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सऊदी अरब के आंतरिक मामलों के मंत्रालय ने कहा है कि पवित्र शहर मक्का में अश्लीलता के आरोप में गिरफ़्तार एक बांग्लादेशी पुरुष और महिला को मौत की सज़ा दे दी गई है.
सऊदी अरब की सरकारी समाचार एजेंसी ‘सऊदी प्रेस एजेंसी’ (एसपीए) ने आंतरिक मामलों के मंत्रालय के हवाले से बताया कि नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख़्तर ने मक्का की एक मस्जिद में ‘अश्लील कृत्य’ किया था.
एक सऊदी अधिकारी के मुताबिक़, सुरक्षा अधिकारियों ने दोनों को गिरफ़्तार किया और संबंधित अदालत के सामने पेश किया.
मंत्रालय ने बताया कि अदालत ने नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख़्तर के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाया और उन पर लगाए गए आरोप साबित हो गए.
जेद्दा स्थित बांग्लादेश के वाणिज्यिक दूतावास ने कहा कि उन्हें फांसी दिए जाने से पहले इसकी सूचना नहीं दी गई थी. दूतावास ने सऊदी अधिकारियों से इस मामले की औपचारिक पुष्टि भी मांगी है.
दूतावास के एक अधिकारी ने कल द डेली स्टार को बताया, “मंत्रालय ने दूतावास को पहले से इसकी सूचना नहीं दी थी.”
अधिकारी ने कहा, “इस संबंध में हमने सऊदी विदेश मंत्रालय को एक औपचारिक राजनयिक पत्र भेजा है और मामले की औपचारिक पुष्टि करने का अनुरोध किया है.”
मंत्रालय के मुताबिक़, अदालत ने मामले की गंभीरता, मस्जिद की पवित्रता के ख़िलाफ़ किए गए कृत्य और उससे जुड़ी परिस्थितियों को देखते हुए यह सज़ा सुनाई. इस मामले में सऊदी अधिकारियों ने ‘ताज़ीर’ के तहत मृत्युदंड दिया.
बीबीसी उर्दू के मुताबिक़ मंत्रालय ने बताया कि निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में अपील भी की गई थी. हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसले को बरकरार रखते हुए मौत की सज़ा कायम रखी.
इस फैसले पर आगे की कार्रवाई करते हुए शाही आदेश भी जारी कर दिया गया. शाही आदेश पर अमल करते हुए 14 अक्टूबर को दोनों को मौत की सजा दे दी गई.
हालांकि, सऊदी अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि कथित अश्लील कृत्य में वास्तव में क्या हुआ था.
उन्होंने यह भी नहीं बताया कि यह घटना कब हुई थी और अदालत के मृत्युदंड के फैसले के ख़िलाफ़ अपील कब की गई थी.
सऊदी अरब के स्थानीय अख़बारों ने भी इस मामले पर विस्तार से कुछ प्रकाशित नहीं किया है.
उन्होंने आंतरिक मामलों के मंत्रालय की ओर से जारी बयानों को ही जगह दी है.
ताज़ीर क्या है और सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था में इसके तहत सज़ा कैसे सुनाई जाती है?
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सऊदी अरब के आंतरिक मामलों के मंत्रालय के बयान के अनुसार, मौत की यह सज़ा ताज़ीर के तहत दी गई है.
हालांकि, सऊदी अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी विशिष्ट क़ानूनी प्रावधान का उल्लेख नहीं किया है, जिसके तहत यह सजा सुनाई गई.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, सऊदी अरब की अदालतें शरिया क़ानून के सिद्धांतों और न्यायाधीशों के विवेकाधिकार के आधार पर फ़ैसले सुनाती हैं.
शरिया कानून इस्लाम के धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें कुरान और सुन्नत की महत्वपूर्ण भूमिका है.
ताज़ीर से तात्पर्य उस विचाराधीन दंड से है, जो किसी जज की ओर से उन अपराधों के लिए दिया जाता है, जिनके लिए इस्लामी कानून में कोई निश्चित सज़ा निर्धारित नहीं है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, ‘ताज़ीर’ कोई एक क़ानून नहीं, बल्कि इस्लामी क़ानून में दंड की एक श्रेणी है.
यह न्यायाधीशों को ऐसे आचरण के लिए सज़ा तय करने का अधिकार देती है, जो निर्धारित दंड या प्रतिशोधात्मक न्याय की श्रेणियों में नहीं आते.
इस संबंध में सऊदी न्यायाधीशों को अपराध की प्रकृति तय करने और सज़ा निर्धारित करने, दोनों ही मामलों में काफ़ी विवेकाधिकार प्राप्त है.
कुछ मामलों में ‘ताज़ीर’ के तहत औपचारिक चेतावनी या जुर्माने से लेकर कारावास तक की सज़ा दी जा सकती है. वहीं, कुछ विशेष परिस्थितियों में मृत्युदंड भी दिया जा सकता है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, सऊदी अरब में परंपरागत रूप से कोई व्यापक लिखित दंड संहिता नहीं रही है.
वहां की न्याय व्यवस्था काफ़ी हद तक शरिया के सिद्धांतों और जजों के विवेक पर निर्भर रही है.
एमनेस्टी के आँकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2026 तक, यानी इस साल के शुरुआती नौ महीनों में, सऊदी अरब में 175 से अधिक लोगों को मौत की सज़ा दी जा चुकी थी.
सऊदी अरब दुनिया में सबसे अधिक मृत्युदंड देने वाले देशों में शामिल है.
इस साल मृत्युदंड पाने वालों में ज़्यादातर विदेशी नागरिक थे. वर्ष 2026 के दौरान 20 से अधिक देशों के कम से कम 94 विदेशी नागरिकों को सऊदी अरब में मौत की सज़ा दी गई.
हाल के वर्षों में सऊदी अरब की अदालतों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के मामलों में कई दशकों तक की जेल की सज़ा सुनाई है. हालांकि, अपील के दौरान इन सज़ाओं में बड़े बदलाव भी देखने को मिले हैं.
सऊदी अरब में परंपरागत रूप से कोई व्यापक लिखित दंड संहिता नहीं रही है.
एमनेस्टी के अनुसार, कई अपराधों और उनके लिए निर्धारित सजाओं का कानून में स्पष्ट उल्लेख नहीं है. ऐसे मामलों में जज शरिया की अपनी व्याख्या के आधार पर फ़ैसला करते हैं.
हालांकि, सऊदी अरब में लिखित क़ानून भी मौजूद हैं, लेकिन अधिकारी अक्सर आतंकवाद-रोधी कानून और साइबर अपराध कानून के अस्पष्ट और व्यापक प्रावधानों का इस्तेमाल करते हैं.
इनमें ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘धार्मिक मूल्यों’ और ‘सार्वजनिक नैतिकता’ को प्रभावित करने से संबंधित प्रावधान शामिल हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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