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‘घायल’ बना ‘घातक’, राघव चड्ढा के भाजपा में शामिल होने से AAP को लगे 5 बड़े झटके

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Apr 25, 2026


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अपनी अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चाल चलने से कुछ ही दिन पहले राघव चड्ढा ने एक फिल्मी अंदाज अपनाया और ‘धुरंधर’ फिल्म का एक डायलॉग दोहराया कि “घायल हूं, इसलिए घातक हूं।”

अब जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो यह डायलॉग और इसका मतलब बिल्कुल अलग नजर आता है। वह “घायल” नेता राघव चड्ढा न सिर्फ अरविंद केजरीवाल की AAP से अलग हो गए हैं बल्कि उन्होंने भाजपा में शामिल होकर राजनीतिक ‘सरहद’ भी पार कर ली है। और ऐसा करके उन्होंने शायद आप को अब तक का सबसे गहरा जख्म दिया है।

आम आदमी पार्टी के लिए घातक बने चड्ढा

किसी बड़े नेता के पार्टी छोड़ने से कहीं ज्यादा चड्ढा का यह कदम पार्टी के आंकड़ों, उसकी कहानी और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी जगह को सीधे तौर पर चोट पहुंचाता है। आप के लिए इस झटके का सबसे ज्यादा असर शायद पंजाब में महसूस होगा। यह इकलौता ऐसा राज्य है जहां पार्टी सत्ता में है और जो उसकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं की नींव है।

यहां 5 ऐसे कारण बता रहे हैं जिनकी वजह से राघव चड्ढा का पार्टी छोड़ना आम आदमी पार्टी को सबसे ज्यादा चोट पहुंचा सकता है-

आंकड़ों के हिसाब से इस टूट की कीमत

आप से राघव चड्ढा का जाना पार्टी के लिए सिर्फ एक राजनीतिक झटका ही नहीं है बल्कि संसद में यह पार्टी को सीधे-सीधे आंकड़ों के लिहाज से भी एक बड़ा नुकसान पहुंचाता है। राघव चड्ढा पार्टी से राज्यसभा के 6 अन्य सदस्यों के साथ अलग हुए हैं।

सात सदस्यों के कथित तौर पर पाला बदलने के बाद आप की ताकत असल में 10 सांसदों से घटकर सिर्फ 3 रह गई है। दो-तिहाई सदस्यों का आंकड़ा पार कर लेने से यह समूह दलबदल-विरोधी नियमों के तहत ‘विलय’ (merger) के तौर पर मान्यता पाने का हकदार हो जाता है। इसका मतलब है कि यह नुकसान तत्काल और अपरिवर्तनीय है।

आप के लिए इसका मतलब है कि ऊपरी सदन (राज्यसभा) में उसकी ताकत में 70% की गिरावट आ गई है, जिससे बहसों में दखल देने, समितियों में पद हासिल करने और राष्ट्रीय विमर्श को दिशा देने की उसकी क्षमता बुरी तरह से सीमित हो गई है।

इस झटके की गंभीरता इस बात से और भी बढ़ जाती है कि राज्यसभा में आप की मौजूदगी मुख्य रूप से पंजाब पर आधारित है। संसद में सदस्यों की संख्या कम हो जाने से पार्टी की वह क्षमता भी कमजोर पड़ जाती है, जिसके जरिए वह राष्ट्रीय स्तर पर पंजाब के हितों को सामने रखती है।

‘नई राजनीति’ के ब्रांड की साख को झटका

आप से संबंध तोड़ते हुए राघव चड्ढा ने कहा, “आप, जिसे मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह अब अपने सिद्धांतों, मूल्यों और मूल नैतिकता से भटक गई है। अब यह पार्टी देश के हित में नहीं, बल्कि अपने निजी फायदे के लिए काम करती है… पिछले कुछ सालों से मुझे महसूस हो रहा था कि मैं गलत पार्टी में सही आदमी हूं। इसलिए, आज हम घोषणा करते हैं कि मैं आप से खुद को अलग कर रहा हूं और जनता के करीब जा रहा हूं।”

2012 में अन्ना हजारे आंदोलन के बाद अपनी शुरुआत से ही आप की राजनीतिक ताकत लंबे समय से पारंपरिक पार्टियों से खुद को अलग दिखाने की उसकी क्षमता पर टिकी रही है वह भी एक सुधारवादी और सत्ता-विरोधी सोच के जरिए।

राघव चड्ढा का पार्टी छोड़ना इस स्थिति को और मुश्किल बना देता है। यह आरोप लगाकर कि पार्टी अब राष्ट्रीय हित के बजाय “निजी फायदों” के लिए काम करती है, वह आने वाले महीनों में चर्चा का रुख वादों से हटाकर काम-काज की तरफ मोड़ सकते हैं।

शराब घोटाले से जुड़ा पूरा विवाद 2025 के विधानसभा चुनावों में AAP के लिए जानलेवा साबित हुआ। चड्ढा का पाला बदलना आने वाले पंजाब चुनावों में आप के शासन और इरादों को लेकर मतदाताओं की सोच को भी बदल सकता है।

आप की अंदरूनी उथल-पुथल

राघव चड्ढा और छह अन्य सांसदों का पार्टी छोड़ना पार्टी के भीतर एक गहरी प्रवृत्ति को दिखाता है। यह बार-बार होने वाली अंदरूनी फूट की प्रवृत्ति है, जो पार्टी की शुरुआत से ही चली आ रही है। 2012 में ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन से जन्मी आप खुद एक फूट से ही उभरी थी। उस समय अन्ना हजारे और किरण बेदी चुनावी राजनीति में उतरने के कदम का विरोध कर रहे थे।

इन सालों में पार्टी ने कई अहम चेहरों को धीरे-धीरे पार्टी छोड़ते देखा है। शुरुआत के संस्थापकों जैसे योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण से लेकर कुमार विश्वास, आशुतोष और अलका लांबा जैसे जाने-माने चेहरों तक।

पिछले दिल्ली विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आप के नेतृत्व और स्वाति मालीवाल के बीच की दरार भी खुलकर सामने आ गई थी। शुक्रवार को मालीवाल भी चड्ढा के साथ पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गईं।

राघव चड्ढा से जुड़ा यह मामला इसलिए अलग है, क्योंकि इसका पैमाना और समय बहुत खास है। एक ही समय पर कई मौजूदा राज्यसभा सांसदों का पार्टी छोड़ना, संसदीय स्तर पर पार्टी के लिए सबसे बड़ी असफलताओं में से एक है।

पंजाब में जीत के सूत्रधार ने विदा ली

हालांकि राघव चड्ढा का जाना प्रतीकात्मक रूप से अहम है, लेकिन संदीप पाठक का भी साथ में जाना ढांचागत नजरिए से ज्यादा असरदार साबित हो सकता है। आप की पंजाब जीत का मुख्य सूत्रधार माने जाने वाले पाठक ने पार्टी के चुनावी अभियान में डेटा-आधारित और बूथ-स्तर की सटीक रणनीति का इस्तेमाल किया।

उनकी इस रणनीति की बदौलत ही आप 2022 के विधानसभा चुनावों में लगभग 42% वोट शेयर को 117 में से 92 सीटों की जबरदस्त बहुमत में बदलने में कामयाब रही। कई पार्टियों के बीच हुए इस मुकाबले में यह एक शानदार सफलता दर थी।

अब, ऐसे समय में जब भगवंत मान सरकार अपने कार्यकाल के निर्णायक और अंतिम दौर में प्रवेश कर रही है और अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं तो उस रणनीतिक आधार स्तंभ की गैर-मौजूदगी से एक खालीपन पैदा हो सकता है।

राष्ट्रीय स्तर पर AAP की स्थिति को झटका

राघव चड्ढा के जाने का असर पंजाब से आगे बढ़कर राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति में आप की साख पर भी पड़ा है। विपक्षी खेमे में आम आदमी पार्टी ने खुद को एक अलग ताकत के तौर पर स्थापित किया है जो अक्सर सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाती है, खासकर कांग्रेस के साथ। चड्ढा के जाने के बाद अब यह स्थिति कमजोर पड़ गई है।

राज्यसभा में अपनी सीटों की संख्या 10 से घटकर तेजी से 3 रह जाने के कारण आप की खुद को एक गंभीर राष्ट्रीय खिलाड़ी के तौर पर पेश करने की क्षमता को सीधा झटका लगा है। और गठबंधन की राजनीति में संख्या ही साख होती है। इसका असर विपक्षी समीकरणों में आप की मोलभाव करने की ताकत पर भी पड़ता है।

पार्टी ने अक्सर एक मजबूत स्थिति से बातचीत की है। पिछले साल दिल्ली में मिली हार के बाद यह समीकरण पहले ही कमजोर पड़ गया था। अब, जैसे-जैसे पार्टी का विधायी दायरा सिकुड़ रहा है, सीट-बंटवारे की बातचीत या रणनीतिक फैसलों में अपनी बात मनवाना पार्टी के लिए और भी मुश्किल हो सकता है।

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