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सरकारी रिपोर्ट दिखा रही स्कूली शिक्षा की कड़वी सच्चाई, सड़कों पर उतरने को मजबूर ‘जेन अल्फा’

Byadmin

Aug 22, 2026


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देशभर में स्कूली बच्चों (जेन अल्फा) द्वारा अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर किए जा रहे विरोध-प्रदर्शन अब केवल स्थानीय मुद्दे नहीं रह गए हैं।

हाल ही में यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (USISE+) रिपोर्ट के आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि छात्र जिन कमियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, वे देश के शिक्षा तंत्र में व्यापक स्तर पर मौजूद हैं।

सड़कों पर उतरे छात्र

जेन जी के बाद जेन अल्फ भी शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्रों के प्रदर्शन की तस्वीरें सामने आईं हैं।

हमीरपुर (उत्तर प्रदेश): लगभग 300 बच्चों ने अपने स्कूल तक एक पक्की सड़क की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट ऑफिस तक 6 किलोमीटर का पैदल मार्च निकाला।

लखनऊ: 250 छात्राओं ने शिक्षकों की भारी किल्लत और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में प्रदर्शन किया।

जयपुर: दिव्यांग छात्रों ने सफाई, क्लासरूम की जर्जर स्थिति और दिव्यांग-अनुकूल (CWSN) शौचालयों की मांग उठाई।

आंकड़ों में झलकता असंतुलन

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल 14,66,682 स्कूलों में से 68.4 प्रतिशत राज्य सरकारों द्वारा चलाए जाते हैं। UDISE+ रिपोर्ट देश के शिक्षा तंत्र की कई चिंताजनक परतें खोलती है।

देश के 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और इन स्कूलों में 29 लाख से अधिक बच्चे नामांकित हैं, जबकि अकेले कर्नाटक में ऐसे 8,042 स्कूल हैं।

इसके विपरीत, देश के 5,663 स्कूलों में एक भी छात्र का दाखिला नहीं है, लेकिन वहां 20,667 शिक्षक तैनात हैं।

डिजिटल और भौतिक असमानता

जिटल और भौतिक असमानता की बात करें तो देश के केवल 67.4 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट और 63.1 प्रतिशत में चालू कंप्यूटर हैं, सिर्फ 7.1 प्रतिशत स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी है, और तमिलनाडु में 99 प्रतिशत इंटरनेट कवरेज होने के बावजूद सरकारी स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी महज 0.8 प्रतिशत है।

इसके अलावा, दिव्यांग छात्रों के लिए चुनौतियां बनी हुई हैं क्योंकि केवल 40.1 प्रतिशत स्कूलों में दिव्यांग-अनुकूल (CWSN) टॉयलेट हैं, हालांकि 79.7 प्रतिशत स्कूलों में रैंप उपलब्ध हैं।

सरकारी बनाम प्राइवेट स्कूल

आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट, 79.2 प्रतिशत बनाम 63.1 प्रतिशत, और चालू कंप्यूटरों की उपलब्धता में प्राइवेट बिना-सहायता प्राप्त स्कूल आगे हैं।

इसके विपरीत, भौतिक पहुंच यानी रैंप, 88.2 प्रतिशत बनाम 60.4%, और हैंडरेल सुविधाओं के मामले में सरकारी स्कूल बेहतर स्थिति में हैं।

वहीं, लड़कियों के लिए चालू शौचालय की उपलब्धता दोनों क्षेत्रों में 95 प्रतिशत से अधिक है।

छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) भले ही राष्ट्रीय स्तर पर 24 हो, लेकिन राज्यों के बीच भारी अंतर है। जहां झारखंड में प्रति शिक्षक 36 छात्र हैं, वहीं पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 19.7 है। छात्रों का यह गुस्सा सीधे तौर पर शिक्षा प्रणाली की इन गहरी विषमताओं की ओर इशारा करता है।

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