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अदालतों को उत्तर कुंजी को सही मानना चाहिए, दखल तभी दें जब गलती साफ और स्पष्ट हो; सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

Byadmin

Sep 16, 2026


माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने प्रतियोगी परीक्षाओं की उत्तर कुंजी (आंसर की) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अदालतें परीक्षा संस्थाओं द्वारा तय उत्तरों में तभी हस्तक्षेप कर सकती हैं जब गलती इतनी स्पष्ट और प्रत्यक्ष हो कि उसे साबित करने के लिए किसी अनुमान या तर्क की जरूरत न पड़े।

महज किसी दूसरे विकल्प के भी सही होने की संभावना या प्रश्न की वैकल्पिक व्याख्या के आधार पर उत्तर कुंजी नहीं बदली जा सकती। यह फैसला जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की अपील स्वीकार करते हुए दिया।

शीर्ष न्यायालय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूपीएसएसएससी) द्वारा आयोजित ग्राम विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में एक उम्मीदवार को विवादित प्रश्न के लिए एक अतिरिक्त अंक देने और नियुक्ति की दिशा में कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।

मामला 2016 में ग्राम विकास अधिकारी के 3133 पदों के लिए हुई भर्ती परीक्षा से जुड़ा था। विवाद एक सामान्य ज्ञान के प्रश्न को लेकर था। प्रश्न था कि निम्न में कौन सा युग्म गलत है। विकल्पों में बाबरनामा-बाबर, शाहजहांनामा- मोहम्मद ताहिर, हुमायूंनामा- हुमायूं और तुजुक-ए-जहांगीरी-जहांगीर दिए गए थे।

आयोग ने विकल्प बी यानी शाहजहांनामा-मोहम्मद ताहिर को सही उत्तर माना था जबकि अभ्यर्थी ने सी विकल्प चुना था, कि हुमायूंनामा हुमायूं ने नहीं, बल्कि गुलबदन बेगम ने लिखा था, इसलिए सी गलत युग्म है।

अभ्यर्थी ने हाई कोर्ट में रिट दाखिल की और एकलपीठ ने देरी के आधार पर रिट खारिज कर दी। इसके बाद खंडपीठ ने भी उसकी अपील खारिज कर दी लेकिन हाई कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका स्वीकार कर ली।

हाई कोर्ट ने विशेषज्ञ की राय के आधार पर माना कि पढ़ने वाले के नजरिये के आधार पर दोनों विकल्प सही हो सकते हैं और एक अतिरिक्त अंक अभ्यर्थी को देने का आदेश दिया।

विशेषज्ञ की रिपोर्ट में कहा गया था कि यदि किताब और लेखक के आधार पर जोड़ी को देखा जाए तो सी सही विकल्प होगा क्योंकि हुमायूंनामा हुमायूं ने नहीं लिखा था। लेकिन अगर किताब और जिस व्यक्ति के बारे में वह लिखी गई है उसके हिसाब से देखा जाए तो बी गलत युग्म होगा यानी सही उत्तर बी होगा।

विशेषज्ञ के अनुसार पढ़ने वाले के नजरिये के आधार पर दोनों विकल्प सही हो सकते हैं। खंडपीठ के इस आदेश से असंतुष्ट होकर आयोग सुप्रीम कोर्ट आया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रश्न में यह कहीं नहीं बताया गया था कि किताब और व्यक्ति की जोड़ी लेखक के आधार पर मिलानी है। ऐसे में अगर आयोग ने किताब और उससे संबंधित व्यक्ति के आधार पर बी को गलत युग्म माना तो इसे मनमाना या अतार्किक नहीं कहा जा सकता।

शीर्ष न्यायालय ने कहा कि विशेषज्ञ रिपोर्ट भी यह निर्णायक रूप से नहीं बताती कि बी गलत था और सी एकमात्र सही उत्तर था। रिपोर्ट ने केवल अलग-अलग आधार पर दोनों विकल्पों को सही बताया था। कहा कि अभ्यर्थी ने प्रश्न में अपनी ओर से लेखक को आधार मान लिया था। यह उसकी अपनी धारणा थी और इसे परीक्षा संस्था की स्पष्ट गलती नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि प्रश्न को उसी रूप में देखा जाना चाहिए जैसा वह है, न कि जैसा किसी अभ्यर्थी या अदालत की राय में उसे होना चाहिए।

शीर्ष न्यायालय ने पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर कुंजी को सामान्यत: सही माना जाएगा। संदेह की स्थिति में लाभ परीक्षा संस्था को मिलेगा। हालांकि यदि प्रश्न गलत हो, एक प्रश्न के दो सही उत्तर हों जबकि केवल एक विकल्प चुनना हो, या आयोग ने स्पष्ट रूप से गलत उत्तर को सही माना हो, तो अदालत उचित स्थिति में हस्तक्षेप कर सकती है।

कोर्ट ने ये भी कहा कि उत्तर कुंजी पर आपत्ति के लिए निर्धारित प्रक्रिया और समय सीमा का पालन करना महत्वपूर्ण है। देरी से की गई चुनौती को भी अदालतों को देखना चाहिए, क्योंकि इससे पूरी परीक्षा और चयन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

 

 

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