इमेज स्रोत, Getty Images
पढ़ने का समय: 6 मिनट
मोदी सरकार आज संसद में डीलिमिटेशन बिल पेश करने जा रही है. इसको लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस की संभावना जताई जा रही है.
इस बिल में लोकसभा में सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है.
साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का भी प्रस्ताव है. हालांकि महिला आरक्षण का ये प्रस्ताव 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित हैं, जिसमें महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके लागू होने को भविष्य में होने वाली जनगणना और डीलिमिटेशन (परिसीमन प्रक्रिया) से जोड़ा गया था.
यानी प्रस्ताव के मुताबिक़ लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने के बाद महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएंगी.
और इसी को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर है. उसके मुख्य तौर पर दो आरोप हैं.
- सरकार डीलिमिटेशन प्रक्रिया के तहत उत्तर भारत और जिन राज्यों में वो मज़बूत है वहां सीटों की संख्या बढ़ाना चाहती है. इसके तहत उत्तर और दक्षिण भारतीय राज्यों में सीटों का फ़ासला बहुत बढ़ जाएगा जो भारतीय जनता पार्टी को फ़ायदा पहुंचाएगा. साथ ही इससे दक्षिण भारतीय राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व कमज़ोर होगा.
- सरकार महिला आरक्षण को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करके अपने राजनीतिक हित साधना चाहती है.
हालांकि भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों का खंडन कर रही है और कह रही है कि सभी राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व मिलेगा और महिलाओं को आरक्षण सुनिश्चित करके वो उनकी भागीदारी को बढ़ाना चाहती है.
राहुल गांधी बोले, ‘ये बीजेपी का ख़तरनाक खेल’
इमेज स्रोत, Getty Images
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट किया, “बीजेपी की ख़तरनाक योजनाओं में से एक यह है कि वह 2029 के चुनावों में अपने फ़ायदे के लिए सभी लोकसभा सीटों की सीमांकन प्रक्रिया अपने हिसाब से करना चाहती है.”
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित विधेयक सारी शक्ति डीलिमिटेशन कमीशन को सौंप देंगे जिसे सरकार ख़ुद नियुक्त और निर्देशित करेगी.
उन्होंने लिखा, “हमने देखा है कि बीजेपी यह कैसे करती है-असम और जम्मू-कश्मीर में सीमांकन प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ा गया. जिन क्षेत्रों और समुदायों में बीजेपी का समर्थन नहीं है उन्हें चुनावी फ़ायदे के लिए बांट दिया गया.”
राहुल गांधी ने आगे लिखा, “कुछ सीटों में 25 लाख मतदाता हैं, जबकि कुछ में केवल 8 लाख. कुछ सीटों में 12 विधानसभा क्षेत्र हैं, जबकि कुछ में सिर्फ 6, कुछ सीटों को इस तरह टुकड़ों में बांटा गया है कि उनका आपसी जुड़ाव ही नहीं है, कई बार नदियों या पहाड़ों के पार तक विभाजित किया गया है.”
उन्होंने कहा, “हम (मोदी सरकार को) ओबीसी, दलित और आदिवासियों से हिस्सा चोरी नहीं करने देंगे. सरकार जाति जनगणना के आंकड़ों की अनदेखी करना चाहती है. हम दक्षिणी, पूर्वोत्तर और छोटे राज्यों के साथ नाइंसाफ़ी को भी बर्दाश्त नहीं करेंगे.”
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार जो प्रस्ताव ला रही है, उसका महिला आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है. और ये संशोधन सीमांकन के ज़रिए सत्ता पर कब्ज़ा मजबूत करने की एक कोशिश है.
दक्षिण भारतीय राज्यों से भेदभाव का आरोप
इमेज स्रोत, ANI
16 से 18 अप्रैल तक संसद के विशेष सत्र में इस बिल पर चर्चा होगी. अगर ये विधेयक पारित हो जाता है तो 2029 के अगले आम चुनाव में महिला आरक्षण का रास्ता साफ़ हो सकता है.
विपक्षी दलों ने इसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश बताया और इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताया.
तमिलनाडु की 234 सीटों के लिए 23 अप्रैल को वोटिंग होगी.
एक चुनावी सभा में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके नेता एमके स्टालिन ने कहा, “पड़ोसी राज्यों के नेता भी राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर डीलिमिटेशन के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं.”
उन्होंने इस सभा में काला झंडा फहराकर डीलिमिटेशन के फ़ैसले का विरोध किया है.
उन्होंने कहा, “डीलिमिटेशन के ज़रिए एनडीए तमिलों पर हमला कर रही है. 23 अप्रैल के मतदान में हम उन्हें दिखा देंगे कि हम कौन हैं.”
उन्होंने कहा कि उनकी सरकार हमेशा महिलाओं के लिए समर्पित सरकार के रूप में काम करती रही है लेकिन केंद्र सरकार महिला आरक्षण के बहाने अपना राजनीतिक हित साध रही है.
इस विधेयक के उद्देश्यों के बारे में कहा गया है परिसीमन (डीलिमिटेशन) की प्रक्रिया ‘ताज़ा प्रकाशित जनगणना’ के आधार पर होगी. आख़िरी जनगणना 2011 में हुई थी. यानी इस विधेयक का आधार होगी 2011 में हुई जनगणना.
और यही वह बिंदु है जिस पर दक्षिणी राज्यों को अपने प्रतिनिधित्व में कमी होने की चिंता है.
अब तक हर राज्य को मिलने वाली संसदीय सीटों की संख्या इस आधार पर तय होती रही है कि किसी राज्य की आबादी और उसकी निर्वाचन सीटों का अनुपात सभी राज्यों में लगभग बराबर रहे.
यानी पूरे भारत में हर एक सीट लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करेगी.
दशकों तक भारत में जनसंख्या वृद्धि असमान रही है, जिसमें दक्षिणी राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है. अध्ययनों से पता चलता है कि अगर मौजूदा परिस्थितियों में आबादी के अनुपात में सीटें तय करने का यही मानदंड लागू किया गया, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कमज़ोर हो जाएगा.
केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने एक्स पर लिखा, “डिलिमिटेशन बिल, 2026 का मसौदा, जो अब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, यह संकेत देता है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार राज्यों की मौजूदा आनुपातिक हिस्सेदारी और लोकसभा में उनके प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखे बिना सीमांकन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक दिख रही है.”
उन्होंने लिखा, “ऐसी प्रक्रिया बेहद अन्यायपूर्ण होगी, क्योंकि इससे केरल समेत उन राज्यों को ही नुकसान उठाना पड़ेगा जिन्होंने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 1976 को ईमानदारी और गंभीरता से लागू करने के लिए प्रयास किए. दूसरी ओर, जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को लागू करने में सुस्ती दिखाई, उन्हें उनकी इनाम मिलता हुआ दिखाई देगा.”
केरल में 9 अप्रैल को 140 सीटों के लिए वोट डाले गए.
कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने कहा, “उत्तर प्रदेश में अभी 80 लोकसभा सीटें हैं और तमिलनाडु में 39. डीलिमिटेशन के बाद उत्तर प्रदेश में 120 सीटें हो जाएंगी और तमिलनाडु में 59. यानी पहले दोनों प्रदेशों के बीच सीटों का अंतर 41 था और अब वो 61 हो जाएगा. अगर हर प्रदेश में ये आंकड़ा रखोगे तो उत्तर भारत में सीटों की संख्या काफ़ी बढ़ जाएगी. इन्हें राजनीतिक फ़ायदा होगा.”
सरकार और बीजेपी का पक्ष
इमेज स्रोत, Getty Images
वहीं केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि डीलिमिटेशन बिल को लेकर तमिलनाडु और विपक्ष के आरोप सही नहीं हैं.
उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, “तमिलनाडु की सीटें तो बढ़ने वाली हैं. दक्षिण भारत के साथ बिलकुल अन्याय नहीं होगा. अगर स्टालिन की कुछ चिंताएं हैं तो वो पीएम को ख़त लिख सकते हैं और उनकी पार्टी के सांसद संसद में अपनी बात रख सकते हैं. अपने सुझाव दे सकते हैं.”
बीजेपी के प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के इस आरोप पर कि सरकार इस बिल को लेकर जल्दबाज़ी में है, कहा, “हम जल्दी में हैं क्योंकि महिलाएं 30 साल से इंतजार कर रही हैं… क्या आपको जल्दी नहीं है, सोनिया जी? आपके पास मौका था… 2010 में राज्यसभा में बिल पास होने के बाद इसे आरजेडी को साधने के लिए कभी लोकसभा में नहीं लाया गया. अब 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद के विशेष सत्र के जरिए महिलाओं को उनका अधिकार मिलने जा रहा है. 30 साल बाद यह लागू हो रहा है, और हम चाहते हैं कि इसे 2029 की लोकसभा से लागू किया जाए, ताकि महिलाओं को सशक्तिकरण और समावेशन का अधिकार मिल सके.”
वहीं तेलंगाना बीजेपी नेता प्रकाश रेड्डी ने कहा, ” इंडिया गठबंधन ने आखिरकार कहा है कि वह महिला आरक्षण बिल का समर्थन करेगा, लेकिन डिलिमिटेशन बिल का समर्थन नहीं करेगा. डिलिमिटेशन बिल का विरोध करने का कोई मतलब नहीं है. आपने भी अपने हित और राजनीतिक फायदे के अनुसार सीमांकन किया था. लोग आपकी हर गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.