इमेज कैप्शन, अमेरिका का दावा है कि होर्मुज़ स्ट्रेट में नाकाबंदी के लिए उसके पास पर्याप्त नौसैनिक ताक़त मौजूद है (सांकेतिक तस्वीर)….में
शुक्रवार को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने एक्स पर एक पोस्ट में जानकारी दी थी कि युद्धविराम की बाकी बची अवधि के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट को पूरी तरह खोल दिया गया है.
लेकिन ईरान के इस एलान के कुछ ही घंटों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि होर्मुज़ में ‘अमेरिकी नाकाबंदी’ जारी रहेगी.
हालांकि, ईरान ने पहले कहा था कि अगर अमेरिका उसके बंदरगाहों की नाकाबंदी जारी रखता है, तो वह होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर देगा.
शनिवार को ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक़ देश की सेना का कहना है कि वह होर्मुज़ स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण फिर से शुरू कर रही है. बीबीसी के मुताबिक, ‘अमेरिकी नाकाबंदी’ के जवाब में रविवार को भी ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद किए रखा था.
हालांकि, इससे पहले ईरान के होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने के बाद अमेरिका के पास जवाबी कार्रवाई के कई विकल्प थे.
पहला रास्ता बातचीत और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालना था. लेकिन उसे जल्द ही छोड़ दिया गया क्योंकि शुरुआती बातचीत विफल हो गई थी.
दूसरा विकल्प था कठोर कार्रवाई करना. मतलब ईरान के ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर को नष्ट करना. इससे ज़ाहिर तौर पर तनाव काफ़ी बढ़ जाता और सुलह की कोई भी संभावना ख़त्म हो जाती.
तीसरा विकल्प था युद्ध से पहले वाली स्थिति को बहाल करने का विकल्प. मतलब होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने की कोशिश करना. लेकिन ये रास्ता भी आसान नहीं था.
इसके लिए न केवल समुद्री मार्ग से बारूदी सुरंगों को हटाना ज़रूरी था, बल्कि जहाज़ों को मिसाइल हमलों और छोटी नावों के हमलों से बचाना भी ज़रूरी था.
ट्रंप ने चुना चौथा विकल्प
इमेज स्रोत, Getty Images
इमेज कैप्शन, ईरान का होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद रखने का फ़ैसला उसके लिए जोखिम भी लेकर आता है
लेकिन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चौथा विकल्प चुना.
होर्मुज़ स्ट्रेट में नौसैनिक अभियान चलाने के लिए नेटो सहयोगियों को अमेरिका साथ नहीं ला पाया. इसके अलावा अमेरिका होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने की वजह से प्रभावित हुए एशियाई देशों के साथ गठबंधन बनाने में भी सफल नहीं हो पाया.
नतीजा ये हुआ कि अमेरिका को अकेले ही कार्रवाई करनी पड़ी और उसकी क्षमताएं और संसाधन उतने व्यापक साबित नहीं हुए जितने प्रतीत होते थे.
ईरान के ख़िलाफ़ अभियान की शुरुआत में अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपेक्षाकृत बड़ी नौसैनिक शक्ति का गठन किया. अमेरिका के पास पहले से ही वहां विध्वंसक जहाज़, गश्ती जहाज़ और अन्य नौसैनिक एसेट्स मौजूद थे.
इसके अलावा दर्जनों विमानों और हेलीकॉप्टरों को ले जाने वाले दो विमानवाहक पोत भी शामिल किए गए.
हालांकि, इन सभी नौसैनिक एसेट्स का केवल एक सीमित हिस्सा ही होर्मुज़ स्ट्रेट में प्रभावी ढंग से संचालन करने में सक्षम है.
ट्रंप का अपनाया गया चौथा विकल्प पहली नज़र में तर्कसंगत लगता है. अगर ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद रखता है, तो उसे इसकी क़ीमत चुकानी होगी.
इस बात में अभी भी कुछ गुंजाइश दिखती है. लेकिन साथ ही ईरान का भविष्य अंधकारमय और अनिश्चित दिखाई देता है.
तकनीकी रूप से, यह विकल्प संभव है. ओमान की खाड़ी और अरब सागर में ईरान के “गुप्त बेड़े” (शैडो फ़्लीट्स) से जुड़े जहाज़ों को रोकना, जो ईरान के तट से काफ़ी दूरी पर स्थित हैं, अमेरिकी युद्धपोतों के लिए जोखिम को कम कर सकता है.
फ़िलहाल, इस प्रकार की नाकाबंदी के लिए पर्याप्त नौसैनिक ताक़त मौजूद है.
मध्य पूर्व की सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार अमेरिका की पांचवीं फ्लीट का ढांचा लचीला है. मिशन की ज़रूरत के मुताबिक़, इसे तुरंत बदला जा सकता है.
डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ‘क्षेत्र में अतिरिक्त बल भी भेजे जा रहे हैं.’
सिर्फ़ ईरान का नुक़सान नहीं
इमेज स्रोत, Reuters
इमेज कैप्शन, विमानवाहक पोत अब्राहम लिंकन के साथ चल रहे युद्धपोतों में से एक, गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर फ्रैंक पैटर्सन को अरब सागर में, ईरान के तट से सैकड़ों किलोमीटर दूर तैनात किया गया है
इसराइली सैन्य विशेषज्ञ डेविड जेंडेलमैन लिखते हैं, “जब पाठकों ने पूछा कि क्या अमेरिका सैन्य बल के दम पर होर्मुज़ स्ट्रेट को खोल सकता है, तो मैंने हमेशा यही जवाब दिया कि ईरान के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करना दूसरों के लिए इसे खोलना से कहीं अधिक आसान है. अमेरिकियों ने अब इस समीकरण को समझ लिया है.”
हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के इस फ़ैसले से सिर्फ़ ईरान को ही नुक़सान नहीं होगा.
अमेरिकी सैन्य अभियानों की शुरुआत के बाद से जहाज़ों के लिए बेहद ख़तरनाक हो चुके होर्मुज़ स्ट्रेट को खोलने में अमेरिका कोई जल्दी नहीं दिखा रहा है.
अमेरिका केवल नाकाबंदी को और कड़ा कर रहा है.
ईरानी बारूदी सुरंगों और मिसाइलों से भरे समुद्री मार्ग के कारण होर्मुज़ स्ट्रेट पहले से ही ख़तरनाक है.
होर्मुज़ स्ट्रेट के मुहाने या एग्जिट गेट पर किसी अमेरिकी डेस्ट्रॉयर का सामना होने से ख़तरा दोगुना हो जाता है.
खाड़ी देशों के व्यापारिक साझेदारों को सीधे तौर पर आर्थिक नुक़सान हुआ है. सप्लाई चेन बाधित हुई हैं और वैश्विक तेल की क़ीमतें एक बार फिर बढ़ गई हैं.
अभी यह साफ़ नहीं है कि चीन, जिसके पास एक विशाल नेवी और जिबूती में एक सैन्य अड्डा है, इस नाकाबंदी पर कैसे प्रतिक्रिया देगा.
इस बीच, अमेरिका के सहयोगियों के लिए आशावादी होने का कोई ख़ास कारण नहीं है. उनमें से कई तो जंग में शामिल हुए बिना ही इसके नतीजे भुगत रहे हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित.