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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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प्रकाशित
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मई के महीने में भारत में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी की गई.
इसकी शुरुआत 15 मई को हुई, जब क़ीमतों में क़रीब तीन रुपये प्रति लीटर का बड़ा इज़ाफ़ा किया गया. इसके बाद 19 मई को क़रीब 87 से 91 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई.
तीसरी बढ़ोतरी 23 मई को हुई, जिसमें फिर से क़ीमतों में क़रीब 87 से 91 पैसे प्रति लीटर का इज़ाफ़ा हुआ. चौथी और हालिया बढ़ोतरी 25 मई को की गई, जिसमें पेट्रोल के दाम 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल के दाम 2.71 रुपये प्रति लीटर बढ़ाए गए.
यानि 15 मई से 25 मई के बीच पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें कुल मिलाकर क़रीब सात रुपये से 7.5 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ गईं.
सियासी वार पलटवार
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सरकार का कहना है कि इस बढ़ोतरी की वजह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों में आया तेज़ उछाल है. सरकार के मुताबिक़ मध्य-पूर्व में तनाव के चलते तेल महंगा हुआ और भारत जैसे आयात-निर्भर देश को इसका असर झेलना पड़ा है.
सरकार का दावा है कि सरकारी तेल कंपनियां लंबे समय से लागत से कम क़ीमत पर ईंधन बेच रही थीं और रोज़ाना भारी घाटा उठा रही थीं इसलिए यह बढ़ोतरी उस नुक़सान को कम करने के लिए ज़रूरी हो गई.
सरकार ने यह भी कहा है कि उसने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए काफ़ी वक़्त तक क़ीमतों में बढ़ोतरी रोके रखी और पहले ही एक्साइज़ ड्यूटी घटाकर बोझ कम किया था.
सरकार के मुताबिक़ अगर ये क़दम न उठाए जाते तो क़ीमतें और ज़्यादा बढ़ सकती थीं. सरकार का ये भी कहना है कि ये मौजूदा बढ़ोतरी वैश्विक परिस्थितियों की तुलना में अभी भी सीमित और नियंत्रित है.
वहीं विपक्ष ने क़ीमतें बढ़ाए जाने पर सरकार की निंदा की है. 15 मई को पहली बार क़ीमतें बढ़ने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, “ग़लती मोदी सरकार की, क़ीमत जनता चुकाएगी. 3 रुपये का झटका आ चुका, बाकी वसूली क़िस्तों में की जाएगी.”
कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें बढ़ने से मंहगाई बढ़ेगी और इससे आर्थिक विकास की रफ़्तार कम हो सकती है.
सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर रमेश ने लिखा, “वर्षों तक जब अंतरराष्ट्रीय तेल क़ीमतें कम थीं या गिर रही थीं, तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लगातार यह मांग करती रही कि उसका लाभ भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाए और गैस, पेट्रोल तथा डीजल की घरेलू क़ीमतों में कमी की जाए. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उपभोक्ताओं को लूटा गया.”
घाटा या मुनाफ़ा?
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क़ीमतें बढ़ाए जाने से पहले केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ये कह चुके थे कि सरकारी तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी से उपभोक्ताओं को बचाने के लिए हर रोज़ एक हज़ार करोड़ रुपये का नुक़सान उठा रही हैं.
लेकिन 13 से 19 मई के बीच तीन बड़ी तेल कंपनियों इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने जनवरी से मार्च 2026 के अपने तिमाही नतीजे घोषित किए. इनमें दिखा कि इन सभी कंपनियों ने इस दौरान अच्छा प्रदर्शन करते हुए मुनाफ़ा दर्ज किया. तीनों कंपनियों का कुल मिलाकर मुनाफ़ा क़रीब 19,000 करोड़ रुपये ज़्यादा रहा.
अजय श्रीवास्तव दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के निदेशक हैं. वह देश में तेल कंपनियों के नुक़सान उठाने वाले दावे पर सवाल उठाते हैं.
वो कहते हैं, “हाल ही में ऑयल कंपनियों के नतीजे आये और सबने बहुत ही बड़ा फ़ायदा दिखाया है. दूसरी तरफ़ साथ-साथ ही ये ख़बरें चलती हैं कि हर दिन इन कंपनियों को इतने करोड़ का घाटा हो रहा है क्योंकि सरकार ठीक से दाम नहीं बढ़ा रही. तो ये क्या है?”
“सिस्टम में पारदर्शिता होनी चाहिए जिससे ये पता चले कि कितने फ़ीसदी पैसा तेल कम्पनियां लेंगी और कितना सरकार टैक्स लेगी. अगर ये एक पारदर्शी तरीक़े से हमारे सामने होगा तो सब ठीक हो जाएगा.”
अपनी बात जारी रखते हुए श्रीवास्तव कहते हैं, “जब 2020-21 में तेल के दाम 25-30 डॉलर प्रति बैरल हुआ करते थे उस समय भी हमारे दाम क़रीब इतने ही थे. तो एक बड़ा मुनाफ़ा कमाया गया तो वो मुनाफ़ा एक पूल में डाला जाना चाहिए था. या तो आप पेट्रोल के दाम कम कर देते, जो सरकार ने किए नहीं.”
“तो जितना मुनाफ़ा हुआ उसे अगर पूल में रखा जाता तो जब दाम असाधारण तरीक़े से बढ़ते तो इस पैसे का इस्तेमाल करके सुनिश्चित कर सकते थे कि उपभोक्ताओं पर चोट न पहुंचे और पेट्रोल-डीज़ल का दाम बहुत ज़्यादा न बढ़ाना पड़े.”
वो कहते हैं कि ये पूरा सेक्टर पारदर्शिता की कमी पर आधारित है और पारदर्शिता लाने से कई मसले हल हो जायेंगे.
तेल कंपनियों के तिमाही के नतीजे मार्च तक के थे. तो ये भी माना जा रहा है कि आने वाली तिमाहियों में इन कंपनियों के मुनाफ़ों पर पड़ा ख़राब असर नज़र आने लगेगा.
रूस से आयात किया गया तेल बचाना चाहिए था?
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2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद भारत की तेल आयात नीति में बड़ा बदलाव आया. पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगा दिए और इस वजह से रूसी तेल सस्ते दाम पर उपलब्ध होने लगा और भारत ने इसका फ़ायदा उठाते हुए तेज़ी से आयात बढ़ाया.
पहले जहां भारत के तेल आयात में रूस का हिस्सा बहुत कम था. वहीं 2022 के कुछ ही महीनों में भारत ने बड़े पैमाने पर रूसी कच्चा तेल ख़रीदना शुरू कर दिया और रूस जल्दी ही भारत का प्रमुख सप्लायर बन गया.
साल 2022–2023 के दौरान यह वृद्धि और तेज़ हो गई. रूस का हिस्सा भारत के कुल कच्चे तेल आयात में लगभग 2 फ़ीसदी से बढ़कर 19 फ़ीसदी तक पहुंच गया और 2023–2024 में कई बार 35 से 40 फ़ीसदी तक भी पहुंचा.
सस्ते तेल की वजह से भारत को आयात लागत कम करने में मदद मिली और रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया और उसने पारंपरिक मध्य-पूर्वी देशों की जगह काफी हद तक ले ली.
लेकिन एक सवाल ये भी है कि क्या भारत जिस वक़्त रूसी तेल को रिफ़ाइन कर और देशों को बेच रहा था, उसे ईरान युद्ध शुरू होने के बाद निर्यात पर रोक लगाकर उस तेल को ख़ुद की ज़रूरतों के लिए बचाना चाहिए था.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, “तो जब ईरान का युद्ध शुरू हुआ तो उसके बाद कई देशों ने जिनमें चीन, सिंगापुर और दो-तीन देश शामिल थे, उन्होंने रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया. ये उन्होंने इसलिए किया ताकि युद्ध शुरू होने के बाद होने वाली कमी से निपट सकें. भारत को भी ऐसा करना चाहिए था.”
अपनी बात जारी रखते हुए श्रीवास्तव कहते हैं, “अगर हम तुलना करें और आज के डेटा को देखें तो चीन के पास छह महीने से ज़्यादा वक़्त के रिज़र्व्स थे और भारत के रिज़र्व्स बहुत ही कम समय के थे. तो भारत को तुरंत तेल का निर्यात बैन करना चाहिए था.”
“चीन के पास बड़ा तेल का रिज़र्व था, उन्होंने फिर भी निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाया. भारत ने ऐसा नहीं किया तो मुझे लगता है कि हमें बैन करना चाहिए था. आज भी हमारा पेट्रोल और डीज़ल का एक्सपोर्ट जारी है.”
वो कहते हैं, “भारत से तेल के निर्यातक पब्लिक और प्राइवेट दोनों सेक्टर के हैं. लेकिन राष्ट्रीय हित में सभी को प्रतिबंध मानने के लिए बाध्य किया जा सकता है. निर्यात करने वाली कंपनियां कहती हैं कि उनके तेल के ख़रीदारों के साथ कॉन्ट्रैक्ट हुए हैं और अगर वो उसे तोड़ेंगे तो उन्हें हर्जाना देना होगा.”
“वो बात भी सही हो सकती है. लेकिन इस तरह की नेशनल इमरजेंसी के हालात में भारत सरकार को सब कुछ अनदेखा करते हुए पेट्रोल और डीज़ल के निर्यात को रोकना चाहिए था.”
आईसीआरए भारत की एक प्रमुख स्वतंत्र क्रेडिट रेटिंग एजेंसी है. प्रशांत वशिष्ठ आईसीआरए के सीनियर वाइस-प्रेज़िडेंट हैं. वह तेल के स्टोरेज की सुविधा की कमी की ओर इशारा करते हैं.
वो कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि सिर्फ़ रूसी कच्चे तेल को स्टोर करके रख लेना एक सही तर्क है. लेकिन हमें शायद और ज़्यादा स्टोरेज की ज़रूरत थी. ऐसा नहीं है कि उस वक़्त सस्ता तेल मिल रहा था तो भारत ने उसे बाहर भेज दिया. भारत के पास जितनी स्टोरेज थी उतना तेल तो रखा ही गया.”
वशिष्ठ कहते हैं, “कई देशों में ऑड-ईवन शुरू हो गया है या पेट्रोल और डीज़ल ख़रीदने पर लिमिट लगा दी गई है. लेकिन हमारे यहां अभी तक एक नेशनल एनर्जी इमरजेंसी घोषित नहीं हुई है. वो इसलिए भी है क्योंकि हम क्रूड सोर्सिंग कर भी पा रहे हैं. और यह भी ठीक कहना है कि अगर दुनिया का 20 फ़ीसदी कच्चा तेल या क्रूड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स कम हो जाते हैं तो आयात करने वाले देशों पर असर तो पड़ेगा ही.”
वो कहते हैं, “इस पर हमेशा बहस हो सकती है कि ऐसे हालात से निपटने के लिए और ज़ायदा स्ट्रैटेजिक ऑयल रिज़र्व बनाना चाहिए था.”
अपनी बात जारी रखते हुए वो कहते हैं, “काफ़ी देशों में तो और भी असर पड़ा है, क़ीमतें भी बहुत ज़्यादा बढ़ी हैं. विकसित देशों में तो 50 फ़ीसदी तक क़ीमतें बढ़ी हैं. तो भारत में भी चरणबद्ध वृद्धि की जा रही है जो करनी ही होगी.”
क्या चीन की तैयारी बेहतर?
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लेकिन इस बीच ये सवाल है कि क्या ईरान युद्ध से पैदा हुए हालात से निपटने में चीन की तैयारी बेहतर रही है?
अजय श्रीवास्तव के मुताबिक़ जब अमेरिका भारत को रूस से तेल ख़रीदने के लिए मना कर रहा था उस वक़्त चीन रूस से तेल का सबसे बड़ा आयातक था.
वो कहते हैं, “अमेरिका की चीन को रोकने की हिम्मत भी नहीं हुई और चीन ने उनकी सुनी भी नहीं और जो भारत के रूस से तेल न ख़रीदने से सप्लाई बची वो सब चीन ने ले ली. तो चीन को बेहतर दाम पर तेल मिला और रूस उनका सबसे बड़ा सप्लायर बन गया. जो तेल भारत ने ख़रीदना कम किया, वो भी चीन ख़रीदने लगा.”
श्रीवास्तव कहते हैं कि चीन अपनी नीति को एक स्वतंत्र संप्रभु देश की तरह परिभाषित कर रहा था. “उसका फ़ायदा ये होता है कि अगर आप किसी देश से दस-बीस साल का लंबा क़रार करते हैं तो तेल आपको सस्ते दाम में मिलेगा.”
वो कहते हैं, “ईरान युद्ध से पहले भारत को जो रूस से तेल ख़रीदने का फ़ायदा था वो फ़ायदा अब काफ़ी वक़्त से चीन को मिल रहा है. चीन ने अपना दांव एक संप्रभु देश की तरह खेला और अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को बनाकर रखा. भारत शायद थोड़े दबाव में आ गया.”
अपनी बात जारी रखते हुए वो कहते हैं, “भारत आज क़रीब 88 से 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है. उसमें भी क़रीब 80 फ़ीसदी दो जगह से आता है, क़रीब 50 फ़ीसदी पश्चिम एशिया से जो विवादित है और 30 फ़ीसदी पिछले साल रूस से आया जो अमेरिका भारत को ख़रीदने से मना कर रहा है. तो इस वक़्त भारत की जो 80 फ़ीसदी ऊर्जा सुरक्षा है वो मुसीबत में है. भारत को सारे दबाव हटाकर पहले ये ध्यान देना चाहिए कि इसे कैसे सुलझाएं.”
वहीं प्रशांत वशिष्ठ कहते हैं कि मौजूद हालात से निपटने के लिए चीन की तैयारी बेहतर रही है.
वो कहते हैं, “चीन ने पिछले कुछ सालों में रिन्यूएबल एनर्जी पर बहुत ज़ोर दिया है. सैकड़ों गीगावाट के प्रोजेक्ट लगाए हैं. चीन ने इलेक्ट्रिफिकेशन भी बहुत किया है. साथ ही अपने घरेलू तेल के रिज़र्व बढ़ाए हैं और घरेलू तेल उत्पादन को भी बढ़ाया है.”
“चीन को पता था कि मलक्का जलडमरूमध्य उसकी कमज़ोर कड़ी है इसलिए उसने रिज़र्व भी बनाया, और इलेक्ट्रिफिकेशन और रिन्यूएबल एनर्जी के ज़रिये पेट्रोल पर निर्भरता कम करने की कोशिश की. साथ ही उन्होंने अपना डोमेस्टिक प्रोडक्शन बढ़ाने की कोशिश करी. तो निश्चित रूप से चीन बेहतर तरीके से तैयार है.”
तो मौजूदा हालत को देखते हुए भारत के लिए आगे की राह क्या होनी चाहिए.
प्रशांत वशिष्ठ का मानना है कि भारत को ऊर्जा के स्रोतों के विविधीकरण को और गंभीरता से लेना होगा.
वो कहते हैं, “भारत डायवर्सिफिकेशन तो हमेशा से कर ही रहा था. अब इस पर और ध्यान देना होगा. इथेनॉल फ्यूल को सौ फ़ीसदी तक ले जाने की बात हो रही है. ये एक लम्बा सफ़र होगा. बहुत साल लगेंगे. हम पेट्रोल और डीज़ल को एकदम से तो नहीं हटा पाएंगे. ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों की तरफ भी देखना होगा.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.