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एसआईआर पर चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में जवाब: ‘फ़ैसले ज्ञानेश कुमार ने अकेले नहीं लिए’

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Oct 27, 2026


मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

इमेज कैप्शन, सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल हलफ़नामे में चुनाव आयोग ने कहा है कि हर फ़ैसला सर्वसम्मति से लिया गया

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पढ़ने का समय: 6 मिनट

भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एफ़िडेविट में कहा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेसिव रिवीज़न- एसआईआर) से जुड़े सभी फ़ैसले आयोग ने सर्वसम्मति से लिए थे.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और चुनाव आयोग के कुछ फ़ैसलों की वैधता को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका के जवाब में दाख़िल हलफ़नामे में आयोग ने उन आरोपों से इनकार किया है कि दूसरे दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एसआईआर से जुड़े फ़ैसले अकेले लिए थे.

यह हलफ़नामा राकेश कुमार सिंह की ओर से दाख़िल रिट याचिका के जवाब में दिया गया है. इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी किया था.

यह याचिका इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद दाख़िल की गई थी. रिपोर्ट में दावा किया गया था कि एसआईआर से जुड़े 14 अहम फ़ैसले चुनाव आयोग के नाम पर लिए गए, जबकि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इन पर आपत्तियां दर्ज की थीं.

इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए चुनाव आयोग ने हलफ़नामें में कहा है कि एसआईआर से जुड़े 24 जून 2025, 27 अक्तूबर 2025 और 14 मई 2026 के तीनों आदेश आयोग के सर्वसम्मत फ़ैसले थे.

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इसके बाद विपक्ष की अलग याचिका आई. 15 अक्तूबर को राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विपक्षी इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया. उसमें भी आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने दूसरे दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल किया.

इस मामले की अगली सुनवाई 27 अक्तूबर को होनी है.

‘फ़ॉर्म 6 में बदलाव नहीं किया गया’

चुनाव आयोग ने इस बात से भी इनकार किया है कि उसने एसआईआर के आदेशों के ज़रिए फ़ॉर्म 6 में बदलाव किया था. आयोग का कहना है कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित इस फ़ॉर्म में केवल केंद्र सरकार ही बदलाव कर सकती है.

आयोग ने कहा कि एसआईआर के दौरान मांगा जाने वाला घोषणा-पत्र एक अलग दस्तावेज़ है और इसे फ़ॉर्म 6 में बदलाव नहीं माना जा सकता.

यह विवाद इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद पैदा हुआ था, जिसमें कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने ऐसे बदलावों पर आपत्ति जताई थी जिनके तहत आवेदकों से अपने, अपने माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का पिछली गहन मतदाता सूचियों से संबंध बताने के लिए कहा गया था.

चुनाव आयोग ने माना कि ऑनलाइन आवेदन प्लेटफ़ॉर्म पर घोषणा-पत्र जिस तरह दिखाया गया था, उससे यह धारणा बन सकती थी कि फ़ॉर्म 6 में बदलाव किया गया है.

आयोग का कहना है कि यह घोषणा-पत्र आवेदकों को पुरानी मतदाता सूचियों से जोड़ने यानी उनकी मैपिंग में मदद के लिए शुरू किया गया था और ये बदलाव वैधानिक फ़ॉर्म में संशोधन नहीं हैं.

चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया को आसान बनाने और मतदाताओं के नाम शामिल करने में मदद के लिए लिए गए अपने फ़ैसलों की भी जानकारी दी.

‘मतदाताओं को सुनवाई के लिए आने की ज़रूरत नहीं’

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आयोग ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम पुरानी मतदाता सूचियों से मैप नहीं हो सके हैं, उन्हें आम तौर पर व्यक्तिगत रूप से सुनवाई में उपस्थित होने की ज़रूरत नहीं होगी.

बूथ लेवल अधिकारी उनके घर जाकर ज़रूरी दस्तावेज़ इकट्ठा करेंगे और उन्हें चुनावी पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) के विचार के लिए ECINet प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड करेंगे.

केवल असाधारण मामलों में ही सुनवाई की ज़रूरत होगी और ऐसी सुनवाई भी जहां तक संभव हो ऑनलाइन की जानी चाहिए.

आयोग ने दलील दी है कि ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर काम करने से रोकने की मांग वाली याचिका सुनवाई योग्य नहीं है.

संविधान के अनुच्छेद 324(5) का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिनके तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है.

चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम की विश्वसनीयता को बार-बार दी गई चुनौतियों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही विचार कर चुका है.

चुनाव आयोग ने कहा कि दशहरे की छुट्टियां बीच में पड़ने के कारण वह फ़िलहाल संक्षिप्त जवाब दाख़िल कर रहा है.

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच इस मामले की सुनवाई 27 अक्तूबर को करेगी.

5 अक्तूबर को इस याचिका पर नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से निलंबित करने का एकतरफ़ा अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया था.

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा था कि वह इन फ़ैसलों की जांच करेगी और अगर वे क़ानून के अनुरूप नहीं पाए गए तो उचित कार्रवाई करेगी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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