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सोमवार दोपहर इंग्लैंड पर भारतीय महिला टीम की शानदार जीत का जश्न अपने भीतर कई छोटी-छोटी कहानियां समेटे हुए था.
पूरी टीम के लिए यह आईसीसी महिला टी-20 वर्ल्ड कप अभियान की निराशा के बाद एक सुखद याद बन गया है. टीम टी-20 वर्ल्ड कप में एक बार फिर सेमीफ़ाइनल में जगह बनाने में नाकाम रही थी.
इस जीत ने हरमनप्रीत कौर की कप्तानी पर उठ रहे सवालों से उन पर पड़ने वाले दबाव को कम कर दिया है.
बेशक, टी-20 और टेस्ट क्रिकेट में काफ़ी अंतर है. भारतीय महिला टीम बहुत कम टेस्ट खेलती है और 2021 के बाद से उसने सिर्फ़ सात टेस्ट मैच खेले हैं.
लेकिन लॉर्ड्स टेस्ट की अपनी अलग अहमियत थी. भारत की कामयाबी में बल्लेबाज़ और कप्तान के रूप में हरमनप्रीत की मौजूदगी और उनके व्यक्तिगत प्रदर्शन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
गेंदबाज़ क्रांति गौड़ और बल्लेबाज़ यास्तिका भाटिया का ड्रेसिंग रूम के ऑनर्स बोर्ड पर नाम दर्ज होना बड़ी बात है.
उस बोर्ड पर पहले से काइल जैमिसन, नाथन स्मिथ और केएल राहुल के नाम दर्ज हैं. इस बोर्ड पर नाम होना उपलब्धि, प्रेरणा और उदाहरण, तीनों का प्रतीक है.
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कुछ फ़ैसले जो सही साबित हुए
स्नेह राणा के लिए यह पारंपरिक स्पिन गेंदबाज़ी कौशल की याद दिलाने वाला प्रदर्शन था. ऋचा घोष के लिए यह शॉर्ट-लेग पर लिया गया ऐसा शानदार कैच था, जिसे शायद वह दोबारा कभी नहीं पकड़ पाएंगी.
जिन-जिन खिलाड़ियों ने इस जीत में अपनी भूमिका निभाई, उनके लिए यह टेस्ट इस बात की याद दिलाता है कि क्रिकेट का सबसे लंबा फॉर्मेट हमेशा एक टीचर जैसा ही रहेगा… यानी कभी दयालु तो कभी कठोर.
कोच अमोल मजूमदार और उनके सहयोगी कोचिंग स्टाफ़ को भी नहीं भूलना चाहिए. यह टेस्ट जीत ऐसे समय आई, जब पुरुष टीम के कोच की भूमिका पर सवाल उठ रहे थे.
यास्तिका भाटिया को मुख्य विकेटकीपर के रूप में चुनना, स्नेह राणा को प्रमुख स्पिनर की भूमिका देना और ऋचा घोष को नज़दीकी फील्डिंग पोज़िशन पर लगाना जैसे फ़ैसलों के साथ टीम के प्रदर्शन पर मजूमदार और गेंदबाज़ी कोच आविष्कार साल्वी के प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
यह एक ऐतिहासिक लम्हा था और टीम ने इस पर पूरी तरह अपना नियंत्रण रखा. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि यह जीत रेड बॉल क्रिकेट में इंग्लैंड पर भारत के दबदबे का ही विस्तार थी.
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भारत का पलड़ा भारी
दोनों महिला टीमों के बीच अब तक खेले गए 16 टेस्ट मैचों में भारत सिर्फ़ एक बार हारा है, वह भी 1995 में जमशेदपुर में. पिछले 20 वर्षों में दोनों टीमों के बीच खेले गए छह टेस्ट में से अब भारत चार जीत चुका है.
इस एकतरफ़ा प्रतिद्वंद्विता की एक वजह यह मानी जाती है कि भारतीय महिला क्रिकेट में अब भी लाल गेंद का घरेलू टूर्नामेंट खेला जाता है. यह सीनियर महिला इंटर-ज़ोनल मल्टी-डे ट्रॉफ़ी है, जिसे छह साल के अंतराल के बाद 2024 में फिर शुरू किया गया.
दूसरी ओर इंग्लैंड की महिला क्रिकेट में ऐसा कोई टूर्नामेंट नहीं है. महिला क्रिकेट की टॉप टीम ऑस्ट्रेलिया के पास भी भारत जैसा कोई टूर्नामेंट नहीं है. ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर आने वाली ए टीमों के ख़िलाफ़ रेड बॉल के मैच खेले जाते हैं और 2024 में फिर से एक तीन दिवसीय रेड बॉल मैच शुरू किया गया.
मैच में इंग्लैंड के फीके प्रदर्शन, ख़राब गेंदबाज़ी और बल्लेबाज़ों के क्रीज़ पर समय बिताने के लिए संघर्ष करने का कारण अंग्रेज़ी कमेंटेटरों ने टी-20 विश्व कप के तुरंत बाद मिला कम समय बताया.
उस विश्व कप में इंग्लैंड को ऑस्ट्रेलिया ने एकतरफ़ा अंदाज़ में हराया था.
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लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि दुनिया की किसी भी क्रिकेट टीम पर उतना दबाव नहीं होता, जितना भारतीय टीम पर होता है, फिर चाहे टीम महिलाओं की हो या पुरुषों की.
50 ओवर की विश्व चैंपियन होने के बावजूद भारतीय महिला टीम के टी-20 वर्ल्ड कप में औसत से कम प्रदर्शन को गंभीरता से नोट किया गया और उसकी कड़ी आलोचना हुई.
ऐसे समय में भारतीय महिला टीम की प्रतिक्रिया उत्साहजनक रही और लॉर्ड्स इस बात का प्रमाण बना कि यह एक दृढ़ निश्चयी और एकजुट टीम है. खेल के सबसे छोटे फॉर्मेट से सबसे लंबे प्रारूप में नए जोश के साथ ढलने की उसकी क्षमता प्रभावशाली रही.
बल्लेबाज़ों की बात करें तो क्रीज़ पर समय बिताने की उनकी इच्छा और फिर ज़रूरत पड़ने पर रन बनाने की रफ़्तार बढ़ाने की उनकी क्षमता सराहनीय रही.
सलामी बल्लेबाज़ स्मृति मंधाना ने मैच में सबसे ज़्यादा रन बनाए. उन्होंने 83 और 70 रन की पारियां खेलीं और दूसरे छोर पर चाहे जो कुछ भी हो रहा हो, नई गेंद का सफलतापूर्वक सामना किया.
यास्तिका भाटिया ने एक पारी में किसी भी अन्य बल्लेबाज़ से ज़्यादा समय क्रीज़ पर बिताया. वह तीन घंटे 43 मिनट तक बल्लेबाज़ी करती रहीं, लेकिन उनका स्ट्राइक रेट 71.51 रहा.
भाटिया ने कहा कि उन्हें इस बात का एहसास था कि गेंदबाज़ों को इंग्लैंड की दूसरी पारी के सभी 10 विकेट लेने के लिए पर्याप्त समय देना होगा.
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इस साल कई हैं चुनौतियां
क्रांति गौड़ की अगुवाई में भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों ने सटीक लेंथ पर लगातार गेंदबाज़ी की और अपनी रणनीति पर टिके रहे. उन्होंने दबाव बनाया, लॉर्ड्स की ढलान का इस्तेमाल कर गेंद को मूव कराया और शुरुआत में ही इंग्लैंड की बल्लेबाज़ी को झटका दिया.
पहली पारी में तेज़ गेंदबाज़ों के शुरुआती असर के बाद स्नेह राणा ने साझेदारियां तोड़ने की ज़िम्मेदारी संभाली.
उन्होंने अनुभवी दीप्ति शर्मा और श्रीचरणी से पहले प्रमुख रेड बॉल स्पिनर की भूमिका निभाई. दूसरी पारी में उन्होंने घिस चुकी पिच का पूरा फ़ायदा उठाया, इंग्लैंड की बल्लेबाज़ी को भेदा, चार विकेट लिए और दिन का खेल जल्दी ख़त्म कराया.
भारत की फ़ील्डिंग में कैच छूटना एक साफ़ कमी रही, लेकिन उतना ही साफ़ यह भी दिखा कि हरमनप्रीत गेंदबाज़ी में बदलाव करने को लेकर कितनी लचीली रहीं और इनर रिंग के फ़ील्डरों ने रन रोकने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ ख़ुद को झोंक दिया.
दोनों टीमों के बीच अंतर साफ़ दिखाई दे रहा था. भारत यह मैच जीतना चाहता था. भारत ने बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और फ़ील्डिंग, तीनों में पूरा ज़ोर लगा दिया.
आगे भारतीय महिला टीम का कार्यक्रम काफ़ी व्यस्त रहने वाला है. ज़्यादातर मुकाबले उसी फॉर्मेट में होंगे, जिसमें इस साल उसका प्रदर्शन कमज़ोर रहा है, यानी टी-20 में.
भारत अपने पिछले 16 टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में से नौ हार चुका है. फ़रवरी में पहली बार ऑस्ट्रेलिया में टी-20 अंतरराष्ट्रीय सिरीज़ जीतने के बाद भारतीय टीम दक्षिण अफ़्रीका में 1-4 और फिर इंग्लैंड में द्विपक्षीय सिरीज़ में 1-2 से हार गई.
इसके बाद आईसीसी महिला टी-20 वर्ल्ड कप में उसका निराशाजनक प्रदर्शन रहा. अब भारत टी-20 एशिया कप में उतरेगा, जहां वह मौजूदा चैंपियन है. इसके बाद एशियाई खेल, ज़िम्बाब्वे की मेज़बानी में एक व्हाइट-बॉल सिरीज़ और साल के अंत में एक बार फिर दक्षिण अफ़्रीका का दौरा होगा.
लॉर्ड्स में मिली इस टेस्ट जीत से भारतीय महिला टीम अगर कुछ अपने साथ ले जा सकती है, तो वह है वह सबसे क़ाबिले-तारीफ़ गुण, जिसने उसे यह अविस्मरणीय जीत दिलाई- परिस्थितियों के अनुसार ख़ुद को ढालने की उसकी क्षमता और वापसी करने का उसका जज़्बा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.