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यहूदियों के होलोकॉस्ट के बाद 1947 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने फ़लस्तीन को दो देशों में विभाजित करने की मंज़ूरी दी थी, एक यहूदियों के लिए और दूसरा अरबों के लिए. यहूदी देश इसराइल के पहले राष्ट्रपति हाइम वाइज़मैन बने जो एक वैज्ञानिक थे.
1952 में उनकी मौत के बाद दुनिया के सबसे चर्चित वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन को राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव मिला.
आइंस्टाइन ने यह प्रस्ताव विनम्रता से ठुकरा दिया, यह कहते हुए कि उनके पास राजनीतिक नेतृत्व का अनुभव नहीं है. वे लोगों और प्रशासन को संभालने के लिए खुद को उपयुक्त नहीं मानते.
आइंस्टाइन को इसराइल का राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने अपनी सीमाओं का हवाला देते हुए इसे ठुकरा दिया, हालांकि वे ज़ायोनिस्ट आंदोलन से जुड़े रहे.
इसराइल और इसके राष्ट्रपति
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इसराइल ने 1948 में एक संप्रभु देश के रूप में अपनी स्थापना की घोषणा की, लेकिन फ़लस्तीनियों के पास अब तक एक संप्रभु देश नहीं है. भले ही 140 से अधिक देशों ने इसे मान्यता दे दी है.
इसराइल के पहले राष्ट्रपति हाइम वाइज़मैन, रूसी साम्राज्य में पैदा हुए एक बायोकेमिस्ट थे और कुछ समय तक ब्रिटिश नागरिक भी रहे. वह अपने उन आविष्कारों के लिए मशहूर थे जो एसीटोन के उत्पादन से जुड़े थे.
यह पदार्थ 1910 के दशक में सैन्य मामलों में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ. एसीटोन का इस्तेमाल कॉर्डाइट बनाने में किया जाता था. यह एक विस्फोटक सामग्री थी और ब्रिटेन ने प्रथम विश्व युद्ध में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था.
हालांकि, वाइज़मैन का राजनीतिक जीवन इससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण था. वह ज़ायोनिज़्म के बड़े नेताओं में से एक थे. यह एक राष्ट्रवादी आंदोलन था जो उन्नीसवीं सदी के अंत में अस्तित्व में आया और फ़लस्तीन में एक यहूदी राज्य की स्थापना की मांग करता था. इसराइल बनने के करीब चार साल में राष्ट्रपति वाइज़मैन की मौत हो गई.
73 साल की उम्र में मिला था राष्ट्रपति बनने का मौका
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एबा इबन अमेरिका में इसराइल के राजदूत थे. उन्होंने इस पद के लिए अल्बर्ट आइंस्टाइन से संपर्क किया. यह जर्मन भौतिक विज्ञानी 1933 से अमेरिका में रह रहे थे. यह वही वर्ष था जब एडॉल्फ़ हिटलर सत्ता में आए और जर्मनी में यहूदियों पर ज़ुल्म और सितम शुरू हुआ.
एबा इबन ने बेन-गुरियन की ओर से आइंस्टाइन को एक पत्र लिखा.
उन्होंने लिखा, “इसराइल भौतिक रूप से एक छोटा देश है लेकिन यह महान बन सकता है क्योंकि यह यहूदी राष्ट्र की, प्राचीन और आधुनिक, दोनों काल की सर्वोच्च आध्यात्मिक और बौद्धिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है.”
एबा इबन ने यह भी स्पष्ट किया कि आइंस्टाइन को अपने वैज्ञानिक पेशे को छोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. हालांकि उन्हें न्यू जर्सी छोड़कर इसराइल में बसना पड़ता. वह न्यू जर्सी में प्रिंसटन के इंस्टीट्यूट फ़ॉर एडवांस्ड स्टडी में रहते और काम करते थे.
उस समय आइंस्टाइन की उम्र 73 वर्ष थी. वह इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने विनम्रता से जवाब दिया और इस आमंत्रण पर ख़ुशी का इज़हार किया लेकिन वह इस तरह की ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं थे.
आइंस्टाइन का जवाब- दुखी हूं लेकिन..
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यरूशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी में आइंस्टाइन आर्काइव के क्यूरेटर और किताब ‘आइंस्टाइन की नोटबुक’ के लेखक ज़ईफ़ रोसेनक्रान्ज़ के अनुसार, उन्होंने तर्क दिया कि उनमें इस पद के लिए ज़रूरी क्षमता नहीं है. ज़ईफ़ ने इस भौतिक विज्ञानी के व्यक्तिगत पत्राचार और तस्वीरों का संकलन किया है.
अल्बर्ट आइंस्टाइन ने जवाब दिया, “मैं इसराइली सरकार के इस प्रस्ताव से बहुत प्रभावित हुआ हूं लेकिन दुख और शर्मिंदगी महसूस करता हूं कि मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता.”
उन्होंने आगे लिखा, “मैंने पूरी ज़िंदगी ठोस तथ्यों से जुड़ी समस्याओं पर काम किया है. मेरे पास लोगों के साथ सही तरीक़े से व्यवहार करने और सरकारी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए न तो ज़रूरी स्वाभाविक क्षमता है और न ही अनुभव. इन्हीं कारणों से मैं ऐसे बड़े पद की ज़िम्मेदारियां संभालने के योग्य नहीं हूं.”
“यह परिस्थिति मुझे और अधिक दुख देती है क्योंकि यहूदी समुदाय के साथ मेरा संबंध उस समय से सबसे मज़बूत मानवीय बंधन रहा है जब मुझे दुनिया के राष्ट्रों के बीच अपनी असुरक्षित स्थिति का पूरा अहसास हुआ था.”
क्या थी इसराइल की प्रतिक्रिया
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एलिस कैलाप्रिस ने आइंस्टाइन पर कई किताबें लिखी हैं. उनके अनुसार बेन-गुरियन इस इनकार से सहमत हो गए थे.
उन्होंने अपनी पुस्तक ‘आइंस्टाइन एनसाइक्लोपीडिया’ में लिखा है, “बेन-गुरियन को चिंता थी कि आइंस्टाइन की राजनीतिक मामलों में बेबाकी उन्हें अपने विवेक के ख़िलाफ़ काम करने पर मजबूर कर सकती है.”
प्रधानमंत्री ने अपने चीफ़ ऑफ स्टाफ़ आइज़ैक नाफ़ोन (जो बाद में 1978 से 1983 तक इसराइल के राष्ट्रपति रहे) से कहा था, “मुझे बताओ अगर वह हां कह देते तो मैं क्या करता. मुझे यह पद उन्हें पेश करना पड़ा क्योंकि ऐसा न करना असंभव था. लेकिन अगर वे इसे स्वीकार कर लेते तो हम मुश्किल में पड़ जाते.”
राजनीतिक सक्रियता वाले आइंस्टाइन का नेहरू को पत्र
इसका यह मतलब नहीं था कि अल्बर्ट आइंस्टाइन इसराइल की राजनीतिक दिशा की खोज ख़बर नहीं लेते थे.
मीशल गरमान इतिहासकार और फ़ेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ रियो डी जनेरियो के प्रोफ़ेसर हैं. वह कहते हैं, “आइंस्टाइन ज़ायोनिस्ट आंदोलन के सदस्य थे. वह 1921 से वाइज़मैन के क़रीब थे और ज़ायोनिज़्म की एक वामपंथी शाखा का प्रतिनिधित्व करते थे जो फ़लस्तीन में अरबों और यहूदियों के लिए राष्ट्रीय अधिकारों के साथ एक द्वि-राष्ट्रीय राज्य की स्थापना का समर्थन करती थी.”
गरमान ज़ायनवाद और इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष से जुड़े मामलों के शोधकर्ता हैं.
वह बताते हैं कि आइंस्टाइन के पत्र इस विषय को समझने में हमारी मदद करते हैं. 1947 में भारत की आज़ादी के बाद उन्होंने नए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा.
उन्होंने बधाई देते हुए अपनी आस्था के बारे में लिखा, “मैंने ज़ायनवादी उद्देश्य को अपनाया क्योंकि मैं इसमें एक स्पष्ट ऐतिहासिक ग़लती को सुधारने का रास्ता देखता था.”
अगले वर्ष इसराइल की स्थापना के साथ वह दशकों के संघर्ष के बाद इत्मीनान महसूस कर सकते थे. हालांकि उन्होंने इसराइल में एक चरमपंथी समूह की ग़लत हरकतों पर आपत्ति जताई.
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1948 के अंत में उन्होंने दूसरे यहूदी बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ को एक खुला ख़त लिखा और इसराइली राजनेता मेनाख़म बेगिन की अमेरिका यात्रा की आलोचना की.
मेनाख़म बेगिन इरगुन के नेता थे जो एक ज़ायनवादी अर्द्धसैनिक संगठन था और इसराइल की स्थापना से पहले फ़लस्तीनियों और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ‘आतंकवादी हमले’ करता था.
उसी वर्ष इरगुन ने यरूशलम के पास देइर यासीन गांव में क़त्ल-ए-आम किया और सौ से ज़्यादा फ़लस्तीनी नागरिकों को मार डाला, जिनमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे शामिल थे.
कुछ समय बाद मेनाख़म बेगिन ने उसी संगठन से एक नई पार्टी की स्थापना की जिसका नाम हेरूत (हिब्रू भाषा में ‘आज़ादी’) था.
न्यूयॉर्क टाइम्स को लिखे गए पत्र में कहा गया, “मेनाख़म बेगिन की, जो इस पार्टी के नेता हैं, अमेरिका यात्रा स्पष्ट रूप से इस धारणा को फैलाने के लिए है कि आगामी इसराइली चुनावों में उन्हें अमेरिकी समर्थन प्राप्त होगा.”
इस पर दस्तख़त करने वालों ने पहले ही पैराग्राफ़ में ‘हेरूत’ के बारे में अपनी राय साफ़ कर दी. उन्होंने लिखा, “यह पार्टी अपने संगठन, कार्यप्रणाली, राजनीतिक दर्शन और सामाजिक प्रभाव के मामले में नाज़ी और फ़ासिस्ट पार्टियों से गहरी समानता रखती है.”
वर्ष 2024 में ब्राज़ील के सोशल मीडिया पर कुछ वामपंथी यूज़र्स ने इस पत्र को फिर से चर्चा का विषय बनाया; यह तब हुआ जब ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने ग़ज़ा पट्टी में इसराइल के क़दमों की तुलना होलोकॉस्ट से की.
अगर इन बयानों को संदर्भ के बिना बताया जाए तो ऐसा लग सकता है कि आइंस्टाइन इसराइल के विरोधी थे.
ब्रिटिश इतिहासकार रिचर्ड क्रॉकेट अपनी पुस्तक ‘आइंस्टाइन और बीसवीं सदी की राजनीति’ में लिखते हैं, “आइंस्टाइन को कभी ज़ायनवाद और इसराइल राज्य के आलोचक के रूप में और कभी इसके समर्थक के रूप में पेश किया गया है. ऐसी राय उन लोगों की थी जो उन्हें अपने रुख़ के पक्ष में इस्तेमाल करना चाहते हैं.”
राष्ट्रपति के ऑफ़र के पीछे का उद्देश्य क्या था?
क्रॉकेट के अनुसार आइंस्टाइन इसराइल को एक ऐसे राज्य के रूप में देखना चाहते थे जो व्यापक मूल्यों के उनके फ़्रेमवर्क से जुड़ा हो.
वह इस बात को इस तरह स्पष्ट करते हैं, “सबसे बढ़कर राष्ट्रवाद से घृणा और अंतरराष्ट्रीयता से जुड़ाव दो ऐसी बातें थीं जिसने हमेशा ज़ायनवाद और इसराइल के बारे में उनके रुख़ की सीमाएं तय कीं.”
यह वही आइंस्टाइन थे जिन्हें 1952 में इसराइल के राष्ट्रपति पद के लिए ऑफ़र दिया गया था.
मीशल गरमान कहते हैं, “शायद इसका मक़सद यह था कि एक नवजात राज्य, जो कुछ साल पहले एक रक्तरंजित युद्ध के नतीजे में अस्तित्व में आया था उसे अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान की जा सके.”
वह 1948 से 1949 के युद्ध की ओर इशारा करते हैं जिसमें इसराइल ने अरब लीग को हरा दिया और उस ज़मीन का आधा हिस्सा अपने क़ब्ज़े में ले लिया जो भविष्य के फ़लस्तीनी राज्य के लिए तय की गई थी.
मीशल गरमान याद दिलाते हैं कि हालांकि इसराइल में राष्ट्रपति का पद बहुत हद तक प्रतीकात्मक है लेकिन यह गहराई से राजनीतिक भी है.
वह समझाते हैं, “आइंस्टाइन को केवल यहूदी होने के आधार पर आमंत्रित नहीं किया गया था बल्कि ज़ायनवादी आंदोलन के साथ उनके राजनीतिक संबंधों और इसराइल की स्थापना के समर्थन के कारण आमंत्रित किया गया था.”
उन्होंने आगे कहा, “दूसरी प्रमुख यहूदी हस्तियों को भी बार-बार इसराइल का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतीकात्मक पदों पर देश की छवि सुधारने के उद्देश्य से आमंत्रित किया गया है.”
उदाहरण के लिए, 1990 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन प्रधानमंत्री शिमोन पेरेज़ ने मशहूर लेखक आमोस ओज़ को राजनीति में आने का प्रस्ताव दिया था.
द्विराष्ट्रीय समाधान पर आइंस्टाइन का विचार
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1952 में ‘ब्रिट शालोम’ नाम की वैचारिक धारा एक अल्पसंख्यक दृष्टिकोण रखती थी, लेकिन यह कभी अलग-थलग या अन्य धाराओं से कटी हुई नहीं थी. यह ज़ायनवादी बुद्धिजीवियों का एक समूह था और आइंस्टाइन भी इसके सदस्य थे.
इसके सदस्यों में प्रमुख बुद्धिजीवी जैसे हाना आरेंड्ट, मार्टिन बूबर और गर्शोम शोलेम शामिल थे. ब्रिट शालोम के कुछ सदस्य यरूशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के संस्थापकों में भी शामिल थे.
गरमान के अनुसार, इस समूह के सदस्यों को वर्तमान इसराइली सरकार द्वारा ‘ग़द्दार’ माना जाता है क्योंकि बिन्यामिन नेतन्याहू की सरकार अलग दृष्टिकोणों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ती जिसमें ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ का समर्थन शामिल है.
वह सवाल करते हैं, “हमारे समय का आइंस्टाइन कौन है? कल्पना कीजिए कि ऐसा कोई व्यक्ति इस पद को स्वीकार कर ले. क्या एडा योनाथ, रसायन विज्ञान की नोबेल पुरस्कार विजेता और फ़लस्तीनी क्षेत्रों पर क़ब्ज़े और ग़ज़ा की वर्तमान स्थिति की आलोचक, ऐसा पद स्वीकार करतीं? मुझे नहीं लगता.”
आइंस्टाइन की जगह राष्ट्रपति बने ज़वी का नेतन्याहू कनेक्शन
जब आइंस्टाइन ने पेश किया गया पद स्वीकार नहीं किया तो उस वर्ष इसराइल के राष्ट्रपति बनने वाले व्यक्ति इतिहासकार आइज़ैक बेन-ज़वी थे.
आइंस्टाइन ने मेनाख़म बेगिन की आलोचना की थी लेकिन वह इसराइल में अधिक प्रभावशाली होने लगे. उनकी पार्टी एक मज़बूत ताक़त बन गई.
हेरूत आने वाले दशकों में इसराइल के रूढ़िवादियों की मुख्य पार्टी बन गई. बेगिन 1977 में प्रधानमंत्री बने और 1983 तक इस पद पर रहे.
पांच साल बाद हेरूत एक और दक्षिणपंथी पार्टी ‘लिकुड’ में शामिल हो गई. साल 2006 से इसके नेता बिन्यामिन नेतन्याहू रहे हैं, जो इसराइल के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं और उनका कुल कार्यकाल लगभग 18 वर्ष का हो चुका है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.