डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका इस साल अपनी आजादी के 250 साल पूरे कर रहा है। दुनिया की सबसे ताकतवर महाशक्ति के रूप में अपनी यात्रा शुरू करने वाले अमेरिका के बारे में अब सवाल उठ रहे हैं, क्या वह अभी भी दुनिया का नेतृत्व करने में सक्षम है और क्या वह यह जिम्मेदारी चाहता भी है?
अमेरिका की ताकत अभी भी बेमिसाल
अमेरिका की अर्थव्यवस्था करीब 32 ट्रिलियन डॉलर की है, जो चीन से बड़ी है। उसकी सेना सबसे आधुनिक है, डॉलर वैश्विक व्यापार का आधार बना हुआ है। टेक दुनिया में एल्फाबेट, अमेजन, एप्पल, माइक्रोसॉप्ट, नविडिए जैसी कंपनियां अमेरिकी दबदबे का प्रतीक हैं। एआई के क्षेत्र में अमेरिका अभी भी आगे है और एलन मस्क जैसे उद्यमी भविष्य की कल्पना (जिसमें अंतरिक्ष पर जीवन) कर रहे हैं।
लेकिन बढ़ रहे हैं संदेह
ट्रंप प्रशासन की नीतियों सहयोगी देशों पर भी भारी टैरिफ, नाटो पर सवाल, मजबूत तानाशाहों से रिश्ते ने पुराने सहयोगियों को चिंतित कर दिया है। इराक, अफगानिस्तान युद्ध, 2008 की आर्थिक मंदी, 6 जनवरी का कैपिटल हमला और हालिया घटनाक्रमों ने अमेरिकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है।
चीन का बढ़ता चुनौती
चीन अमेरिका के लिए सबसे गंभीर प्रतिद्वंद्वी है। आर्थिक, तकनीकी और औद्योगिक रूप से मजबूत चीन ने दिखाया है कि पूंजीवाद लोकतंत्र के बिना भी आगे बढ़ सकता है। हालांकि चीन की अपनी समस्याएं (जनसांख्यिकीय संकट, कर्ज, युवा बेरोजगारी) हैं, लेकिन उसने अमेरिका के एकछत्र वर्चस्व को चुनौती दी है।
भारत-अमेरिका संबंध: रणनीतिक जरूरत, कुछ खटास आई
भारत और अमेरिका के बीच रिश्ता पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुआ, न्यूक्लियर डील, रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी साझेदारी और चीन कारक ने इसे आगे बढ़ाया। लेकिन 2025 में ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ थोप दिया, जिससे भारतीय निर्यात पर 50 फीसदी का बोझ पड़ गया। H-1B वीजा नियमों में बदलाव भी मुख्य रूप से भारतीयों को निशाना बनाते दिखे।
ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को मृत बताया था और पाकिस्तान की सेना की तारीफ की, जिससे दिल्ली में नाराजगी बढ़ी। लेखक के अनुसार, दोनों देशों के बीच संबंध अब सुविधा का सहयोगी बन गया है, न कि मूल्यों पर आधारित गहरी दोस्ती।