नई दिल्ली, आईएएनएस। देश की राजनीति में उस वक्त एक बड़ा बवंडर खड़ा हो गया जब कांग्रेस प्रवक्ता रीतम सिंह ने सेवानिवृत्त भारतीय सैन्य अधिकारियों और उनके अधिकारों पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी।
इस बयान में उन्होंने पूर्व सैनिकों को ‘शराबी फौजी अंकल’ संबोधित करते हुए उन्हें राजनीति, मीडिया और टीवी डिबेट से दूर रहने की नसीहत दी।
उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि इन पूर्व सैनिकों की चली, तो भारत में भी पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे हालात पैदा हो सकते हैं और सैन्य तख्तापलट का खतरा बन सकता है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब रीतम सिंह ने सोशल मीडिया पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए लिखा कि कैंटीन की रियायती शराब पीने वाले इन ‘फौजी अंकल’ को राजनीति से दूर रहना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि रिटायरमेंट के वक्त सैनिकों से एक घोषणा-पत्र भरवाया जाना चाहिए कि वे कभी राजनीति में नहीं आएंगे। सिंह ने आरोप लगाया कि ये सेवानिवृत्त अधिकारी नागरिक नेतृत्व पर अपनी शर्तें थोपना चाहते हैं।
‘टीवी पर दिखने वाले सेवानिवृत्त और नशे में धुत फौजी अंकल ही भारत के उस ‘मिलिट्री-इंडस्ट्रियल काम्प्लेक्स’ का चेहरा हैं, जिसने सत्ताधारी पार्टी में अपनी पैठ बना ली है। इस मिलिट्री-इंडस्ट्रियल काम्प्लेक्स को खत्म करने की जरूरत है।’
इस बयान के सामने आते ही देश भर के सैन्य दिग्गजों और पूर्व सैनिकों में गहरी नाराजगी फैल गई। उन्होंने इस अपमानजनक टिप्पणी का कड़ा विरोध करते हुए इसे भारतीय सेना और संविधान दोनों का अपमान बताया है।
मेजर जनरल हर्षा काकर (सेवानिवृत्त) ने कड़ा एतराज जताते हुए पूछा कि कांग्रेस पार्टी ने आखिर ऐसे शख्स को अपना प्रवक्ता कैसे बना दिया है। उन्होंने दो टूक कहा कि उनकी सोच बेहद ओछी और अतार्किक है।
उन्होंने अपनी रैंक और सम्मान देश की रक्षा करते हुए उन कठिन परिस्थितियों में कमाया है, जिनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।
वहीं, लेफ्टिनेंट जनरल पी.आर. शंकर (सेवानिवृत्त) ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल सशस्त्र बलों के प्रति गहरी अनादर की भावना को दर्शाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी बयानबाजी के गंभीर राजनीतिक परिणाम भुगतने होंगे।
कर्नल रोहित देव (सेवानिवृत्त) ने भी पलटवार करते हुए स्पष्ट किया कि वर्दी उतारने के बाद भी पूर्व सैनिक इस देश के उतने ही जिम्मेदार और आम नागरिक हैं, जितने अन्य लोग। उनके पास भी संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वोट देने और चुनाव लड़ने जैसे सभी लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने देश में एक बार फिर यह गंभीर बहस छेड़ दी है कि क्या राजनीतिक बहसों में वैचारिक मतभेदों के नाम पर देश की रक्षा करने वाले पूर्व सैनिकों के सम्मान और उनके संवैधानिक अधिकारों को निशाना बनाया जाना उचित है?