
शेख़ अम्मी रोज़गार की तलाश में खाड़ी देशों में गई थीं. वहाँ उन्हें दिक्क़तों का सामना करना पड़ा, इसलिए गृह राज्य आंध्र प्रदेश लौट आईं.
सोशल मीडिया पर ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें पुरुष और महिलाएं वीडियो पोस्ट कर कह रहे हैं कि वे ख़तरे में हैं और उन्हें मदद की ज़रूरत है.
विदेश में कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों को वापस लाने के लिए, डॉक्टर बीआर आंबेडकर कोनासीमा ज़िले में एक प्रवासन केंद्र की स्थापना की गई है.
ज़िला कलेक्टर इसके अध्यक्ष हैं. केंद्र का कहना है कि वह उत्पीड़न के आरोपों की गहन जांच करेगा.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
हालांकि, बीबीसी ख़ुद अम्मी के आरोपों की पुष्टि नहीं करता है.
यह सवाल भी उठ रहे हैं कि खाड़ी के देशों में रोज़गार के लिए जाने वालों को समस्याओं का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
शेख़ अम्मी के साथ क्या हुआ?
कोनासीमा ज़िले के द्राक्षारामम की निवासी अम्मी, दिसंबर 2025 में कडियाम क्षेत्र की सुल्ताना (महिला का नाम बदल दिया गया है) के माध्यम से क़तर गई थीं. वहाँ उन्होंने एक घर में रसोइया और अन्य घरेलू सहायिका के रूप में काम किया.
अम्मी ने बीबीसी को बताया, “उन्होंने मुझसे वहाँ बहुत काम करवाया, लेकिन मुझे ठीक से खाना नहीं दिया. मुझे मिर्च के साथ थोड़े से चावल खाने को मिलते थे. उससे मेरे पेट में दर्द होने लगा. मुझे वहीं सोना पड़ता था. दो महीने के अंदर ही मैं बीमार पड़ गई. मुझे दौरे पड़ने लगे और एक दिन हालत गंभीर हो गई और मुझे अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टर ने कहा, ‘मैं थक गई हूं, मैं कोई काम नहीं कर सकती.’ मालिकों ने मुझसे दो लाख रुपये वापस मांगे.”
“उन्होंने कहा कि जब तक पैसे नहीं मिल जाते, वे मुझे नहीं भेजेंगे. उन्होंने कहा कि एजेंट को फ़ोन करने से उनका कोई लेना-देना नहीं है. एक पल तो मुझे लगा कि मैं वहीं मर जाऊंगी. द्राक्षारामम में मेरे बेटे ने पैसे जुटाने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उसे पैसे नहीं दिए. आख़िरकार, उसने अधिकारियों से शिकायत की. उन्होंने कार्रवाई की और वहाँ के दूतावास से बात की लेकिन मुझे जाने नहीं दिया.”

हालांकि, उन्हें क़तर भेजने वाली सुल्ताना अम्मी के आरोपों से इनकार करती हैं.
सुल्ताना ने बीबीसी को बताया कि वह एजेंट नहीं हैं, लेकिन दुबई में उनके कुछ परिचित लोग हैं. अगर कोई उनसे काम के लिए वहां जाने को कहता है, तो वह उन्हें भेज देती हैं.
सुल्ताना ने यह भी कहा कि उन्होंने शेख़ अम्मी को उनके कहने पर भेजा था, लेकिन वहां जाने के बाद उन्हें वहां का माहौल ठीक नहीं लगा. उनके साथ गए लोग ठीक थे.
गोदावरी ज़िले से खाड़ी देशों तक
गोदावरी ज़िले के हज़ारों लोग लंबे समय से रोज़गार की तलाश में खाड़ी देशों में पलायन कर रहे हैं.
पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी, कोनासीमा, काकीनाडा और एलुरु जिलों के शिक्षित लोग वाइट कॉलर (कार्यालय) नौकरियों के लिए जाते हैं जबकि कम पढ़े लिखे लोग वहां ब्लू कॉलर नौकरियों के लिए जाते हैं.
पिछले दो-तीन दशकों से, निर्माण उद्योग के कुशल श्रमिक, जैसे कि राजमिस्त्री, बढ़ई, इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, और वेल्डर के साथ कुक, हाउसकीपिंग के काम करने के लिए खाड़ी देशों में जा रहे हैं. इन कामों में शारीरिक श्रम की भी ज़रूरत होती है.
हालांकि, डॉक्टर अंबेडकर कोनासीमा ज़िले के अधिकारियों के अनुसार, हाल के दिनों में खाड़ी देशों में अज्ञात एजेंटों के ज़रिए धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं और कुछ नियोक्ताओं से उत्पीड़न के कारण, घर लौटने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है.
उन्होंने बताया कि हाल ही में, कोनासीमा ज़िले के 80 से अधिक श्रमिक ज़िला अधिकारियों की मदद से अपने गृहनगर लौट आए हैं.
कई आरोप

अन्नामय्या ज़िले के वायालापाडु की निवासी शहनाज़ ओमान गई थीं. शहनाज़ ने हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण से अपनी सुरक्षा के लिए अपील की थी, क्योंकि उन्हें वहां कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था.
पवन कल्याण ने एक्स पर पोस्ट किया कि जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने विदेश मंत्रालय से उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया और उनके सहयोग से उन्हें सुरक्षित रूप से आंध्र प्रदेश लाया गया.
इससे पहले, जुलाई 2025 में असिलेटी निर्मला नामक एक यूज़र ने नारा लोकेश (मंत्री और चंद्रबाबू नायडू के बेटे) को बताया था कि रोज़गार के लिए मस्कट गई गुडीवाडा के पास जोन्नापाडु की निवासी जनार्दनपुरम दुर्गा को परेशानी हो रही है, उसे वापस लाया जाए.
इस पर नारा लोकेश ने ट्वीट किया कि उन्होंने अपनी टीम को दुर्गा को उनके गृहनगर लाने के लिए सभी ज़रूरी व्यवस्थाएं करने को कहा है.

धनलक्ष्मी की कहानी
वनपल्ली की कोल्लाडा धनलक्ष्मी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वह खाना पकाने और अन्य काम करने के लिए कुवैत गई थीं. वह भी हाल ही में अपने गृहनगर लौटी हैं.
धनलक्ष्मी बताती हैं, “मैं इस उम्मीद से कुवैत गई थी कि दो-तीन साल रहूं और कुछ पैसे कमा लूं. मैं अपना घर बनाना चाहती थी. वहाँ पहुँचने के बाद मैंने काम किया लेकिन घर की बुज़ुर्ग महिला मुझे प्रताड़ित करती थी. उसे जो भी चीज़ मिलती, उससे मुझे पीटती थी. उसने मुझे जान से मारने की धमकी भी दी. यातना सहन न कर पाने के कारण मैंने अपने पति को कॉल किया. वह कलेक्टर के दफ़्तर गए और मदद मांगी. वहां से दूतावास संपर्क किया गया. इस तरह मैं वहां से वापस लौटी.”
बीबीसी ने धनलक्ष्मी को कुवैत भेजने वाले काकीनाडा के राजू और रविंदर (नाम बदले हुए) से बात की.
उन्होंने कहा, “हम आधिकारिक एजेंट नहीं हैं. अगर कोई हमसे अनुरोध करता है तो हम अपने जान-पहचान के लोगों को भेजते हैं. हमारे भेजे गए किसी भी व्यक्ति को यह समस्या नहीं हुई. केवल धनलक्ष्मी को हुई. अगर हमें पहले से पता होता तो हम उन्हें इस तरह नहीं भेजते.”
शेषरत्नम ने बीबीसी को बताया, “मैं फिसल गई और मेरे पैर में चोट लग गई. लेकिन वहाँ के मालिकों को कोई परवाह नहीं थी. चोट एक बड़े घाव में बदल गई और बहुत दर्द होने लगा. दो हफ़्ते बाद, वे मुझे अस्पताल ले गए. डॉक्टरों ने घाव की सफ़ाई की और बताया कि मुझे डायबिटीज़ है. उन्होंने कहा कि चोट को पूरी तरह ठीक होने में समय लगेगा और तब तक मुझे कोई काम नहीं करना चाहिए. इसके बाद मालिकों ने मुझे दफ़्तर भेज दिया. वे मुझसे 1,60,000 रुपये वापस भी मांग रहे थे. हालांकि, यहां के अधिकारियों ने मुझे समझा-बुझाकर भारत वापस बुला लिया.”

बीबीसी ने पी. गन्नावरम क्षेत्र के एक अनधिकृत एजेंट संपथ (नाम बदला हुआ) से बात करने की कोशिश की, जिसने शेषरत्नम को मस्कट भेजा था, लेकिन वह उपलब्ध नहीं था.
अमलापुरम के रहने वाले श्रीनु ने बताया कि उन्हें रेस्तरां का काम सौंपने का वादा करके रेगिस्तान की तेज़ धूप में काम करने पर मजबूर किया गया. बिना भरपेट भोजन किए रेगिस्तान में काम करना वह सहन नहीं कर सके और वापस लौट आए.
बीबीसी ने श्रीनु को दुबई भेजने वाले अल्लावरम के अमर से बात की, तो उन्होंने कहा कि वे एजेंट नहीं हैं, बल्कि कभी-कभी दुबई में अपने रिश्तेदारों के ज़रिये लोगों को काम के लिए भेजते हैं.
उन्होंने कहा कि श्रीनु को वहां का माहौल पसंद नहीं आया और वह वापस लौट आए. उनके साथ गए दो अन्य लोग वहां काम कर रहे हैं.
बीबीसी ख़ुद उन आरोपों की पुष्टि नहीं करता है जो कुछ लोगों ने लगाए हैं कि खाड़ी देशों में उनके नियोक्ताओं ने उनका उत्पीड़न किया.
बीबीसी ने वहां के एजेंटों और उन्हें रोज़गार देने वाले परिवारों से संपर्क करने के प्रयास किए लेकिन न तो कथित पीड़ित और न ही अधिकारी मालिकों के बारे में कोई जानकारी दे पाए. इसकी वजह से बीबीसी उनसे संपर्क करने में असमर्थ रहा.
एजेंटों के ज़रिये खाड़ी के देशों में जाना

कोनासीमा सेंटर फॉर माइग्रेशन के मैनेजर रमेश ने बीबीसी को बताया कि वे पीड़ितों के लगाए गए आरोपों और वास्तविक स्थिति की जांच कर रहे हैं.
रमेश ने बताया, “पहले खाड़ी देशों में रोज़गार मिलने की पुष्टि होने पर यहाँ के मजदूर अपने ख़र्च पर वहां जाते थे. लेकिन हाल के दिनों में यह परंपरा थोड़ी बदल गई है. कुछ एजेंट वहाँ रोज़गार देने वालों से पैसे लेकर टिकट और अन्य खर्चों का भुगतान कर यहां से लोगों को भेज देते हैं. बहुत से लोग उत्साहित होते हैं कि वे बिना एक पैसा खर्च किए जा सकते हैं. लेकिन वहां पहुंचने के बाद, रोज़गार देने वाले उनसे दिन में 18 से 20 घंटे काम करवाते हैं, और कुछ तो उन्हें परेशान भी करते हैं.”
अधिकारियों का कहना है कि तेलुगु भाषी राज्यों में अनधिकृत एजेंटों के माध्यम से काम के लिए खाड़ी के देशों की यात्रा करना आम बात है और हाल ही में जान-पहचान वालों के माध्यम से विदेश यात्रा में वृद्धि हुई है.
रमेश ने बताया कि विदेशों में मुश्किलों का सामना कर रहे ज़िले के निवासियों को वापस लाने के प्रयास जारी हैं. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में खाड़ी देशों में मुश्किलों का सामना कर रहे ज़िले के 80 निवासियों को सुरक्षित वापस लाया जा चुका है.
इसी तरह कई कारणों से सात लोगों के शव भी यहाँ लाए गए और उनके परिजनों को सौंप दिए गए. रमेश ने बताया कि विदेश जाने के इच्छुक लोग अगर उनके केंद्र से संपर्क करें तो वे मालिकों की पहचान, एजेंट की पहचान आदि की जांच करेंगे.
रमेश ने समझाया कि खाड़ी देशों में संघर्ष कर रहे तेलुगु लोगों को कैसे वापस लाया जाएगा.
रमेश ने बताया, “जब कोई शिकायत मिलती है, तो हम खाड़ी देशों में काम करने वाले एजेंटों को फोन करके उनसे बात करते हैं. हम पीड़ितों से भी उनकी बात करवाते हैं. ये एजेंट भी वहां के प्रायोजकों (जिन्होंने उन्हें काम पर रखा है) को सीधे नहीं जानते. इसलिए वे पहले उन हवाला एजेंटों से बात करते हैं जिन्होंने वहाँ काम दिलवाया है.”
“ये एजेंट प्रायोजकों और यहाँ के एजेंटों के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं. इन हवाला एजेंटों से बात करने के बाद, वे प्रायोजकों से बात करते हैं. अगर प्रायोजक अपने कर्मचारियों के बारे में शिकायत करते हैं या उनके काम से असंतुष्ट होते हैं, तो वे तुरंत उन्हें यहां भेजने का इंतज़ाम करते हैं.”
”अगर संवाद में कोई दिक़्क़त आती है, तो प्रायोजक ख़ुद दोनों पक्षों से बात करके समस्या का समाधान करते हैं. अगर मामला गंभीर होता है, तो वे तुरंत उन्हें वहाँ से वापस बुलाने का इंतज़ाम करते हैं.”

रमेश ने बताया कि अगर प्रायोजक पैसे की मांग करते हैं, तो अधिकारी इस मुद्दे को सुलझाने के लिए वहां के दूतावास से बात करेंगे और कुछ मामलों में, वे प्रायोजकों से सीधे बात करने की भी कोशिश करेंगे.
रमेश ने कहा कि वहां मौजूद सभी प्रायोजकों को एक ही बात पर सहमत कराना संभव नहीं होता.
कोनासीमा ज़िले के एसपी राहुल मीणा ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अभी तक अनधिकृत एजेंटों के ख़िलाफ़ या एजेंटों की धोखाधड़ी की कोई शिकायत नहीं मिली है. उन्होंने कहा कि अगर कोई शिकायत मिलती है तो कार्रवाई की जाएगी.
हालांकि, कुछ पीड़ितों का कहना है कि उनके पास शिकायत करने की कोई शक्ति नहीं है.
शेख अम्मी ने बीबीसी से कहा, “हम रोज़ी रोटी के लिए गए थे, मुक़दमे दर्ज करवाने के लिए नही. मुक़दमे दर्ज कराने और अदालतों में जाने के लिए हम कहाँ धक्के खाएंगे?”
‘अगर वहां कोई परेशानी हो तो हम क्या कर सकते हैं?’
नाम न बताने की शर्त पर अमलापुरम के एक अनाधिकारिक एजेंट ने बीबीसी को बताया, “इन इलाक़ों से हज़ारों लोग खाड़ी के देशों में जाते हैं. हमने उनमें से सैकड़ों को भेजा है. उनमें से कुछ ही प्रायोजकों की वजह से समस्याओं का सामना कर रहे हैं. हम इसके बारे में क्या कह सकते हैं? हम हर बात का अनुमान नहीं लगा सकते.”

दूसरी ओर, ज़िला कलेक्टर डॉक्टर महेश कुमार ने बीबीसी को बताया कि पुलिस की मदद से कोनासीमा ज़िले में फर्जी एजेंटों की पहचान की जा रही है.
‘यह कोई छोटी समस्या नहीं है…’
ज़िला कलेक्टर डॉक्टर महेश कुमार ने बीबीसी को बताया कि खाड़ी देशों में पलायन कोई छोटी समस्या नहीं है, बल्कि संस्थागत रूप से एक गंभीर समस्या है.
अकेले कोनासीमा ज़िले से ही 15,000 लोग पलायन कर चुके हैं. उन्होंने कहा कि इसीलिए हमने इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान देना शुरू किया है.
उन्होने बीबीसी से कहा, “ज़िले की आबादी लगभग 18 लाख है और क़रीब 15,000 लोग मध्य-पूर्व के देशों में काम कर रहे हैं. अगर उनके परिवार के सदस्यों को भी शामिल कर लिया जाए, तो कुल मिलाकर लगभग 1.5 लाख लोग प्रभावित होंगे.”
”यह सिर्फ इसी ज़िले की बात है. इसीलिए हमने कोनासीमा प्रवासन केंद्र स्थापित किया है. अगर किसी को कोई समस्या है, तो वे कलेक्ट्रेट आकर हमें बता सकते हैं. हम संबंधित देशों के दूतावासों से बात करेंगे और समस्या का समाधान करने की कोशिश करेंगे.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.