवान बनाने के उद्देश्य से हुई थी। स्वतंत्रता के बाद संघ ने व्यक्ति निर्माण, भारतीयता और राष्ट्रीय निष्ठा को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया। संघ की संगठन शक्ति के प्रभाव से ही जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बना।
संजय गुप्त ने कहा कि भारत आर्थिक प्रगति कर रहा है, लेकिन समाज आज भी जाति, पंथ और वर्गभेद में बंटा है। नागरिकों में राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति जागरूकता और अनुशासन बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि संघ इन चुनौतियों पर लगातार काम कर रहा है।