• Tue. Oct 27th, 2026

24×7 Live News

Apdin News

11 हजार का इंजेक्शन 1.30 लाख में क्यों? कैंसर की दवाओं पर भारी मुनाफे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को लगाई फटकार

Byadmin

Oct 27, 2026


जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। कैंसर की दवाओं की एमआरपी और रिटेलर प्राइस में भारी अंतर पर मंगलवार को फिर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सवालों में घेरा। शीर्ष अदालत ने सवाल किया कि दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और खुदरा विक्रेताओं को मिलने वाली कीमत के बीच भारी अंतर होने के बावजूद पूरा तंत्र दवा निर्माताओं की मदद करने में क्यों जुटा है।

कीमतों में भारी अंतर पर कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि बताओ ये कैसे तर्कसंगत है। आम नागरिक और गरीब मरीजों की बात उठाते हुए कहा कि ये लोगों के जीवन से जुड़ा मुद्दा है, ये कामर्स नहीं है।

हालांकि केंद्र सरकार ने दलील दी कि वह लगातार प्रयास कर रही है और दवाओं की कीमतों की निगरानी की जाती है, लेकिन कोर्ट इन तर्कों से प्रभावित नहीं दिखा। मामले में सभी पक्षों ने मंगलवार को दलीलें पूरी कर लीं और और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ व संदीप मेहता की पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

उम्मीद है कि कोर्ट का जो भी फैसला आएगा उसमें दवाओं की कीमतों के निर्धारण को लेकर स्पष्ट नीति या व्यवस्था की बात होगी। हालांकि फिलहाल कोर्ट ने फैसला सुनाने की कोई तिथि तय नहीं की है।

सुनवाई के दौरान दामों में भारी अंतर पर शुरू से ही पीठ ने केंद्र सरकार को घेरना शुरू कर दिया। जब केंद्र की ओर से पेश एएसजी ऐश्वर्या भाटी केंद्र के हलफनामे का जिक्र करते हुए दवाओं के मूल्य निर्धारण के संबंध में तय नीति का ब्योरा दे रही थीं तभी जस्टिस विक्रम नाथ ने सवाल किया कि आप यह कैसे तय करते हैं कि ये आवश्यक दवा है या नहीं।

आवश्यक वस्तु अधिनियम में तो सभी दवाएं आवश्यक हैं। भाटी ने कहा कि आवश्यक होना न होना डीपीसीओ तय करता है। जस्टिस मेहता ने कहा कि यहीं खेल है। एक ही साल्ट में एक आवश्यक है और एक आवश्यक नहीं। ये एक छुपा एजेंडा है। उन्होंने कहा कि जब कोर्ट ने सवाल किये तब सरकार जागी है।

जस्टिस मेहता ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि मामला अभी एक महीने पहले का ही है। एक दवा डीलर की पत्नी का इलाज हो रहा था। कीमों में काम आने वाला इंजेक्शन 11000 रुपये का था। डीलर ने अस्पताल से आग्रह किया लेकिन अस्पताल ने बाहर से लेने को मना कर दिया और उस इंजेक्शन की कीमत 1,30000 (एक लाख तीस हजार) रुपये वसूली। जस्टिस मेहता ने पूछा कि इसे आप कैसे तर्कसंगत ठहराओगे। कौन एमआरपी तय करता है। ये लूट है।

कोर्ट ने कहा कि हम सिर्फ गरीब उपभोक्ता मरीज की तरफ से सोच रहे हैं। हम 100 उदाहरण दे सकते हैं। या तो आप इससे अवगत नहीं हैं या ध्यान नहीं दे रहे। कोर्ट ने सवाल किया कि आप फिर किस लिए निगरानी करते हैं। भाटी ने हलफनामे में बताए गए उद्देश्य की ओर कोर्ट का ध्यान खींचना चाहा। तभी जस्टिस मेहता पूछा कि आप पांच मालीक्यूल बताएं जो पिछले 30 साल में भारतीय फार्मा इंडस्ट्री ने इनवेन्ट किये हों।

भाटी ने कहा कि मै ये तो नहीं जानती लेकिन सरकार की नीति होती है कि इस सेक्टर में भी निवेश हो। कंपटीशन बना रहे। पीठ का सवाल था कि 400 गुना ज्यादा कीमत में कंपटीशन कैसा। दवा कंपनी रिटेलर को जो दाम पर दे रही है उसे वही मिल रहा है फिर दवा कंपनी को इसमें क्या लाभ। ये पैसा कहां जाता है। मुनाफा किसको मिलता है।

भाटी ने भारत में दवाएं विश्व में सबसे सस्ती हैं कि बात जब कई बार दोहराई तो जस्टिस मेहता ने कहा कि हमें यह मत बताओ, ये भी देखिये कि भारत में प्रति व्यक्ति आय कितनी है और भी चीजें हैं। हमें टिप्पणी करने पर मजबूर न करो। पीठ ने कहा इन लोगों (दवा निर्माताओं) की मदद करने में पूरा तंत्र क्यों लगा हुआ है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) पूरी तरह निष्कृय संस्था प्रतीत होता है।

कोर्ट ने कहा अस्पताल बाहर से दवाएं नहीं लेने देते। मरीज मजबूरी में मंहगी दवाएं लेता है। याचिकाकर्ता वकील केसी जैन ने कहा कि यहां सवाल शिड्यूल दवाओं का नहीं है जिसके दाम नियंत्रित किये जाते हैं यहां सवाल नान शिड्यूल दवाओं का है। 83 प्रतिशत दवाएं नान शिड्यूल हैं जिनकी कीमत नियंत्रित नहीं होती।

कोर्ट ने कहा कि मार्जिन 15-16 प्रतिशत होना चाहिए। भाटी ने कहा कि दवा उद्योग के ग्रोथ को भी ध्यान में रखा जाता है। पूरी तरह मूल्य कैसे नियंत्रित किये जा सकते हैं। जस्टिस मेहता ने कहा कि नमक जैसा। जस्टिस मेहता ने उदाहरण दिया कि ड्रिप लाइन खुदरा विक्रेता को 15 रुपये में मिलती है और उसका एमआरपी 250 रुपये है।

अस्पतालों की ओर से पेश मुकुल रोहतगी ने 30 प्रतिशत मार्जिन को सही बताते हुए कहा कि अगर मार्जिन इससे कम किया जाएगा तो अस्पताल बैठ जाएगे। उन्होंने अस्पताल में 24 घंटे सेवाएं, सुविधाएं और बुनियादी ढांचा बनाने की लागत का उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि हम अस्पताल की बात नहीं कर रहे यहां दवा की कीमत की बात हो रही है। अगर कोई बाहर दुकान से दवा लेता है तो उसे क्यों मंहगी मिलनी चाहिए। कोर्ट दवाओं का मुद्दा उठाने वाली किशन चंद्र जैन और डाक्टर संजय कुलश्रेष्ठ की दो याचिकाओँ पर सुनवाई कर रहा था।

By admin