आइए समझते हैं कि डिलिमिटेशन क्या है, केंद्र क्या करना चाहता है, विपक्ष क्यों विरोध कर रहा है और इसमें आगे क्या हो सकता है।
क्या है डिलिमिटेशन?
डिलिमिटेशन का मतलब है लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं और संख्या का पुनर्निर्धारण। यह प्रक्रिया आमतौर पर जनगणना के आंकड़ों के आधार पर की जाती है, ताकि आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
फिलहाल क्यों रुकी हुई है प्रक्रिया?
1976 में संविधान संशोधन के जरिए डिलिमिटेशन को 2001 तक के लिए रोक दिया गया था, ताकि राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
इसके बाद 2001 की जनगणना के आधार पर सीमाओं में बदलाव हुआ, लेकिन सीटों की कुल संख्या स्थिर रखी गई। फिर 84वें संविधान संशोधन (2001) के तहत इस रोक को 2026 तक बढ़ा दिया गया।
केंद्र की योजना क्या है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार 2026 के बाद डिलिमिटेशन प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी में है, जो अगली जनगणना के आंकड़ों पर आधारित होगी। इसका उद्देश्य तेजी से बढ़ती आबादी वाले राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व देना बताया जा रहा है।
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?
दक्षिण भारत और कुछ अन्य राज्यों के राजनीतिक दलों को डर है कि डिलिमिटेशन से उनकी लोकसभा सीटों की संख्या घट सकती है, जबकि उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों को फायदा हो सकता है।
विपक्ष का तर्क है कि इससे क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ेगा और जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे हैं, उन्हें सजा मिलेगी।
अब आगे क्या होगा?
- डिलिमिटेशन की प्रक्रिया संविधान और संसद की मंजूरी के तहत ही आगे बढ़ेगी।
- इसके लिए डिलिमिटेशन आयोग का गठन किया जाएगा।
- राजनीतिक सहमति बनाना इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
क्यों अहम है यह मुद्दा?
डिलिमिटेशन का सीधा असर लोकसभा की सीटों और देश की राजनीतिक ताकत के संतुलन पर पड़ता है। यही वजह है कि यह मुद्दा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि गहराई से राजनीतिक भी है।