डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) विधेयक पारित होने के दौरान कथित तौर पर सरकार के खिलाफ मानी जाने वाली सामग्री इंटरनेट मीडिया पर साझा करने के आरोप में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने अपने एक डीआईजी को निलंबित कर दिया है।
इस विधेयक को इन बलों के कैडर अधिकारियों ने भेदभावपूर्ण बताया था। लगभग 10 लाख कर्मियों वाले केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल रहे लगभग 15 हजार कैडर अधिकारियों के बीच यह अपनी तरह का पहला मामला है।
अधिकारियों ने बताया कि कार्रवाई का सामना करने वाले बीसी पात्रा त्रिपुरा सेक्टर के मुख्यालय अगरतला में डीआईजी के तौर पर तैनात थे। वह 1994 बैच के सीआरपीएफ कैडर अधिकारी हैं। उन पर लगाए गए आरोपों में इंटरनेट मीडिया पर ऐसी सामग्री साझा करना शामिल है, जिनमें कथित तौर पर ‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026’ पारित होने के दौरान देश की कानूनी रूप से चुनी गई सरकार को बदलने की बात कही गई थी।
इस विधेयक के जरिये सीएपीएफ के वरिष्ठ पदों पर आइपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति और सेवा शर्तों को विनियमित किया गया है। दूसरी तरफ सीएपीएफ के अधिकारियों का कहना था कि विधेयक के प्रविधान दमनकारी और भेदभावपूर्ण हैं। अगर आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को कम नहीं किया गया, तो वे अपने मौजूदा पद पर ही अटके रहेंगे। अप्रैल में राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह विधेयक अब कानून बन गया है।
सीआरपीएफ के महानिदेशक जीपी सिंह ने कहा कि सशस्त्र बल के सभी अधिकारी नियमों और कानूनों से बंधे हुए हैं। कोई भी शब्द या इसका उल्लंघन करने वाली किसी हरकत से देश के कानून के अनुसार निपटा जाएगा। हालांकि, मामले से अवगत अधिकारियों ने कहा कि डीआईजी के खिलाफ की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण और अनुचित थी।
पात्रा को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि वह सीएपीएफ कैडर के उन अधिकारियों में मुख्य याचिकाकर्ता थे, जिन्होंने पदोन्नति और आईपीएस के साथ सेवा समानता से जुड़े मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी थी। नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने दावा किया कि अदालतों में सक्रिय रूप से लड़ाई लड़ने वाले बल के लगभग दो दर्जन अन्य अधिकारियों का भी हाल ही में जल्दबाजी में तबादला कर दिया गया है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)