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इसराइल में नेतन्याहू का बने रहना या जाना भारत के लिए क्या मायने रखता है?

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Nov 1, 2026


इस बार के इसराइल चुनाव में अरब मूल के मतदाताओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया

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इसराइल में 7 अक्तूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद ग़ज़ा, लेबनान और ईरान में हुए युद्ध के बाद पहली बार आम चुनाव हुए हैं.

27 अक्तूबर को हुए इस चुनाव को प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर जनमत संग्रह के तौर पर देखा जा रहा था.

लेकिन इस जनमत संग्रह का परिणाम साफ़ नहीं आया यानी कि इसराइली संसद में किसी को बहुमत नहीं मिला-न तो नेतन्याहू के गुट को और न ही विपक्ष को. इसके बजाय अरब पार्टियों के गठबंधन को लोगों की उम्मीद से बेहतर सफलता मिली है. 120 सदस्यों वाली संसद में उनके 19 सदस्य जीतकर आए हैं.

53 सीटों के साथ नेतन्याहू गुट और 48 सीटों के साथ विपक्षी गादी आइज़नकोट वाला गठबंधन बहुमत के लिए ज़रूरी 61 सीटों के आंकड़े से पीछे हैं. ऐसे में अरब मूल की पार्टियों की राजनीतिक भूमिका अहम हो गई है. और वे नेतन्याहू को हटाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं.

इन चुनावी नतीजों का असर सिर्फ़ इसराइल की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहने वाला है. इसका सीधा असर फ़लस्तीनियों की ज़िंदगी पर भी पड़ सकता है. हालांकि ग़ज़ा को लेकर आइज़नकोट का रुख़ भी नेतन्याहू से बहुत अलग नहीं है. उन्होंने 18 महीनों के भीतर हमास का शासन खत्म करने का वादा किया है.

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