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जंतर-मंतर नहीं अब ये हैं दिल्ली में प्रोटेस्ट करने की नई जगहें, स्थानीय लोग क्या बोले?

Byadmin

Oct 14, 2026


जंतर-मंतर के पास 11 अक्तूबर को सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट किया

इमेज कैप्शन, जंतर-मंतर के पास 11 अक्तूबर को सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट किया

दर्जनों भैंसें, जगह-जगह पड़ी खंडित मूर्तियां और दूर-दूर तक फैला खाली मैदान. दिल्ली के बुराड़ी मैदान में पहुंचने पर सबसे पहले यही नज़ारा दिखता है.

दिल्ली के जिस जंतर-मंतर पर कभी किसानों, स्टूडेंट्स, युवाओं, पहलवानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आंदोलन किया, वहां अब प्रदर्शन की इजाज़त नहीं होगी.

यह फ़ैसला ऐसे वक़्त आया है, जब कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को रद्द करने की मांग कर रहे हैं.

सीजेपी ने इससे पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर भी जंतर-मंतर पर आंदोलन किया था.

वीडियो कैप्शन, जिन पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था, उन्होंने क्या बताया?

41 वर्षीय संजय बचपन से इस इलाक़े में रह रहे हैं. उनके लिए मैदान सिर्फ़ एक खुली जगह नहीं, बल्कि दोस्तों के साथ वक़्त बिताने और क्रिकेट खेलने का ठिकाना है. सुबह लोग यहां टहलने भी आते हैं.

वह कहते हैं, “सोसाइटी से निकलकर यह एक ऐसी जगह है, जहां हम लोग कुछ देर साथ रहकर समय गुज़ारते हैं. अगर यह भी प्रदर्शन स्थल बन गया तो हम सबका एक साथ मिलना बंद हो जाएगा.”

संजय को यह चिंता भी है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस की बड़ी तैनाती या झड़पों की स्थिति बनी, तो आसपास रहने वाले बच्चों पर उसका असर पड़ सकता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय की स्टूडेंट अदिति, जो मैदान के पास रहती हैं, इस फ़ैसले को अलग नज़र से देखती हैं.

उनका कहना है कि सेंट्रल दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों और सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण यातायात और मेट्रो सेवाएं प्रभावित होती हैं. इससे दूर-दराज़ के इलाक़ों से कॉलेज आने वाले स्टूडेंट्स को परेशानी होती है.

अदिति के मुताबिक़, बड़े मैदानों में प्रदर्शन आयोजित करने से सेंट्रल दिल्ली पर दबाव कम हो सकता है.

हालांकि, ईशा की राय इससे अलग है. उनका मानना है कि संसद के क़रीब होने पर प्रदर्शनों का राजनीतिक असर ज़्यादा होता है.

वह कहती हैं, “प्रदर्शन का मक़सद संसद तक अपनी आवाज़ पहुंचाना है. अगर प्रदर्शन दूर हो जाएंगे तो लोगों का ध्यान भी कम हो सकता है.”

जगह बदली, तो क्या आवाज़ का असर भी बदलेगा?

जंतर-मंतर हाल में हुए कई बड़े प्रदर्शनों का गवाह रहा है

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तीनों मैदानों तक पहुंचने के बाद एक बात साफ़ दिखती है. इन जगहों पर बड़े आयोजनों के लिए पर्याप्त जगह हो सकती है, लेकिन इनके आसपास रहने वाले लोगों की ज़रूरतें और चिंताएं अलग-अलग हैं.

बुराड़ी में लोगों को ट्रैफ़िक जाम और सीमित रास्तों की चिंता है. रामलीला मैदान के आसपास कारोबार और दफ़्तरों पर असर पड़ने की आशंका है. वहीं, सीबीडी मैदान के पास रहने वाले कुछ लोग अपनी खुली जगह और रोज़मर्रा की आवाजाही को लेकर चिंतित हैं.

दूसरी ओर, सेंट्रल दिल्ली में होने वाले बड़े प्रदर्शनों के दौरान यातायात और सार्वजनिक परिवहन पर पड़ने वाले असर को कम करने की दलील भी दी जा रही है.

लेकिन विरोध प्रदर्शन सिर्फ़ भीड़ जुटाने का नाम नहीं हैं. उनके ज़रिए अपनी बात सार्वजनिक करना, मीडिया का ध्यान खींचना और सरकार तक मांगें पहुंचाना भी अहम है.

जंतर-मंतर की पहचान इसी वजह से बनी थी. अब देखना होगा कि नई जगहें प्रदर्शनकारियों को अपनी बात कहने का वैसा ही अवसर दे पाती हैं या नहीं.

और क्या इन मैदानों के आसपास रहने वाले लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और विरोध करने के अधिकार के बीच कोई संतुलन बन पाता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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