पीटीआई, नई दिल्ली। लिपुलेख दर्रे के रास्ते आगामी कैलास मानसरोवर यात्रा कराने की योजना पर नेपाल ने आपत्ति व्यक्त की है। नेपाल का दावा है कि यह इलाका उसका है। जबाव में भारत का कहना है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित हैं।
लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलास मानसरोवर यात्रा का मार्ग रहा है। भारत सीमा संबंधी लंबित मुद्दों सहित सभी मुद्दों पर नेपाल के साथ रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि इस तीर्थयात्रा मार्ग को अंतिम रूप देने से पहले (चीन और भारत ने) उससे कोई परामर्श नहीं किया गया। कैलास मानसरोवर यात्रा पर नेपाल की यह आपत्ति भारत की उस घोषणा के कुछ ही दिनों बाद आई है, जिसमें भारत ने कहा था कि यह यात्रा जून और अगस्त के बीच आयोजित की जाएगी।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इंटरनेट मीडिया पर जारी बयान में कहा, ”नेपाल सरकार का रुख स्पष्ट है और वह अपने इस रुख पर पूरी तरह से कायम है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के आधार पर उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं।”
बयान के अनुसार, नेपाल सरकार ने भारत और चीन दोनों के सामने नेपाली क्षेत्र (लिपुलेख) के रास्ते आयोजित होने वाली कैलास-मानसरोवर यात्रा के संबंध में अपना स्पष्ट रुख दोहराया है।
इससे पहले भी नेपाल सरकार ने भारत सरकार से अनुरोध किया था कि वह इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, विस्तार, सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा जैसी गतिविधियां न करे।
नेपाल सरकार ने इस बारे में चीन को भी सूचित कर दिया है। गौरतलब है कि नेपाल का दावा है कि लिपुलेख और कालापानी उसके क्षेत्र हैं, जबकि भारत का कहना है कि ये क्षेत्र उसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं।