• Thu. Sep 3rd, 2026

24×7 Live News

Apdin News

क्या ‘नॉटी बॉय’ वापस दिलाएगा ISRO का खोया हुआ भरोसा? आज रात होगा GSLV-F17 का लॉन्च

Byadmin

Sep 3, 2026


डिजिटल डेस्क, दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 4 सितंबर को तड़के 2:55 बजे एक बेहद महत्वपूर्ण मिशन की शुरुआत करने जा रहा है। श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 रॉकेट भारत के पहले जियोसिंक्रोनस इमेजिंग सैटेलाइट EOS-05 को अंतरिक्ष में लेकर उड़ान भरेगा।

दरअसल, 2025 और 2026 में PSLV की लगातार दो विफलताओं के बाद अब यह रॉकेट न केवल देश की सामरिक और प्राकृतिक निगरानी के लिए 2,367 किलोग्राम वजनी अत्याधुनिक उपग्रह को 36,000 किलोमीटर ऊपर स्थापित करेगा, बल्कि लगातार असफलताओं से जूझ रही इसरो की साख और जनता के विश्वास को वापस कायम करने में भी बड़ी भूमिका निभाएगा।

isro ani (1)

हालांकि, शुरुआती विकास के वर्षों में अनिश्चित प्रदर्शन के कारण GSLV Mk II को ‘नॉटी बॉय’ उपनाम दिया गया था, लेकिन इसके और PSLV के इंजन पूरी तरह से अलग हैं। यही वजह है कि तकनीकी आधार पर इस मिशन की सफलता को लेकर इसरो वैज्ञानिक काफी आश्वस्त हैं।

भरोसे की परीक्षा

बता दें कि ISRO के लिए यह मिशन सिर्फ एक और सैटेलाइट लॉन्च नहीं है। यह एक तरह से वापसी की कोशिश और भरोसे की परीक्षा भी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लगातार प्रक्षेपण विफलताओं से भरे कठिन दौर के बाद ISRO के सामने अपनी विश्वसनीयता फिर से मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।

isro ani (2)

गौरतलब है कि लंबे समय से भरोसेमंद माने जाने वाले PSLV को 2025 और 2026 में लगातार कुछ नाकामियों का सामना करना पड़ा। इस मिशन के दांव पर सिर्फ एक अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट नहीं है, बल्कि उस संस्था की साख भी है, जिसे भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी ताकत का प्रतीक माना जाता है।

18 में से 6 उड़ानें असफल

शुरुआती वर्षों में अनिश्चित और अप्रत्याशित प्रदर्शन के कारण इसरो के भीतर इस रॉकेट को कुख्यात उपनाम “शरारती लड़का” (Naughty Boy) मिला था, इसकी शुरुआती 18 में से 6 उड़ानें पूरी तरह सफल नहीं हो पाई थीं। दशकों के प्रयासों के बावजूद, GSLV के हर प्रक्षेपण के साथ एक विशेष तनाव जुड़ा रहता है, जो PSLV में शायद ही कभी देखा गया हो।

इसके बावजूद, अपनी इसी अप्रत्याशितता को पार करते हुए, यह रॉकेट आज भी भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान स्तंभों में से एक बना हुआ है।

अमेरिका ने किया था विरोध

1990 के दशक में भारत ने अपने भारी उपग्रहों को लॉन्च करने की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से रूस से क्रायोजेनिक तकनीक हासिल करने का प्रयास किया। हालांकि, इस प्रयास से एक बड़ा भू-राजनीतिक विवाद पैदा हो गया। मिसाइल प्रसार संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए अमेरिका ने इस तकनीक के हस्तांतरण का कड़ा विरोध किया।

भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने हार नहीं मानी और स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज विकसित करके अपनी प्रक्षेपण क्षमताओं को हमेशा के लिए बदल दिया। वर्षों की असफलताओं, रुकावटों, पुनर्रचना (रेडिसिग्निंग) और अनगिनत परीक्षणों के बाद आखिरकार उन्हें सफलता मिली।

अगस्त 2021 में GSLV-F10 मिशन के दौरान क्रायोजेनिक में आई कारण उन्नत अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (EOS-03) को कक्षा में स्थापित करने का प्रयास विफल हो गया था।

पांच साल बाद दूसरा बड़ा मौका

पांच साल बाद, EOS-05 मिशन उसी क्षमता को हासिल करने का एक दूसरा बड़ा अवसर है। यह 2,367 किलोग्राम वजनी भारत का पहला भूतुल्यकालिक (Geostationary) इमेजिंग उपग्रह है।

निचली कक्षा के उपग्रहों के विपरीत, EOS-05 पृथ्वी से लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर स्थिर रहकर भारत और उसकी सीमाओं पर 24 घंटे नजर रख सकेगा।

विशेषताएं

51.7 मीटर ऊंचा और 420.5 टन वजनी यह रॉकेट तीन चरणों (सॉलिड कोर, लिक्विड स्ट्रैप-ऑन, लिक्विड स्टेज, और स्वदेशी क्रायोजेनिक स्टेज) से बना है। SLV की हालिया असफलताओं और अस्थाई रोक के बीच, 4 सितंबर तड़के होने वाला यह प्रक्षेपण इसरो के आत्मविश्वास और साख को फिर से बहाल करने के लिए बेहद निर्णायक है।

By admin