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अमेरिका ने भारत की जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई के गैंग समेत तीन समूहों पर बड़ा एक्शन किया है.
अमेरिकी जांच एजेंसियों ने इन समूहों के 24 संदिग्धों को गिरफ़्तार करने का एलान किया है.
यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध, नशा तस्करी, जबरन वसूली, क़त्ल और हरदीप सिंह निज्जर के क़त्ल समेत कई मामलों से जुड़ी जांच के तहत की गई है.
अमेरिका के सरकारी वकीलों ने बिश्नोई गैंग समेत भारत आधारित तीन संगठित आपराधिक गिरोहों से कथित संबंधों के आरोपों में अमेरिका, कनाडा और यूरोप से इन संदिग्धों को गिरफ़्तार करने की जानकारी दी है.
इस बारे में अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया के अटॉर्नी ऑफ़िस की ओर से जानकारी दी गई है.
हालांकि, अमेरिका की इस कार्रवाई के बाद कुछ सवालों को लेकर सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा हो रही है. जैसे कि, क्या भारत की जेलों में बंद किसी अपराधी को अमेरिका के सुपुर्द किया जा सकता है?
अगर हरदीप सिंह निज्जर का क़त्ल कनाडा में हुआ है, तो अमेरिकी अदालतें इस मामले में कैसे कार्रवाई कर सकती हैं? और क्या इस कार्रवाई का भारत और अमेरिका के कूटनीतिक संबंधों पर असर पड़ सकता है?
इस रिपोर्ट में इन सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है.
क्या भारतीय जेलों में बंद शख़्स को अमेरिका को सौंपा जा सकता है?
जनता के सामने लाई गई तीन चार्जशीटों में 37 अभियुक्तों पर आरोप लगाए गए हैं. इनमें से दो अभियुक्त ऐसे हैं, जिन पर भारत की जेलों में बंद होने के बावजूद अपने वैश्विक आपराधिक गिरोह को चलाने के आरोप लगे हैं.
अमेरिकी आरोप पत्र में पंजाब से जुड़े लॉरेंस बिश्नोई और सतिंदरजीत उर्फ़ गोल्डी बरार पर निज्जर के क़त्ल का आदेश देने के आरोप लगाए गए हैं.
लॉरेंस बिश्नोई इस समय गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद हैं.
25 जून को आई फ़ेडरल ग्रैंड ज्यूरी के सात बिंदुओं वाले आरोप पत्र में 17 अभियुक्तों पर एक आपराधिक गिरोह चलाने के आरोप लगाए गए हैं, जो अमेरिका, कनाडा समेत दुनिया भर में सुपारी देकर क़त्ल करवाने, नशा तस्करी, अगवा, फ़िरौती, हथियारों की तस्करी और दूसरे अपराधों में कथित तौर पर शामिल हैं.
अमेरिकी आरोप पत्रों में जिन लोगों के नाम अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध, नशा तस्करी, जबरन वसूली, क़त्ल और हरदीप सिंह निज्जर के क़त्ल समेत कई मामलों में दर्ज हैं, उनमें दो बड़े नाम लॉरेंस बिश्नोई और जग्गू भगवानपुरिया के हैं.
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अब सवाल यह उठता है कि अमेरिका अगर भारत की जेलों में बंद अपराधी को उसके सुपुर्द करने की मांग करता है तो भारत के पास क्या विकल्प हैं, क्या भारत उन्हें अमेरिका को सौंप सकता है?
इसका जवाब है- हां, लेकिन इसकी प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है.
साल 1997 में भारत और अमेरिका के बीच प्रत्यर्पण संधि हुई थी.
भारतीय दूतावास की वेबसाइट के मुताबिक़, इस संधि के तहत जिस अपराध का आरोप व्यक्ति पर लगाया गया है, वह अमेरिका और भारत दोनों देशों के क़ानूनों के तहत अपराध होना चाहिए और उसमें कम से कम एक साल की सज़ा का प्रावधान होना चाहिए.
प्रत्यर्पण की मांग औपचारिक तौर पर कूटनीतिक चैनल के ज़रिए भेजी जाती है. इस समझौते के तहत अगर किसी का प्रत्यर्पण हासिल करना है तो उसके लिए कुछ नियम तय हैं.
इसमें आम तौर पर चार्जिंग दस्तावेज़, गिरफ़्तारी वारंट, अपराध के तथ्यों की पूरी जानकारी, संबंधित क़ानून, उस अपराध से जुड़ी क़ानूनी धाराएं और उसमें मिलने वाली सज़ा का विवरण, साथ ही ऐसे सबूत या जानकारी शामिल होती है जो उस व्यक्ति पर मुक़दमा चलाने को जायज़ ठहराती हो.
अगर उस व्यक्ति को अदालत पहले ही दोषी क़रार दे चुकी है तो प्रत्यर्पण की मांग के साथ सज़ा के फ़ैसले की कॉपी या किसी न्यायिक अधिकारी का बयान लगाना होगा कि उस व्यक्ति को दोषी ठहराया जा चुका है.
आपराधिक मामलों के जानकार एडवोकेट निखिल सराफ़ ने इस मामले को लेकर बीबीसी पंजाबी से ख़ास बातचीत की है.
भारत में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे लोगों को अमेरिका के सुपुर्द करने के सवाल पर निखिल सराफ़ कहते हैं, “इन दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि है. अमेरिका प्रत्यर्पण के लिए भारत को औपचारिक अनुरोध भेज सकता है, जिस पर भारतीय अदालतें और सरकार क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई करती हैं.”
वह आगे कहते हैं, “इस प्रक्रिया में बहुत समय लगता है. लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार इस मामले को किस तरह आगे बढ़ाना चाहती है. अगर सरकार उन्हें सौंपना चाहती है तो वह इस प्रक्रिया को तेज़ भी कर सकती है, यह सरकार पर निर्भर करता है. लेकिन अगर सरकार उन्हें सौंपना नहीं चाहती तो ऐसे मामले सालों तक चलते रहते हैं. साफ़ बात यह है कि प्रत्यर्पण जल्दी होने वाली चीज़ नहीं है.”
कनाडा में क़त्ल हुआ तो अमेरिका में केस कैसे दर्ज हो सकता है?
अमेरिका के संघीय वकीलों और फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (एफ़बीआई) ने अपने ‘ऑपरेशन हार्डबॉल’ में दुनिया भर में अपराध फैलाने के आरोप में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ तीन आरोप पत्र (चार्जशीट) पेश किए हैं.
यह ऑपरेशन अमेरिका, कनाडा और यूरोप की क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों की एक बड़ी संयुक्त कार्रवाई है.
इन आरोप पत्रों में ख़ालिस्तान समर्थक कार्यकर्ता की हत्या का मामला भी शामिल है, जिनकी पहचान अदालत के दस्तावेज़ों में हरदीप सिंह निज्जर के तौर पर की गई है. वह कनाडा में रह रहे थे.
इस क़त्ल के मामले में लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बरार पर क़त्ल का आदेश देने के आरोप हैं. हरदीप सिंह निज्जर 18 जून, 2023 को ब्रिटिश कोलंबिया के सरे में एक गुरुद्वारे से जब बाहर निकल रहे थे तो दो बंदूकधारियों ने गोली मारकर उनका क़त्ल कर दिया था.
वकीलों ने आरोप लगाया कि बिश्नोई गैंग ने प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक नेताओं को हिंसा का निशाना बनाया और समुदाय के लोगों से फ़िरौती मांगने की कोशिश की.
उन्होंने इल्ज़ाम लगाया कि बिश्नोई, बरार और दूसरे अभियुक्तों ने कैलिफ़ोर्निया में पीड़ितों से जबरन वसूली करने की कोशिश की.
यहां सवाल उठता है कि अगर हरदीप सिंह निज्जर का क़त्ल कनाडा में हुआ तो क्या अमेरिकी अदालतें इसमें दख़ल देकर अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकती हैं? इसका जवाब है- हां.
अमेरिकी आरोप पत्र के मुताबिक़, यह कथित आपराधिक गिरोह अमेरिका में जबरन वसूली, नशा तस्करी और दूसरे संगठित अपराधों में शामिल था.
इसी वजह से, भले ही हरदीप सिंह निज्जर का क़त्ल कनाडा में हुआ था, लेकिन अमेरिका का कहना है कि यह कथित आपराधिक गिरोह की गतिविधियों का ही एक हिस्सा था. इसी आधार पर अमेरिकी अदालतें इस मामले को अपने केस का हिस्सा बना सकती हैं.
अमेरिकी क़ानून के मुताबिक़, यह ज़रूरी नहीं है कि अपराध अमेरिका के अंदर ही हुआ हो.
अगर किसी आपराधिक गिरोह की गतिविधियों का संबंध अमेरिका से जुड़ा है, तो अमेरिकी क़ानून कुछ मामलों में विदेश में हुए अपराधों पर भी कार्रवाई की अनुमति देता है.
जैसे, अगर लॉस एंजिल्स में वसूली की धमकी दी गई हो या अमेरिका-कनाडा सीमा पर नशा तस्करी हुई हो, तो अमेरिका ऐसे मामलों को अपने मुक़दमे में शामिल कर सकता है.
अमेरिका ने बाहर रह रहे गैंग लीडरों पर क्यों आरोप लगाए?
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इस आरोप पत्र में अभियुक्तों पर धोखाधड़ी की साज़िश रचने, हॉब्स एक्ट के तहत जबरन वसूली की कोशिश करने, नशीले पदार्थों की बिक्री, बिना लाइसेंस वाले हथियारों की तस्करी, और मशीन गन रखने के आरोप लगाए गए हैं.
आरोप पत्र के मुताबिक, इन अभियुक्तों की ओर से अमेरिका की धरती पर आपराधिक गतिविधियां चलाई गईं और इन गैंगों के बड़ी संख्या में सदस्य अमेरिका में मौजूद हैं.
एफ़बीआई ने चार्जशीट में लिखा है कि बिश्नोई जेल की कोठरी से दुनिया भर में आपराधिक गिरोहों का नेतृत्व करता है. जेल में वह तस्करी किए गए ग़ैरक़ानूनी मोबाइल फ़ोन और दूसरे वॉइस-ओवर-इंटरनेट प्रोटोकॉल डिवाइसों का इस्तेमाल करता है.
अमेरिकी संघीय वकीलों ने इन अभियुक्तों को सिर्फ़ कनाडा में हुए क़त्ल के मामले में ही नहीं, बल्कि अमेरिका में किए गए गंभीर अपराधों के लिए भी नामज़द किया है.
चार्जशीट में बताया गया है कि अमेरिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर बैठे गैंग लीडरों के तार अमेरिका से जुड़े हैं और यहां उन समूहों के कई साथी अपनी आपराधिक गतिविधियां चलाते हैं.
यही वजह है कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले अपराध पर लगाम लगाने के लिए अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगी क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ मिलकर यह कार्रवाई की है.
यूनाइटेड स्टेट्स अटॉर्नी ऑफ़िस की वेबसाइट के मुताबिक़, रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस के कमिश्नर माइक डूहेम ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय अपराध का मुक़ाबला करने का सबसे प्रभावी तरीक़ा यह है कि कई क़ानून लागू करने वाली एजेंसियां अपराधियों को उनके संचालन स्थलों पर निशाना बनाने के लिए मिलकर काम करें.”
“हमने सामूहिक रूप से संगठित अपराधियों की गतिविधियों को नाकाम किया है, जिन्होंने कनाडा और अमेरिका दोनों में लोगों से जबरन वसूली के लिए क़त्ल और डराने-धमकाने का इस्तेमाल किया. हम कनाडा, अमेरिका और दुनिया भर में सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए अपनी पूरी कोशिश करते रहेंगे.”
भारत-अमेरिका के रणनीतिक संबंधों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
इस सवाल को लेकर बीबीसी के सहयोगी पत्रकार रविंदर सिंह रॉबिन ने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल रिलेशंस डिपार्टमेंट के प्रमुख डॉ. राजेश कुमार से ख़ास बातचीत की.
डॉ. राजेश कुमार का मानना है कि अगर इस मामले में भारत प्रत्यर्पण करता है तो इससे अमेरिका के साथ उसके संबंध बेहतर ही होंगे.
वह कहते हैं, “यहां दोनों देश लोगों को एक-दूसरे को सौंपने के लिए बाध्य हैं. अमेरिकी प्रशासन भी जानता है कि भारत इन मामलों को लेकर संवेदनशील है.”
वह आगे कहते हैं, “ऐसी बातों की कुछ पुरानी मिसालें भी हैं कि अगर कोई इन मुद्दों से सहमत नहीं है और इन तत्वों का समर्थन करता है तो हमारे देश में विपक्ष को यह कहने का बड़ा मौक़ा मिल जाता है कि अमेरिकी हमारी घरेलू राजनीति में दख़ल दे रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ़ दोनों देशों को प्रत्यर्पण संधि का सम्मान करना पड़ेगा.”
डॉ. राजेश कुमार डेविड हेडली का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यह मामला पिछली मिसाल की तरह साबित हो सकता है.
वह कहते हैं, “डेविड हेडली मामले में अमेरिका ने भारत का सहयोग किया था और अब आप उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. इसलिए यह एक बड़ी बात होगी और दोनों देश एक-दूसरे के और क़रीब आएंगे.”
हालांकि 2008 के मुंबई हमलों के अभियुक्त डेविड हेडली का अमेरिका ने भारत को प्रत्यर्पण नहीं किया था. उसने अमेरिकी जेल में रहते हुए इस मामले में भारत की जांच एजेंसियों की मदद की थी.
इसी मामले के एक और अभियुक्त तहव्वुर हुसैन राना को अमेरिका से भारत प्रत्यर्पित किया जा चुका है.
उसे 10 अप्रैल 2025 को एक विशेष विमान से दिल्ली लाया गया था, जहाँ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने औपचारिक रूप से उसे गिरफ्तार कर लिया. उसके बाद से उसे विशेष अदालत के समक्ष पेश कर न्यायिक हिरासत में रखा गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.