जेएनएन, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कोरबा जिले के दीपका स्थित लाइफकेयर अस्पताल से संबंधित 15 साल पुराने अवैध गर्भपात मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
हाई कोर्ट ने अपर सत्र न्यायालय (कटघोरा) के आदेश को आंशिक रूप से बदलते हुए तीन डाक्टरों को मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेग्नेंसी अधिनियम, 1971 (एमटीपी) के अंतर्गत दोषी ठहराया है।
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने यह निर्णय दिया। हालांकि, लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम-1994 के तहत डाक्टरों को बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा गया है। सजा पर सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
दोषी ठहराए गये लोगों में डा. राजेंद्र प्रसाद रविदास, डा. मिथिलेश प्रसाद और उनकी पत्नी डा. रेणु श्रीवास्तव शामिल हैं। मामला अगस्त 2011 का है।
उस समय कोरबा जिले के तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और कटघोरा के उप मंडल अधिकारी (एसडीएम) की प्रशासनिक टीम ने लाइफकेयर अस्पताल में छापा मारा था।
जांच टीम ने अस्पताल परिसर से अलग-अलग बोतलों में रखे 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण बरामद किए थे।
छापेमारी में अस्पताल से कुछ एक्सपायर्ड औषधियां और गर्भपात में प्रयोग किए जाने वाले उपकरण भी जब्त किए गए थे। कोर्ट ने पाया कि आरोपित यह साबित नहीं कर पाए कि भ्रूण किसी महिला का गर्भपात उसकी जान बचाने के लिए किया गया था।