डिजिटल डेस्क, कैनबरा। ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी प्रांत (नॉर्दर्न टेरिटरी) में 1 जुलाई 1996 को राइट्स ऑफ द टर्मिनली इल एक्ट लागू हुआ। इसके साथ ही दुनिया में पहली बार किसी सरकार ने असाध्य बीमारी से जूझ रहे मरीजों को कानूनी रूप से अपनी जिंदगी समाप्त करने का अधिकार दिया।
यह कानून 1995 में पारित हुआ था, लेकिन इसे लागू करने से पहले कई सुरक्षा शर्तें जोड़ी गईं। मरीज को यह साबित करना होता था कि वह अंतिम अवस्था की बीमारी से पीड़ित है, उसका निर्णय स्वैच्छिक है और उसकी मानसिक स्थिति सामान्य है। इसके लिए कई डॉक्टरों और विशेषज्ञों की मंजूरी आवश्यक थी।
कानून लागू होने के बाद दुनिया में हुई तीखी बहस
कानून लागू होते ही ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया भर में तीखी बहस शुरू हो गई। समर्थकों ने इसे व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता का अधिकार बताया, जबकि विरोधियों ने इसे चिकित्सा नैतिकता और मानव जीवन के मूल्यों के खिलाफ बताया। ऑस्ट्रेलियन मेडिकल एसोसिएशन सहित कई संगठनों ने इसका विरोध किया।
कैंसर पीड़ित बॉब बने दुनिया के पहले व्यक्ति
कानून लागू होने के तीन महीने बाद 22 सितंबर 1996 को 66 वर्षीय बॉब डेंट ने इसका उपयोग किया। प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित डेंट डॉक्टर फिलिप निट्स्के की सहायता से कानूनी इच्छामृत्यु पाने वाले दुनिया के पहले व्यक्ति बने। इस कानून की मदद से केवल चार लोगों ने अपना जीवन समाप्त किया।